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25 हजार छात्र छात्राओं को नहीं मिला गणवेश

कवर्धा ! मिडिल स्कूल तक के छात्र छात्राओ को शासन के द्वारा मुफ्त मे वितरण की जाने वाली गणवेश अब तक नही मिल पाई है बच्चो को राष्ट्रीय पर्व मे उत्साह रहता है

25 हजार छात्र छात्राओं को नहीं मिला गणवेश
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कवर्धा ! मिडिल स्कूल तक के छात्र छात्राओ को शासन के द्वारा मुफ्त मे वितरण की जाने वाली गणवेश अब तक नही मिल पाई है बच्चो को राष्ट्रीय पर्व मे उत्साह रहता है कि वे नये वस्त्र पहनकर वे अपने शालाओं मे जाये लेकिन शिक्षा विभाग की लापरवाही के चलते गणवेश नही मिल पाया।
अब तक जिले के करीब 25 हजार छात्र छात्राओं को गणवेश नहीं मिल पाया ऐसे में शासन प्रशासन की कार्य प्रणाली पर उंगली उठ रही है। शिक्षा सत्र जैसे ही प्रांरभ होता है बच्चों को गणवेश उपलब्ध होना चाहिए। ताकि व नए गणवेश के साथ स्कूल प्रांरभ कर सके। लेकिन जिले में नहीं हो पाता। हालात तो यह है कि यदि यही स्थिती रही तो शिक्षासत्र के अंतिम दौर तक पूर्ण रूप से गणवेश नहीं बांटे जा सकतेे। जिले के शासकीय स्कूल के करीब 25 हजार बच्चों को गणवेश नहीं मिल पाया है। मतलब हजारों बच्चे घरेलू कपड़ों और पुराने गणवेश में ही गणतंत्र दिवस मनाएंगे। जिले के चारों विकासखंड में 1479 प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक शालाएं है। यहंा पर करीब 1.35 लाख छात्र-छात्राएं अध्ययनरत है इसमें शिक्षा विभाग अंतर्गत 39 हजार बच्चों को गणवेश का वितरण हो चुका है। लेकिन राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत एक लाख से अधिक बच्चे है। जिसमें 25 हजार से अधिक बच्चों को एक शेट भी गणवेश को नहीं मिल पाया है। शिक्षासत्र खत्म होने में दो माह ही बचे हैं। बावजूद 20 फीसदी बच्चे गणवेश से वंचित हैं। जिले में कुल 90 संकुल है। इसमें सबसे अधिक पंडरिया और बोड़ला में है और इसी ब्लॉक में सबसे अधिक स्कूल में बच्चे गणवेश से वंचित है। बोड़ला में 8, पंडरिया में 12,कवर्धा में 4 और सहसपुर लोहारा के 5 संकुल अंतर्गत स्कूल में गणवेश का वितरण नहीं हो पाया है। शिक्षा विभाग द्वारा महिला स्व सहायता समूह के माध्यम से कपड़ों की सिलाई कराई गई। लेकिन यहां पर अब लापरवाही उजागर हो रही है। बच्चों को जो कपड़े बांटे जा रहे है वह बेढग़े है। मतलब किसी बच्चों में बड़े हो रहे है तो किसी में छोटे। मतलब उसके लिए यह व्यर्थ साबित हो रहे हैं। गणवेश वितरण में हर वर्ष लापरवाही होती है। बावजूद इस पर न तो शासन ध्यान देती है। और न प्रशासन। पिछले वर्ष तो शिक्षासत्र के समाप्ति तक बच्चों को गणवेश नहीं मिल पाया था। ऐसे में बच्चों को गणवेश देने के बजाए उनके खाते में सीधे-सीधे राशि जमा कर देनी चाहिए। ताकि परिजन अपने बच्चों के लिए सही नाप पर बेहतर कपड़ा खरीदकर गणवेश सिलाई करा सके। इससे शिक्षा विभाग पर बोझ होगा और न ही हथकरघा उद्योग। और न ही बच्चों को छोटे-बड़े गणवेश वितरीत होंगे।


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