सामजिक सरोकारों की अनूठी पहल, पेड़ के नीचे आदिवासियों की 40 साल पुरानी बैंक

इंदौर ! अब लोगों को ऑनलाइन बैंकिंग से जोड़ा जा रहा है तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आदिवासी गाँव में 40 साल पहले ही बैंक की उपयोगिता समझते हुए अपनी देसी बैंक प्रारंभ कर दी थी।;

Update: 2017-02-10 04:50 GMT

 इंदौर !   अब लोगों को ऑनलाइन बैंकिंग से जोड़ा जा रहा है तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आदिवासी गाँव में 40 साल पहले ही बैंक की उपयोगिता समझते हुए अपनी  देसी बैंक प्रारंभ कर दी थी। महज 300 रूपये से शुरू इस बैंक में अब तक 135 सदस्यों ने ढाई लाख रूपये से ज़्यादा इक_ा हो चुके हैं। इससे ज़रूरतमंद को ऋण तो देते ही हैंए सार्वजनिक ज़रूरतों के लिए टेंट, बर्तन भी खरीद लिए हैं। जिससे उन्हें किराया नहीं देना पड़ता।  आदिवासियों को अनपढ़ समझने वालों को एक बार देवास जिले में बागली के पास आदिवासी गाँव केवटिया पानी हो आना चाहिए  यहाँ एक मैदान में पेड़ के तले 1977 से लगातार चार सहकारी संस्थाओं के जरिए केसीसी की तरह आदिवासी सदस्यों को यहाँ भरने वाले मेले के समय ऋण दिया जाता है और साल भर में कभी भी उसे सालाना सवाया दर पर उसे भरना पड़ता है। गांव के करीब 90 फीसदी परिवार इसके सदस्य हैं। इसका पूरा लेखा-जोखा एक रजिस्टर में रखा जाता है और इसे बहुत पारदर्शी रखा जाता है। सदस्य हस्ताक्षर भले ही अंगूठा लगाकर करें लेकिन हिसाब में वे पक्के हैं। अब तो उनके पढ़े-लिखे बच्चों को भी सामने बैठकर हिसाब समझाया जाता है ताकि कोई विवाद न हो। बीते 40 सालों में यहाँ कभी कोई विवाद नहीं हुआ। गाँव के सब लोग एक जाजम पर बैठते हैं और सबके सामने रूपये दिए और लिए जाते हैं। इतना ही नहीं इन्होंने सामाजिक सरोकारों की पहल करते हुए बीमारी, आपदा और अन्य ज़रूरतों के लिए भी सदस्यों को राशि मुहैया कराई है तो दूसरी ओर मृत्यु और शादी जैसे आयोजनों में सदस्यों पर भार नहीं पड़े, इसलिए टेंट और बर्तन खुद ही खरीद लिए हैं। इन्हें निशुल्क दिया जाता है। एक बात और बैंक के समय बैठक में शराब पीकर आना प्रतिबंधित है और उल्लंघन करने पर 151 रूपये का दंड भरना पड़ता है।
इसी गाँव में पहले एक ही बैंक हुआ करती थीए लेकिन अब ऐसी चार मोहल्ला बैंके बन चुकी हैं। बैंक सदस्य पंच वेस्ता चौहान बताते हैं कि बीते साल 20 सदस्यों को 80 हजार रूपये बांटे थे, इससे इस बार ब्याज सहित नब्बे हजार रूपये मिले। इसमें से चार हजार रूपये बर्तन खरीदने के लिए निकालकर शेष 86 हजार की राशि फिर से बाँट दी गई।

इनका कहना है   
हमारे पूर्वजों ने मात्र 300 रूपये से इसे शुरू किया था। इसके पीछे भावना यही है कि कोई भी व्यक्ति पैसों के अभाव में परेशान नहीं हो और साहूकारों के चंगुल में नहीं फंस सके।
गणपतसिंह गोयल
सरपंच और बैंक सकल पंच
मैंने खुद देखी है यह पूरी व्यवस्था अनूठी है और सामजिक सरोकारों से गहरे तक जुडी है। यह बताती है कि इस समाज में चेतना और समझदारी किस हद तक हैए जबकि हमारा सभ्य समाज इन्हें पिछड़ा हुआ मानता है।
 मुकेश गुप्ता, पत्रकारए बागली

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