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असम चुनावों में इस बार कड़ा मुकाबला

पूर्वोत्तर राज्य असम में नौ अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी जहां जीत की हैट्रिक लगाने का सपना देख रही है वहीं कांग्रेस गठबंधन उसे सत्ता से हटाने का दावा कर रहा है

असम चुनावों में इस बार कड़ा मुकाबला
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पूर्वोत्तर राज्य असम में नौ अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी जहां जीत की हैट्रिक लगाने का सपना देख रही है वहीं कांग्रेस गठबंधन उसे सत्ता से हटाने का दावा कर रहा है. राज्य में चुनाव प्रचार चरम पर है.

असम में विधानसभा की 126 सीटों हैं. बीते दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी यहां लगातार जीतती रही है. यह बात दीगर है कि पिछले दोनों कार्यकाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी अलग-अलग नेताओं के पास रही है. हालांकि इस बार राज्य में 2023 के परिसीमन के बाद पहली बार चुनाव हो रहा है.

सत्ता के दावेदारों में महिला वोटरों और चाय बागान मजदूरों को लुभाने की होड़ मची है. बागान मजदूर कम से कम 36 सीटों पर निर्णायक हैं.

परिसीमन के कारण राज्य में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है. यानी वैसी सात सीटें घट गई हैं जहां तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आने वाले मुसलमान निर्णायक स्थिति में हो सकते थे.

वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 75 और कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी. तब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी कांग्रेस गठबंधन में शामिल थी. लेकिन इस बार वह अलग चुनाव लड़ रही है.

असम चुनाव में मुद्दे और ध्रुवीकरण

बीजेपी इस बार ध्रुवीकरण के सहारे मैदान में है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा लंबे समय से 'मियां' मुसलमानों के खिलाफ मुखर रहे हैं. इसकी वजह से राज्य में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हुआ है. दूसरी ओर, कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ सत्तारूढ़ पार्टी के आक्रामक बयानों के अलावा मुख्यमंत्री के कथित भ्रष्टाचार को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने का फैसला किया है.

कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां पर करोड़ों की बेनामी संपत्ति रखने का भी आरोप लगाया है. इसके अलावा रिनिकी पर तीन देशों के पासपोर्ट रखने के आरोप लगाने से चुनाव से ठीक पहले राजनीति गर्मा गई है.

इस बार घुसपैठ के पारंपरिक मुद्दे के अलावा कई नए मुद्दों के छाए रहने की संभावना है. घुसपैठ का मुद्दा असम में दशकों पुराना है और असम आंदोलन के बाद लगभग हर चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा रहा है. विपक्षी दल, बीजेपी के खिलाफ भारतीय नागरिकों को विदेशी करार देकर जबरन सीमा पार धकेलने का भी मुद्दा उठा सकते हैं. बीते साल सिंगापुर में राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की रहस्यमय हालात में मौत भी इस बार विपक्ष का प्रमुख मुद्दा होगी.

बदलती तस्वीर

पहले माना जा रहा था कि इस चुनाव में बीजेपी को विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन विपक्षी गठबंधन तैयार होने के बाद अब बीजेपी की राह आसान नहीं लग रही है.

लंबे समय तक जारी कयासों के बाद कांग्रेस ने अखिल गोगोई की राइजोर दल के साथ हाथ मिलाया है. विपक्षी गठबंधन में अब इन दोनों पार्टियों के अलावा असम जातीय परिषद और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं.

विपक्षी गठबंधन में सीटों के बंटवारे के फार्मूले के तहत कांग्रेस 101, राइजोर दल और सीपीएम 11, जातीय परिषद 10 और हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस दो सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके अलावा सीपीआई (एमएल) ने एक सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा है. लेकिन बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए अब भी जीत के दावे कर रहा है. एनडीए में बीजेपी 89 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके अलावा असम गण परिषद (अगप) 25 और बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. एनडीए की सहयोगी रही यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल इस बार मतभेदों के कारण निर्दलीय के तौर पर मैदान में है.

