आप और भाजपा का हिसाब-किताब
दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार में दूसरे सबसे महत्वपूर्ण मंत्री मनीष सिसोदिया को रविवार को शराब घोटाले में आरोपी बनाकर सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार में दूसरे सबसे महत्वपूर्ण मंत्री मनीष सिसोदिया को रविवार को शराब घोटाले में आरोपी बनाकर सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी आठ घंटे की लंबी पूछताछ के बाद हुई।
सीबीआई का दावा है कि मनीष सिसोदिया के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं और वे सीबीआई के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। गौरतलब है कि आप सरकार नवंबर 2021 में नई आबकारी नीति लाई थी, जिसका मकसद अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाना, शराब माफिया पर अंकुश लगाना और शराब बिक्री बढ़ाकर राजस्व में वृद्धि करना था।
लेकिन इस फैसले पर शुरु से सवाल उठने लगे। नई आबकारी नीति के लागू होते ही शराब दुकानों के बाहर लंबी लाइनें दिखने लगीं। शराब को कम कीमत पर अधिक बेचने की होड़ से समाज पर इसके गलत असर के बारे में चिंता जतलाई जाने लगी। भाजपा ने इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। ये आरोप ईमानदार राजनीति का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पर लगे।
जुलाई 2022 में आप सरकार ने नई आबकारी नीति को वापस लेकर फिर से पुरानी नीति को लागू कर दिया। लेकिन इससे उठे विवाद से आप पीछा नहीं छुड़ा पाई। हाल ही में दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने इस घोटाले में सीबीआई जांच की सिफारिश की थी और अब मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हो गए हैं।
दिल्ली सरकार में वित्त, गृह, स्वास्थ्य, शिक्षा और आबकारी जैसे 18 मंत्रालय संभालने वाले मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी को आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
अन्ना आंदोलन के वक्त से अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया को परछाई की तरह देखा गया। जब श्री केजरीवाल मुख्यमंत्री बने तो मनीष सिसोदिया कई मंत्रालयों को संभालने के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री भी बने। खास बात ये है कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी सरकार में एक भी मंत्रालय नहीं संभाला। गौर करने की बात ये भी है कि खुद को सबसे ईमानदार पार्टी बताने वाली आम आदमी पार्टी के दो महत्वपूर्ण नेता मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन जेल में हैं और वह भी भ्रष्टाचार के आरोपों में।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसे डर्टी पॉलिटिक्स यानी निकृष्ट राजनीति बता रहे हैं। हालांकि मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी राजनीति से प्रेरित है, या शराब नीति में वाकई कोई भ्रष्टाचार हुआ और श्री सिसोदिया बलि का बकरा बना दिए गए, ये सब जांच एजेंसी की ईमानदार पड़ताल से ही तय होगा। लेकिन जिस तरह सीबीआई की जांच-पड़ताल अक्सर गैर-भाजपाई या भाजपा-विरोधी पार्टियों और नेताओं में तेजी पकड़ती है, उसमें राजनैतिक दबाव की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
अब सवाल ये है कि अरविंद केजरीवाल इस गिरफ्तारी के बाद अपनी रणनीतियों को किस तरह अंजाम देंगे। ये सर्वविदित है कि दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाने के बाद आम आदमी पार्टी अपना विस्तार देश के बाकी राज्यों में भी करना चाहती है। गोवा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव लड़ने के बाद पार्टी की नजर छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के चुनाव पर थी। लेकिन अब श्री सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद अरविंद केजरीवाल दिल्ली सरकार में कामों का बंटवारा कैसे करेंगे और किस तरह बाकी राज्यों में चुनावों के लिए तैयार होंगे। ये सवाल आप के सामने हैं। इस घटनाक्रम के साथ देश के राजनैतिक परिदृश्य पर भी कुछ सवाल उठे हैं।
जैसे क्या आम आदमी पार्टी के खिलाफ सीबीआई की इस जांच से अरविंद केजरीवाल को जनता की सहानुभूति हासिल होगी। क्या भाजपा के लिए यह प्रकरण नुकसानदायक साबित होगा। क्या अरविंद केजरीवाल पर भी कोई कानूनी आंच आएगी। क्या आप और भाजपा में आने वाले वक्त में कोई अघोषित समझौता संभव है, क्योंकि दोनों ही दल कांग्रेस-विरोधी हैं और इस वक्त कांग्रेस का पलड़ा लगातार भारी हो रहा है। पंजाब में कांग्रेस की सरकार को हटाकर ही आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है और भाजपा अब भी वहां अपने लिए जमीन तलाश कर रही है।
क्या यह भी कोई संयोग है कि पंजाब में भगवंत मान सरकार अजनाला प्रकरण के कारण आलोचना का पात्र बनी और इस मामले पर राष्ट्रव्यापी चर्चा तूल पकड़े, इससे पहले मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी की खबरों ने सुर्खियां बटोर लीं। अजनाला मामले से चिंता की जो लहरें उठी हैं, वो आने वाले वक्त में क्या दबा दी जाएंगी या कोई बड़ा तूफान बन सकती हैं, इस बारे में कोई कयास लगाना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इतना तय है कि इसने पंजाब की शांति को लेकर बड़ा तनाव पैदा कर दिया है। पिछले हफ्ते गुरुवार को जिस तरह वारिस पंजाब दे के प्रमुख अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने अजनाला थाने पर बंदूक-तलवारों से हमला कर दिया था और पुलिस वाले हमलावरों के सामने लाचार नजर आए, वह उस चिंगारी की झलक है, जिसने 80 के दशक में बरसों-बरस पंजाब को झुलसाया है। इस आग ने इंदिरा गांधी समेत कई बड़ी हस्तियों को लील लिया। बड़ी मुश्किल से पंजाब में शांति बहाली हुई थी।
हालांकि सीमांत प्रदेश होने के कारण यहां हमेशा चुनौतियां रही हैं। सीमा पार से घुसपैठ के अलावा नशे के बढ़ते कारोबार तक कई गंभीर चिंताएं इस राज्य में रही हैं, फिर भी आम जनजीवन पटरी पर आ चुका है। लेकिन पिछले साल जब से आप की सरकार यहां बनी हैं, फिर से अस्थिरता के लक्षण उभरने लगे हैं। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने पंजाब के लोगों को ऐसे प्रयोग से सावधान होने की सलाह दी थी, लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई और आम आदमी पार्टी के लोकलुभावन वादों ने सत्ता आप की झोली में डाल दी। और अब ये नजर आ रहा है कि भगवंत मान राज्य को ठीक से नहीं संभाल पा रहे हैं।
अजनाला प्रकरण को वे पाक प्रायोजित बता रहे हैं। मुमकिन है पाकिस्तान इस तरह की साजिशों में लिप्त हो, लेकिन राज्य की पुलिस और खुफिया एजेंसियां इनकी खबर क्यों नहीं रख पाईं। यही सवाल केंद्र सरकार से भी है कि किस तरह अचानक पंजाब आकर कोई ये दावा कर सकता है कि अगर हिंदू राष्ट्र की बात उठाई जा सकती है तो खालिस्तान की भी उठाई जा सकती है। यह सीधे-सीधे भारत की एकजुटता और शांति को भंग करने की धमकी है। जिससे तत्काल निपटने की जरूरत है। मगर ऐसा लग रहा है कि अगले चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के लिए अभी दिल्ली में राजनैतिक हिसाब-किताब निपटाया जा रहा है।


