आज का इतिहास 9 मार्च

1454 में इटली के घुमक्कड़ नाविक अमेरिगो वेसपुची का जन्म हुआ था। अमेरिगो वेसपुची की वजह से आज अमेरिका का नाम अमेरिका है। अमेरिगो वेसपुची को बचपन से किताबें और नक्शे जमा करने का शौक था। दिलचस्पी की खातिर वह पानी के जहाजों में भी काम करने लगे। 1499 में उन्हें पहली बार समुद्री यात्रा का मौका मिला। अमेरिगो तीन बार पश्चिम की यात्रा पर निकले और उन्होंने उस पश्चिमी महाद्वीप को करीब करीब छान ही दिया। जर्मनी के प्रसिद्ध मानचित्र विज्ञानी मार्टिन वाल्डजेमुलर उस वक्त सामने आ रही नई दुनिया का नक्शा खींच रहे थे। वाल्डजेमुलर अमेरिगो की खोज से इतने प्रभावित हुए कि जिस इलाके को अमेरिगो ने खोजा था, उसे उन्होंने 1507 में खीचें अपने नक्शे में अमेरिका नाम दिया। नक्शे की यूरोप में हजारों प्रतियां बिकी और तभी से पूरी दुनिया पश्चिम के उस महाद्वीप को अमेरिका कहती है। 1951 में मशहूर तबला वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का जन्म हुआ था। ज़ाकिर मशहूर तबला वादक क़ुरैशी अल्ला रक्खा ख़ान के पुत्र हैं जो तबला बजाने में माहिर माने जाते थे। 12 साल की उम्र से ही ज़ाकिर हुसैन ने संगीत की दुनिया में अपने तबले की आवाज़ को बिखेरना शुरू कर दिया था। शुरुआती शिक्षा और कॉलेज के बाद ज़ाकिर हुसैन ने कला के क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करना शुरू कर दिया। 1973 में उनका पहला एलबम लिविंग इन द मैटेरियल वर्ल्ड आया था। उसके बाद तो जैसे ज़ाकिर हुसैन ने ठान लिया कि वह अपने तबले की आवाज़ को दुनिया भर में बिखेरेंगे। 1973 से लेकर 2007 तक ज़ाकिर हुसैन विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समारोहों और एलबमों में अपने तबले का दम दिखाते रहे। 1988 में जब उन्हें पद्म श्री का पुरस्कार मिला था तब वह महज 37 वर्ष के थे और इस उम्र में यह पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति भी थे। ज़ाकिर हुसैन को 1992 और 2009 में संगीत का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्रैमी अवार्ड भी मिला है। 1967 में तत्कालीन सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टैलिन की पुत्री स्वेतलाना अलीलुयेवा देश छोड़ कर चली गई थीं। सोवियत संघ छोड़ने के बाद वो नई दिल्ली के अमेरिकी दूतावास पहुंच गई और अमेरिका में राजनीतिक शरण की मांग की थी। 1953 में उनके पिता स्टैलिन की मौत के बाद से स्वेतलाना के बारे में कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी जैसे कि वो कहां है और क्या कर रही हैं। बस इतनी जानकारी थी कि वो मॉस्को में ब्रितानी दूतावास के पास एक फ्लैट में रह रही थी। स्वेतलाना जब भारत पहुंची तो उन्हें भारत सरकार यहां नहीं रहने देना चाहती थी। जिसके बाद स्वेतलाना स्वीट्जरलैंड चली गईं और फिर अप्रैल 1967 में वो अमेरिका चली गईं। अमेरिका पहुंचकर न्यूयॉर्क में उन्होंने एक प्रेस कॉंफ्रेंस में अपने पिता के कार्यकाल की जम कर आलोचना की। वह अमरिकी नागरिक हो गईं और अपना नाम बदलकर लाना पीटर्स रख लिया। 1984 में वो सोवियत संघ वापस लौट गई और अपने पिता के पैतृक घर जॉर्जिया में बस गईं। 1986 में एक दफा फिर वो अमेरिका चली गई और फिर 90 के दशक में वो ब्रिटेन में जाकर बस गई। 1971 हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक के॰ आसिफ़ का निधन हुआ था। बहुत कम फ़िल्में और बहुत ज्यादा प्रसिद्धि हासिल करने वाले फ़िल्मकारों में के. आसिफ़ का नाम शायद अकेले है। भारतीय फ़िल्म जगत के इस महान फ़िल्मकार का पूरा नाम करीम आसिफ़ था। अपने तीस साल के लम्बे फ़िल्म कैरियर में के आसिफ़ ने सिर्फ तीन मुकम्मल फ़िल्में बनाई हैं जिसमें फूल, हलचल और मुग़ल-ए-आज़म शामिल है। ये तीनों ही बड़ी फ़िल्में थीं जिससे लोगों ने खूब पसंद किया और बॉक्स आफिस पर खूब धमाल मचाई। के. आसिफ़ ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। खुद उन्होंने भी कभी शिक्षित होने का दावा नहीं किया। बावजूद इसके वह महान फ़िल्मकार बने और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी एक अलग पहचान और जगह क़ायम की। मुग़ल-ए-आज़म के बाद के. आसिफ़ ने लव एण्ड गॉड नामक भव्य फ़िल्म की शुरूआत की। इससे पहले कि के. आसिफ़ यह फ़िल्म पूरी कर पाते कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। 1973 में उत्तरी आयरलैंड में हुए एक जनमत संग्रह में जनता ने ब्रिटेन के साथ रहने के पक्ष में वोट डाला था। करीब 57 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा था कि वे ब्रिटेन के साथ ही रहना चाहते हैं। लेकिन कैथोलिक ईसाइयों ने इस जनमत संग्रह का बहिष्कार किया था। इसके बाद 1973 में उत्तरी आयरलैंड के लिए एक नई एसेंबली का गठन किया गया था। और फिर दिसंबर में आयरलैंड परिषद का गठन किया गया था ताकि उत्तरी आयरलैंड और आयरलैंड गणराज्य के बीच सीमा पार व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन ब्रिटेन के साथ रहने की वकालत करने वाले दलों ने इसका विरोध किया जिसके कारण ये परिषद भंग कर दी गई। उसके बाद ब्रिटेन उत्तरी आयरलैंड पर सीधे शासन करने लगा जो कि अगले 26 साल तक जारी रहा।