...पूछ लीजिए ज्ञान
स्वामी विवेकानंद का दर्शन है कि, 'आधुनिक जाति भेद भारत की प्रगति में बाधक है

- डॉ श्यामबाबू शर्मा
हमारा समाज व्यवहार में अभी भी सामंती और पिछड़े मूल्यों को ढो रहा है। इस पर तब चिंता और बढ़ जाती है जब हम समरसता भोज के छायांकित समाचारों से रू-ब-रू होते हैं। यह अभिनव सामाजिक कदाचार क्या यह उद्घोषित नहीं करता कि तथाकथित अस्पृश्यों के घर भोजन करना या उनका क्षणिक अभिवादन आदि उन्हें बार-बार यह याद दिलाता है कि वे सोपानीकृत व्यवस्था में निचले पायदान पर हैं?
स्वामी विवेकानंद का दर्शन है कि, 'आधुनिक जाति भेद भारत की प्रगति में बाधक है। यह संकुचित करता है, प्रतिबंधित करता है, अलग करता है। जाति एक सामाजिक प्रथा है, और हमारे सभी महान प्रचारकों ने इसे तोड़ने की कोशिश की है। हर संप्रदाय ने जाति के खिलाफ उपदेश दिया है, और हर बार इसने केवल जंजीरों को जकड़ा है। जाति केवल भारत की राजनीतिक संस्थाओं का परिणाम है। हमारा मानना ??है कि वेदों, दर्शनों, या पुराणों, या तंत्रों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि आत्मा का कोई लिंग, पंथ या जाति है।'
हिंदी साहित्य में महात्मा कबीर से बड़ा समाज चेता कोई नहीं हुआ। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में प्रचलित अंधविश्वासों, रूढ़ियों तथा मिथ्या सिद्धांतों द्वारा प्रचारित सामाजिक विषमताओं का मूलोच्छेद करने का बीड़ा उठाया और निर्ममतापूर्वक सभी असमानताओं और कुरीतियों पर प्रहार किया। तत्कालीन समाज में व्याप्त मानवीय असमानताओं और शोषण को लक्ष्य कर उन्होंने अनेक बातें कहीं। इनमें आज के दौर में सबसे प्रासंगिक सामाजिक अलंबरदारों की गढ़ी जाति व्यवस्था है। और जाति के आधार पर योग्य-अयोग्य, ज्ञानी अज्ञानी के परंपरागत दंभीय मानक। कबीर स्वयं ऐसे परिवार में जन्मे थे, जो तत्कालीन समाज व्यवस्था में अस्पृश्य था।
उन्होंने स्वयं वर्ण-व्यवस्था का दंश झेला था। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि जो ज्ञानी है, वह यदि अस्पृश्य है, तब भी ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है। उन्होंने इस प्रकार ज्ञान के हथियार से अन्यायपूर्ण वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार किया। कबीर का मानना था कि अगर ईश्वर वर्ण-विचार करता तो वह जन्म से ही जाति विभाजक रेखायें खींच देता। उत्पत्ति की दृष्टि से समस्त जीव समान हैं। कबीर के अनुसार मनुष्य जन्म से समान है, लेकिन समाज ने उसे रुढियों में जकड़ लिया है तथा भाँति-भाँति की चौहद्दियां गढ़ ली गई हैं। केवल जाति के आधार पर किसी की पूजा और किसी का अपमान कबीर जैसे संत जनों को कभी नहीं भाया। कबीर मानवतावादी थे इसलिए उन्होंने मानवीयता के नाते मानव मात्र का सम्मान बिना उसकी जाति विचारे करने का उपदेश दिया।
हमारा समाज व्यवहार में अभी भी सामंती और पिछड़े मूल्यों को ढो रहा है। इस पर तब चिंता और बढ़ जाती है जब हम समरसता भोज के छायांकित समाचारों से रू-ब-रू होते हैं। यह अभिनव सामाजिक कदाचार क्या यह उद्घोषित नहीं करता कि तथाकथित अस्पृश्यों के घर भोजन करना या उनका क्षणिक अभिवादन आदि उन्हें बार-बार यह याद दिलाता है कि वे सोपानीकृत व्यवस्था में निचले पायदान पर हैं? जिस दौर में देश में आधुनिकता और विकास के नए कीर्तिमान कायम करने के दावों में सबके विश्वास पर ताल ठोंकी जा रही है! मगर आज भी दलितों के खिलाफ जातिगत हिंसा का सच सामाजिक सत्य है। समाज में मौजूद जाति-व्यवस्था में कुछ लोगों को उच्च और कुछ को निम्न दर्जे का मानना और इसी मुताबिक व्यवहार करना! इस सच को स्वीकार करना कुछ लोगों के लिए क्यों नहीं संभव हो पा रहा है कि मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य की हैसियत हर स्तर पर बराबर है। महज किसी जाति में पैदा होने के आधार पर खुद को श्रेष्ठ और किसी को निम्न मानना क्या एक तरह की मानसिक ग्रंथि नहीं है, जिसके शिकार लोग अपने से कम दर्जे पर माने जाने वालों के साथ अक्सर अमानवीयता की हद भी पार कर जाते हैं।
