वोटर के अधिकार की रक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी

भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विवाद गहराता जा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हर किसी के निशाने पर हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-08 22:33 GMT
  • राजेश पांडेय

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा रुख को देखते हुए उम्मीद बंधती है कि देश की सर्वोच्च अदालत करोड़ों मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाएगी। उससे कोर्ट के भीतर से जाहिर की गई भावनाओं और जनमत के बड़े हिस्से के मिजाज को समझने की अपेक्षा है। सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग के तौर-तरीकों का विरोध कर रही हैं। निश्चित तौर पर वे जनमत के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं।

भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विवाद गहराता जा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हर किसी के निशाने पर हैं। उन्हें हटाने की मांग और मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया रद्द करने के लिए देश की सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से याचिका दायर की गई है। उनके खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। नीट पेपर लीक मामले में सरकार को शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा कराने के लिए मजबूर करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इस बहस में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति, पूर्व न्यायमूर्ति, चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्त और विधि विशेषज्ञ आगे आए हैं।

केवल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग के साथ खड़ी है। उसके पास आयोग के बचाव में ठोस और कारगर दलीलें नहीं हैं। फिर भी, उसके कई प्रवक्ता सक्रिय रहते हैं। समझ से परे है कि चुनाव आयुक्त पर संदेह जताने और सवाल उठाने का बचाव भाजपा की तरफ से क्यों होता है। भाजपा का बचाव चुनाव आयोग की मुश्किलों को और बढ़ा रहा है। संदेह पैदा होता है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के इशारे पर काम कर रहा है। वैसे भी, सरकार ने आयोग को अपनी शर्तों पर चलाने और मनमानी की खुली छूट देने के कानूनी प्रावधान किए हैं।

चुनाव आयोग द्वारा संविधान और कानून की मंशा के खिलाफ काम करने का मामला इतना जोर नहीं पकड़ता यदि दो चुनाव आयुक्तों बीएस संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों का इंडियन एक्सप्रेस की खबर में खुलासा नहीं होता। दोनों आयुक्तों ने दस माह में 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा आदेशों पर लिखित एतराज जाहिर किया था। आयोग ने भारी विरोध के बीच एसआईआर की प्रक्रिया पूरी की। उसने बिहार, पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव निपटने का इंतजार नहीं किया। उस समय कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिए थे कि चुनावों के बाद एसआईआर कराई जा सकती है। लेकिन आयोग को तो करोड़ों वोटरों को मतदाता सूचियों से बाहर करने की जल्दी थी।

एसआईआर की प्रक्रिया ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खबरें बताती हैं कि इससे 13 करोड़ से अधिक वोटर मतदाता सूचियों से बाहर हो चुके हैं या बाहर होने की कगार पर हैं। इसमें मृत, किसी स्थान पर जा चुके वोटर शामिल हैं। मताधिकार के साथ देश का भविष्य जुड़ा है। लोकतंत्र में जनता अपने पसंद की सरकार वोट चुनती है। इतने लोगों का मताधिकार खत्म होना मामूली बात नहीं हैं। इससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर संदेह स्वाभाविक है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयन ने मामले से जुड़े मुद्दों का गहराई से विश्लेषण किया है।

जस्टिस भुयन ने 4 अक्टूबर को एक व्याख्यान में कहा, 'कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो भारतीय नागरिकों को बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करती है और उन्हें बिना मतदान का नागरिक बनाती है, वह संविधान का उल्लंघन होगी। किसी भी तरह के टालमटोल या अन्य तर्कों से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है। किसी भारतीय नागरिक से वोट देने का अधिकार छीनना, उसके शरीर से आत्मा निकालने के समान होगा। यह संविधान की मूल भावना पर आघात हैÓ। उम्मीद कर सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट एसआईआर और चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सुनवाई करते हुए अपने सहयोगी जज के कथन पर गौर करेगा। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन फली नरीमन ने जस्टिस भुयन की बात को और आगे बढ़ाया है। उन्होंने एक अन्य व्याख्यान में कहा कि आपके पास ऐसा चुनाव आयोग नहीं हो सकता जो इस तरह काम करे या जिसका कामकाज इतना खराब हो। वे सवाल उठाते हैं, मतदाताओं को इतने बड़े पैमाने पर बाहर करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक क्यों नहीं लगाई। पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख वोटरों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। यह हैरान करने वाला आंकड़ा है। वे जोर देते हैं, 90 लाख वोटरों का मताधिकार से वंचित होना भी सुप्रीम कोर्ट को इस पर रोक लगाने के लिए प्रेरित नहीं कर सका'।

सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व और एक वर्तमान न्यायाधीश की चिंता चुनाव आयोग की कार्यशैली के खिलाफ व्याप्त बेचैनी और असंंतोष की झलक दिखाती हैं। वैसे, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने किसी का नाम लिए बिना कहा है कि' सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या किसी अन्य कोर्ट के जज या रिटायर्ड जज को उन मामलों में नहीं बोलना चाहिए जो किसी कोर्ट के सामने पेंडिंग हैं'। जस्टिस गवई ने एसआईआर में हुई धांधली पर कुछ बोलने की जरूरत नहीं समझी है। यहां एक बात का जिक्र कर सकते हैं। पत्रकार करण थापर को एक इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कहा है कि कुछ साल पहले जस्टिस गवई ने जज लोया की मौत के मामले में उस वक्त टिप्पणी की थी जब इस मामले की कोर्ट में सुनवाई हो रही थी।

न्यायाधीशों का देश, समाज,संविधान, कानून के शासन से जुड़े मुद्दों पर बोलना नई बात नहीं है। अलबत्ता, 2014 के बाद खुली अभिव्यक्ति में कमी आई थी। डर का माहौल लोगों को बोलने से रोकता रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद लोगों ने पहले के समान खुलकर बोलना शुरू किया है। मीडिया का एक हिस्सा भी बेरोकटोक आवाज उठाने लगा है। वहीं सरकार की भक्ति और विपक्ष के खिलाफ मुद्दे खोजने में जुटे 'गोदी मीडिया' के स्वर फिलहाल थोड़े मंद पड़े हैं। बहरहाल, मताधिकार के मूल मुद्दे पर लौटते हैं।

चुनाव आयोग का मूल काम स्वतंत्र, निष्पक्ष चुनाव और वोटरों का अधिकार सुनिश्चित करना रहा है। इधर, वह अपनी मूल भूमिका से भटक कर वोटरों को निकालने की मुहिम में लगा है। एसआईआर में लोगों के सामने कदम-कदम पर रुकावटें खड़ी की गई हैं। नए वोटरों का पंजीयन करने वाले फार्म 6 में पूछा गया कि क्या वे, उनके माता-पिता, दादा-दादी 2002 की पिछली एसआईआर के समय मतदाता सूचियों में शामिल थे। यह अनिवार्य शर्त कितनी कठिन है। सवाल है, कितने वोटर ऐसी शर्त पूरी कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी रुकावटों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने आयोग के हर फैसले पर मुहर लगाई।

चुनाव आयोग अब भी कह रहा है कि उसने फार्म-6 में कोई बदलाव नहीं किए हैं। सिर्फ एक घोषणा जोड़ी है। उसे भी हटा लिया है। आयोग कोई भी सफाई दे किसी तरह की अतिरिक्त घोषणा को बदलाव ही कहेंगे। फार्म-6 में केवल सरकार बदलाव कर सकती है। फिर आयोग ने ऐसा क्योंं किया है। दरअसल, उसे पूरा यकीन है कि वह कुछ भी करे सरकार और सुप्रीम कोर्ट उसके साथ हैं। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अच्छे संकेत दिए हैं। 5 अक्टूबर को एक याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि हमने फार्म-6 बदलने की मंजूरी नहीं दी है। आयोग के एकतरफा फैसले रद्द होंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि सीईसी को कानून के तहत मिले संरक्षण की जांच की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में चुनाव आयोग के अधिकारों की रक्षा की है और उसका विस्तार किया गया है। वोटरों के अधिकारों का कोर्ट ने इतना समर्थन नहीं किया है।

13 करोड़ लोगों का मताधिकार खत्म किए जाने और उसके खिलाफ भड़के विरोध का दबाव यदि जारी रहता है तो चुनाव आयोग की मनमानी पर अंकुश संभव है। वैसे, सरकार से पीछे हटने या चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष दबाव डालने की उम्मीद कम है। यदि ऐसा ही करना होता तो सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को असीमित अधिकार देने के कानून नहीं बनाती। 2023 में पास कानून की धारा 16 में प्रावधान है कि कोई भी अदालत ऐसे किसी व्यक्ति के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार नहीं करेगी जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त रहा है। अब भला ऐसी सुरक्षा किसी संस्था में बैठे लोगों के लिए जमकर मनमानी करने का रास्ता क्यों नहीं खोलेगी। सरकार ने एक अन्य कानून के जरिये चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में 2-1 से अपना बहुमत कायम रखा है। इस चयन समिति में विपक्ष के नेता की मौजूदगी से सरकार की पसंद पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। स्पष्ट है, ये कानून चुनाव आयोग को अपने नियंत्रण में रखने की भावना से किए गए हैं। कोई भी सरकार इनका दुरुपयोग कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा रुख को देखते हुए उम्मीद बंधती है कि देश की सर्वोच्च अदालत करोड़ों मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाएगी। उससे कोर्ट के भीतर से जाहिर की गई भावनाओं और जनमत के बड़े हिस्से के मिजाज को समझने की अपेक्षा है। सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग के तौर-तरीकों का विरोध कर रही हैं। निश्चित तौर पर वे जनमत के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं। संविधान और कानून की मूल भावना और उसकी गरिमा को बनाए रखने का मुद्दा सबसे अहम है। लोकतंत्र की बुनियादी शर्त स्वतंत्र मताधिकार है। सुप्रीम कोर्ट से इनकी रक्षा करने की अपेक्षा स्वाभाविक है।

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