बढ़ते सड़क हादसे, असुरक्षित सड़कें और अनसीखे सबक

भारत में सड़कों का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है जिसने पूरे देश में सड़क परिवहन के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है

Update: 2026-03-21 02:38 GMT
  • सुदीप लखटकिया

कई सड़कें चिकनी और अच्छी तरह से बनी हुई हों लेकिन बिना किसी चेतावनी और बिना पर्याप्त व स्पष्ट संकेतकों के अचानक मोड़ (डाइवर्शन) बनाना, रुकावटें खड़ी करना या मरम्मत का काम शुरू कर देना जैसी गतिविधियां तेज़ रफ़्तार से चलने वाले ट्रैफ़िक के लिए नए खतरे पैदा कर देता है। इसमें एक और बात जुड़ जाती है- खराब, गलत जगह पर लगे हुए या कम रोशनी वाले ट्रैफिक संकेतक।

भारत में सड़कों का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है जिसने पूरे देश में सड़क परिवहन के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। देश में लगभग 1.5 लाख किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग हैं लेकिन यह आधुनिक बुनियादी ढांचा सड़क दुर्घटनाओं में पहले से कहीं अधिक लोगों की जान ले रहा है। नवीनतम आंकड़े हमें बताते हैं कि 2023 में भारत में 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1.72 लाख मौतें हुईं और 4.6 लाख से अधिक लोग जख्मी हुए। हमारे पास बेहतर सड़कें, बेहतर प्रवर्तन तकनीक और सख्त दंड हैं। इनके चलते दुर्घटनाएं कम होनी चाहिए लेकिन भारत में सड़कों पर मरने वालों की संख्या सड़क कवरेज में वृद्धि के लगभग सीधे आनुपातिक है जो सड़क दुर्घटनाओं को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में प्रस्तुत करती है। इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। हम एक जटिल समस्या का सामना कर रहे हैं। हमारे पास तमाम जानकारी मौजूद है, डेटा मौजूद है लेकिन उससे कुछ सबक नहीं लिया जा रहा है। हम जानते हैं कि क्या गलत है लेकिन हमारे अनसीखे सबक का कारण मुख्य रूप से असुरक्षित सड़कें हैं।

सड़क सुरक्षा तब बिगड़ती है जब वाहन उपयोगकर्ता, पैदल चलने वाले और साथ ही सिस्टम का प्रबंधन करने वाले अधिकारियों का समुदाय सड़कों को सुरक्षित रखने के लिए सीखना और कार्य करना बंद कर देता है। सबूत-आधारित प्रवर्तन का धीरे-धीरे कम होना और संस्थागत सीख का अभाव, असुरक्षित कार्य-प्रणालियों के बने रहने को बढ़ावा देता है। इससे ऐसी संस्कृति पनपती है जो समय के साथ बदतर होती चली जाती है। इसमें सुरक्षा के साथ समझौता करने वाले लोग ही (यानी उपयोगकर्ता) सबसे ज़्यादा भुगतते हैं और संभवत: सड़कों पर घायल होते हैं अथवा अपनी जान खो बैठते हैं।

सुरक्षा का एक पहलू सीधे तौर पर सरकार के नजरिये से जुड़ा है। जब सबूतों पर राजनीतिक दबाव हावी हो जाता है तो योजना बनाने वाले दुर्घटनाओं के आंकड़ों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। वे नियमों के उल्लंघन को सामान्य मानने लगते हैं। समुदाय इन उल्लंघनों को स्वीकार कर लेता है और इसके बाद सड़कों पर बड़ी दुर्घटनाएं होने लगती हैं। यह विडंबना ही है कि भारत में सरकारों के पास 'सड़क दुर्घटनाओं' का भारी-भरकम डेटा तो मौजूद है, फिर भी अधिकारी इंजीनियरिंग, प्रवर्तन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देखते हैं।