मस्तिष्क के तमाम न्यूरान्स में यह बिठाने की जरूरत है कि प्रतिभाएं बाजार में नहीं बिकतीं और न ही ज्ञान पर किसी का बयनामा है। योग्यता आधारित समाज की स्थापना के लिए शैक्षिक संस्थानों को आधारशिला माना जाता है। माना जाता है कि हमारे शिक्षा संस्थान और उनमें बैठे बौद्धिक दो कार्य करते हैं: एक शैक्षिक कार्य जो सभी के लिए सीखने को बढ़ावा देता है, और एक चयन कार्य जो व्यक्तियों को अलग-अलग कार्यक्रमों में क्रमबद्ध करता है, और अंतत: व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर सामाजिक स्थिति में पदस्थ करना। परंतु इधर के विगत दशक में एक विचित्र दृश्य देखने को मिल रहा है। एकतरफ समरस विकास की गंगाजली उठाई जा रही हैं और दूसरी ओर अयोग्यता को योग्यता मानकर तमाम बौद्धिक पदों पर एक निश्चित वैचारिकी को अग्रेषित करने वालों को पदस्थ करने के लिए नियम कानून सब ताक पर! खुला खेल, हमैं हाथ में पगही सो जैसे मर्जी जोतैं! डेमोक्रेसी की बात करिये और..! आखिर सत्य, ईमानदारी और वुसूलों पर बहस तो जारी है? पूरी व्यवस्था बाजार में तब्दील। गोया यह भारत और भारतीयता यूं ही किसी बाजार में नहीं मिली है इसके लिए हमारे पुरखों ने क्या-क्या नहीं सहा!
कल्पना कीजिये उस दौर कि जब कबीर ने समाज के हर तबके की खामियों पर अपनी रचनाओं से लोहा लिया। यह दीगर कि इसीलिए वह कबीर हो गये। शाल-दुशाला, श्रीफल भेंट चढ़ावा तब चलन में न थे। चलन में थीं स्वर्ण मुद्राएं पर वह कबीर थे। अलाने फलाने की तरह थोड़ा झुकते लचकते और पाला बदल लेते तो मलाई काटते। अब है तो बड़ा कठिन! बड़े पुराने बइठकुआ हैं, कहते हैं नौकरी करते रहो कहां लिखा पढ़ी में मगज मारी। कंफर्ट जोन में कैद आज की कलम दवात। कट्टर ईमानदारी को दो जून की रोटी मिल जायं तो सुदिन मानिये।
ज्ञान को तिरस्कृत कर अज्ञान के महिमा मंडन की अनेक कथाएं नित्य नैमित्तिक हैं। यथा, है तो अमुक जाति का मगर दिमाग बहुत है। मेहनत मशक्कत और उसूलों की नियति अभिशप्त है और जुगाली, जुगाड़ू पेट में हाथ फेरते मस्त। तथाकथित ऊंची जातियों को स्वीकारना होगा कि उनके जातीय चिंतन पर ही अनुसंधान करें तो आदि कवि वाल्मीकि की जाति क्या थी! विडंबना यह है कि हमारे देश में विकास की चकाचौंध में सारा जोर भौतिक निर्माण पर रहा है और सामाजिक विकास नीतियों पर गौर करने की जरूरत कभी नहीं समझी गई। जब तक जाति-व्यवस्था और इससे संचालित सामाजिक मनोविज्ञान को केंद्र में रख कर इससे छुटकारे का रास्ता नहीं निकाला जाएगा, तब तक समाज में जाति-आधारित हिंसा की बीमारी की कोई वैक्सीन ईजाद नहीं हो सकती।
देश का संविधान कहता है कि भारत में किसी के भी साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा क्योंकि यहां सभी वर्ग समान हैं। भारत की आजादी और जनतंत्र की घोषणा के बाद उम्मीद थी कि देश की इस सबसे बड़ी सामाजिक समस्या के बंधन ढीले होंगे, इसके जरिए कायम भेदभाव कम होकर खत्म भी होंगे। लेकिन आज भी अगर दलितों या कमजोर जातियों के लोगों को भेदभाव से भी आगे अत्याचार और जातिगत अपराधों के चलते जान गंवानी पड़ रही है तो यह सोचने का वक्त है कि सामाजिक विकास के इतने लंबे सफर में हमारा हासिल इतना अफसोसनाक क्यों है! तथापि एक ईमानदार लेखक स्वतंत्र होता है। वह पद पुरस्कार और पैसे का न चाकर है न उधारीय वैचारिकी को ढोने वाला गुलाम। महात्मा कबीर ने यही मूल्य स्थापित करते हुए लिखा होगा :
जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।।