बीजेपी के लिए इस बार ऊपरी असम की सीटें सबसे कड़ी चुनौती के तौर पर उभरी हैं. इलाके में विपक्ष उस पर भारी नजर आ रहा है, वहां 50 सीटें हैं. यहां जीत ही सत्ता का रास्ता खोलती है. विश्लेषकों का कहना है कि कई सीटों पर अहोम समुदाय के वोटर निर्णायक हैं और यह तबका इस बार कांग्रेस के पक्ष में झुका नजर आ रहा है. इसकी वजह कांग्रेस के गौरव गोगोई, राइजोर दल के अखिल गोगोई और असम जातीय परिषद के लुरिन ज्योति गोगोई का साथ मिल कर लड़ना है. यह तीनों नेता अहोम समुदाय के हैं. पिछले चुनाव में विपक्ष में एकता की कमी ने एनडीए को बढ़त दे दी थी. लेकिन इस बार गठबंधन के कारण विपक्ष मजबूत नजर आ रहा है.

महिला और जेन जी वोटर अहम

बीजेपी सरकार की उम्मीदें महिला वोटरों पर टिकी हैं. चुनाव से ठीक पहले सरकार ने अरुणोदय योजना के तहत राज्य की करीब 40 लाख महिलाओं के खाते में 3,600 करोड़ की रकम भेजी थी. असम में महिला वोटरों की तादाद पुरुषों के समान ही है. कई सीटों पर उनके वोट निर्णायक हैं.

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इसी तरह राज्य के जेन जी वोटर इस बार राजनीतिक दलों की बजाय उम्मीदवारों को उनकी छवि और कामकाज के आधार पर वोट देने का मन बना रहे हैं. गौहाटी विश्वविद्यालय के युवा तबके के वोटरों का कहना है कि उनके लिए पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवार ही अहम हैं. शासन में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं का विधानसभा में पहुंचना जरूरी है. इसके साथ ही सत्तारूढ़ पार्टी को निरंकुश होने से रोकने के लिए मजबूत विपक्ष का होना भी जरूरी है.

राजधानी गुवाहाटी की एक कालेज छात्रा शर्मिष्ठा बरुआ डीडब्ल्यू से कहती हैं, "युवा वोटर इस बार आंख मूंद कर किसी पार्टी का समर्थन नहीं करेंगे. हमारा वोट उसी उम्मीदवार को मिलेगा जो भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनाते हुए प्रशासन में पारदर्शिता का वादा करे."

बराक घाटी के सिलचर के एक कालेज में पढ़ने वाले गौतम भट्टाचार्य भी यही बात दोहराते हैं. वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हम अबकी राजनीतिक दलों की बजाय उम्मीदवारों को प्राथमिकता देंगे."

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के लगभग ढाई करोड़ वोटरों में से 29 फीसदी यानी 73 लाख से ज्यादा वोटर 19 से 29 साल के आयु वर्ग में हैं. इसके अलावा करीब 62 लाख वोटरों की उम्र 30 से 39 साल के बीच है.

मतदान सिर पर होने के कारण राज्य में चुनाव प्रचार भी चरम पर पहुंच गया है. बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत कई नेता असम में चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुके हैं. उधर, कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता भी ताबड़तोड़ रैलियां करने में जुटे हैं. लेकिन सत्ता के दोनों दावेदार इन रैलियों में राज्य के विकास और दशकों पुरानी समस्याओं को दूर करने के वादे से ज्यादा एक दूसरे पर आक्रामक हमले करने पर ही जोर दे रहे हैं. बीजेपी और कांग्रेस एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार में डूबे होने का आरोप लगाते हुए अपनी कमीज दूसरे से सफेद बताने में जुटी हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि इस बार एनडीए और कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला है.

गौहाटी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अखिल रंजन दत्ता डीडब्ल्यू से कहते हैं, "शुरुआती दौर में लग रहा था कि यह चुनाव एकतरफा होगा और बीजेपी सरकार आसानी से सत्ता में लौटेगी. लेकिन हाल के दिनों में यह धारणा तेजी से बदली है. एनडीए को बहुमत मिला भी तो उसकी राह आसान नहीं होगी."


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