इसलिए ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के लिए पहला कदम कड़ी सज़ा लागू करना होना चाहिए। सड़क यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों, नियम भंग करने वालों को आर्थिक रूप से हतोत्साहित करने और भविष्य की प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई के लिए ट्रैफिक चालान रिकॉर्ड रखने का एक ज़रिया है। भारत में कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन को सटीक रूप से 'पहचानने' की अपनी क्षमता में काफ़ी सुधार करने के साथ ही तुरंत चालान जारी करने की क्षमता भी बढ़ाई है। इसके बावजूद चालान की रकम या जुर्माने की वसूली की गति, उल्लंघन को पहचानने की गति के साथ ताल-मेल नहीं बिठा पाई है। यही एक वजह है कि सड़कों पर अनुशासन और सड़क सुरक्षा को नुकसान पहुंचा है। कुछ शहरों में तो जुर्माने की वसूली का आंकड़ा सिर्फ 5 प्रतिशत तक ही बताया जाता है। चालान का भुगतान न करने या देर से करने के मामले में 'बिल्कुल भी बर्दाश्त न करने' (जीरो टालरेंस) की नीति अपनाई जानी चाहिए।

वसूल नहीं किए गए 'जुर्माने' ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा देते हैं। कानून बनाने का उद्देश्य और उसकी गरिमा इसी बात में है कि उसे पूरी तरह से और सही भावना के साथ लागू किया जाए। नियमों को लागू करने का 'आखिरी कदम' है तुरंत चालान काटना, जो जोखिम उठाने या खतरा पैदा करने वालों के लिए एक बड़ी रुकावट साबित होगा। इससे सड़कों पर चलने वाले सभी लोगों की सुरक्षा के लिए सड़क पर सही व्यवहार करने को बढ़ावा मिलेगा। नियम तोड़ने वालों के बीच समानता का भी एक सिद्धांत है- वे लोग जो तुरंत जुर्माना भर देते हैं और वे लोग जो नहीं भरते। आदर्श रूप यही होगा कि नियम तोड़ने वाले हर व्यक्ति को जवाबदेह ठहराया जाए।

ट्रैफिक पुलिस के डेटा के अनुसार 2025 में दिल्ली में निजी ड्राइवरों के खिलाफ़ लगभग 2.5 करोड़ और कमर्शियल ड्राइवरों के खिलाफ लगभग 20 लाख चालान लम्बित हैं। ये आंकड़े इस आम धारणा के विपरीत हैं कि कमर्शियल ड्राइवर बिना किसी डर के नियमों का उल्लंघन करते हैं। लगभग 3 करोड़ पेंडिंग मामलों में से तकरीबन एक तिहाई मामले तेज़ रफ़्तार से वाहन चलाने के हैं और करीब 48 लाख मामले बिना अनुमति के पार्किंग के हैं। ये दोनों ही सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाली मौतों की दो मुख्य वजहें हैं। हाल ही में पुणे में एक हाई-प्रोफ़ाइल सड़क दुर्घटना राष्ट्रीय सुर्खियों में आई तो अधिकारियों को यह पता चला कि दोषी के खिलाफ कई ट्रैफ़िक चालान पेंडिंग थे। यदि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन का जुर्माना अपराधी से समय पर ही भरवा लिया गया होता तो शायद कई जानें बचाई जा सकती थीं और यहां तक कि अपराधी और उसके परिवार को भी मानसिक आघात से बचाया जा सकता था। यह उस समस्या का समाधान करता है जिसे पुलिसिंग की भाषा में 'ब्रोकन विंडो सिंड्रोम' कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, जब छोटी-मोटी अव्यवस्थाओं को ठीक नहीं किया जाता तो समय के साथ वह इलाका बड़े अपराधों का अड्डा बन जाता है।

ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना वसूलना स्पष्ट रूप से एक आसान काम है लेकिन यह राजनीतिक दबाव का शिकार हो रहा है। जमा होते जा रहे बकाया जुर्माने को राजनेता एक तरह की 'खैरात' के तौर पर देखते हैं और इसलिए वे भुगतान में देरी की अनुमति दे देते हैं या फिर जुर्माने को माफ़ या रद्द करवा देते हैं। इस संदर्भ में तेलंगाना सरकार का यह बयान स्वागत और समर्थन के योग्य है कि अब किसी भी तरह की 'माफ़ी' नहीं दी जाएगी। अगर पूरे देश में यह एक नया चलन लागू हो जाता है तो इससे कई चिंताओं का समाधान होगा तथा एक महत्वपूर्ण संदेश जाएगा जिससे नियमों का उल्लंघन रुकेगा और परिणाम यह होगा कि दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी।

हालांकि जुर्माना एक ऐसा पहलू हैं जिसे आसानी से ठीक किया जा सकता है लेकिन हमें कुछ जटिल आपसी जुड़ावों का भी अध्ययन करने की ज़रूरत है- जैसे ड्राइविंग टेस्ट का तरीका और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना, सड़कों का रख-रखाव, मरम्मत की गुणवत्ता, खराब ट्रैफ़िक इंजीनियरिंग और सड़कों पर संकेतक लगाना वगैरह। ये सभी सड़क सुरक्षा और पेशेवर ट्रैफिक प्रबंधन के लिए बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। जरा सोचिए कि पूरे देश में ड्राइविंग लाइसेंस कितनी आसानी से जारी हो जाते है; या कह सकते हैं कि उन्हें लगभग खरीदा जा सकता है। जब आप एक गंभीर परीक्षा को नज़रअंदाज़ कर देते हैं या उसका महत्व कम कर देते हैं तो फिर उस ड्राइविंग टेस्ट का क्या मतलब रह जाता है? इसके अलावा इस बात पर भी गौर करें कि भले ही कई सड़कें चिकनी और अच्छी तरह से बनी हुई हों लेकिन बिना किसी चेतावनी और बिना पर्याप्त व स्पष्ट संकेतकों के अचानक मोड़ (डाइवर्शन) बनाना, रुकावटें खड़ी करना या मरम्मत का काम शुरू कर देना जैसी गतिविधियां तेज़ रफ़्तार से चलने वाले ट्रैफ़िक के लिए नए खतरे पैदा कर देता है। इसमें एक और बात जुड़ जाती है- खराब, गलत जगह पर लगे हुए या कम रोशनी वाले ट्रैफिक संकेतक। इन संकेतों को अनिवार्य, चेतावनी वाले या जानकारी देने वाले- इन तीन श्रेणियों में बांटा जाता है और जब हम इन सब बातों पर गौर करते हैं तो यह साफ़ नज़र आता है कि इस पूरे सिस्टम को ही ऐसे बनाया गया है कि वह नाकाम हो जाए।

हमें ऐसे समग्र समाधानों की ज़रूरत है जो पूरी वैल्यू चेन में काम कर सकें। एक ऐसा ही प्रयास जिसका ज़िक्र करना ज़रूरी है, वह है बीमा और चालान प्रणालियों के बीच प्रस्तावित जुड़ाव, एक ऐसी प्रणाली जिसमें ज्यादा चालान होने पर बीमा प्रीमियम भी अधिक हो जाएगा। इसके लिए निष्पक्ष और तकनीक-आधारित प्रवर्तन प्रणालियों को ठीक से लागू करने की ज़रूरत होगी जिसके तहत सैद्धांतिक रूप से यह संभव होगा कि नियम तोड़ने वाले हर व्यक्ति पर उसके द्वारा किए गए हर उल्लंघन के लिए जुर्माना लगाया जा सके। बार-बार नियम तोड़ने पर ड्राइविंग लाइसेंस रद्द हो जाना चाहिए जैसा कि दुनिया के कई विकसित देशों में होता है।

दुर्घटनाओं की ऊंची दर के साथ भारत एक विकसित राष्ट्र कदापि नहीं हो सकता। यह एक प्रमुख विकास सूचकांक है और इसे हमें भविष्य में तेजी से लेकिन सुरक्षित रूप से ड्राइव करने के लिए एक आधुनिक सड़क नेटवर्क के पूर्ण लाभ को आकर्षित करने की तरह देखना चाहिए।

(लेखक एनएसजी के पूर्व महानिदेशक हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)

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