आत्मीय रिश्तों के बीच क्या काम कोर्ट कचहरी का?

हिंदी की अनेक कहानियों में वृद्धजन की उपेक्षा और बदहाली बयां हुई है। उषा प्रियम्वदा की 'वापसीÓ में गजाधर बाबू लम्बी नौकरी के दौरान घर से दूर रहने के बाद यह अभिलाषा लिए घर लौटते हैं...

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आत्मीय रिश्तों के बीच क्या काम कोर्ट कचहरी का?
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- डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हिंदी की अनेक कहानियों में वृद्धजन की उपेक्षा और बदहाली बयां हुई है। उषा प्रियम्वदा की 'वापसी' में गजाधर बाबू लम्बी नौकरी के दौरान घर से दूर रहने के बाद यह अभिलाषा लिए घर लौटते हैं कि अब उन्हें परिवार का संग-साथ मयस्सर होगा, लेकिन वे पाते हैं कि घर और परिवार में अब उनके लिए कोई जगह नहीं है। भीष्म साहनी की कहानी 'चीफ की दावत' में मिस्टर शामनाथ और उनकी पत्नी के लिए बूढ़ी मां एक ऐसी अनावश्यक वस्तु है जिसे मेहमानों की नजर से बचाने के लिए कमरे में बंद करना जरूरी होता है। लेकिन उसी मां की फुलकारी जब अतिथि चीफ साहब को भा जाती है तो मां के प्रति उनका बर्ताव तुरंत बदल जाता है। गौरतलब यह बात है कि इन कहानियों में वृद्धों के प्रति उपेक्षा तो है,

 अमानवीयता अधिक नहीं है और हिंसा तो कतई नहीं। लेकिन तब यानि सत्तर के दशक से  अब तक आते-आते हालात बहुत बदल चुके हैं। 
हाल में राजस्थान के भीलवाड़ा से यह खबर आई कि वहां कलेक्टर के यहां होने वाली जन-सुनवाई में छह महीनों में 29 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जिनमें बुजुर्ग मां-बाप ने यह शिकायत करते हुए कि उनके बेटे-बहू उनकी समुचित देखभाल नहीं करते हैं, कलेक्टर से सहायता की याचना की है। बुजुर्गों  की पीड़ा यह है कि उनके वारिसों ने उनसे उनकी पूरी सम्पत्ति ले ली और जब वे भरण-पोषण का खर्चा मांगते हैं तो वे उनके साथ मार-पीट करते हैं।

वृद्ध मां-बापों ने ये मामले वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के तहत दर्ज करवाए हैं। बात केवल भीलवाड़ा की ही नहीं है। देश के हर शहर और गांव से आए दिन इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं। लेकिन अभी कुछ दिन पहले गुजरात के राजकोट से तो और भी बुरी खबर आई है। इस खबर के अनुसार, वहां एक बेटे ने अपनी बीमार वृद्धा मां को छत से फेंककर मार ही डाला। हुआ यह कि राजकोट में रहने वाली एक सेवानिवृत्त शिक्षिका जयश्रीबेन विनोदभाई नाथवानी की मृत्यु जिस बिल्डिंग में वे रहती थीं उसकी छत से गिरने से हो गई।

तफ्तीश के बाद पुलिस ने इसे आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया। लेकिन घटना के दो माह बाद पुलिस को एक गुमनाम चि_ी मिली और तब सोसाइटी में लगे सीसीटीवी के फुटेज खंगाले गए तो मामला कुछ और ही निकला। इस फुटेज में बेटा अपनी मां को लिफ्ट से छत की तरफ ले जाता दिखाई दिया। बेटे ने पहले तो इस मृत्यु में अपनी किसी भूमिका से इंकार किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उसने मां को छत से नीचे फेंकने की बात कबूल कर ली। उसने कहा कि वो मां की तीमारदारी से परेशान हो गया था। 


बूढ़े और असहाय मां-बाप की उपेक्षा और उनके साथ दुर्व्यवहार के मामले दुनिया के और देशों में भी सामने आ रहे हैं। हाल में ताइवान से भी ऐसा ही एक मामला  सामने आया है। लेकिन यहां किस्सा कुछ और है। वहां की शीर्ष अदालत ने मां की इस गुहार पर कि उसने अपने बेटे को डेंटिस्ट बनाने पर भारी खर्च किया, अत: अब वो तब किये गए कांट्रेक्ट के अनुसार एक बड़ी रकम की हकदार है, उस बेटे को आदेश दिया है कि वो अपनी मां को करीब छह करोड़ दस लाख रुपये दे। इस मां का कहना है कि उसने अपने दो बेटों को डेंटिस्ट बनाने पर बहुत भारी रकम खर्च की, लेकिन उसे पहले ही यह आशंका हो गई इसलिए उसने तभी अपने बेटों से एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवा लिए थे कि जब वे कमाने लगेंगे तो उन्हें अपनी कमाई का एक हिस्सा देंगे।

गौरतलब है कि अपने पति से तलाकशुदा लुओ ने अकेले दम पर अपने बेटों को पाला-पोसा था। लुओ के बड़े बेटे ने तो कुछ धनराशि देकर मां से समझौता कर लिया लेकिन छोटे बेटे चू ने यह कहते हुए मां की याचिका का विरोध किया कि जब उन्होंने यह कांट्रेक्ट साइन किया था तब उनकी उम्र बहुत कम थी, इस कारण अब इस कांट्रेक्ट को अवैध  मान लिया जाना चाहिए। इस बेटे ने मां की मांग का प्रतिवाद यह कहकर भी किया कि ग्रेजुएशन करने के बाद उसने कई बरस मां के डेण्टल क्लिनिक में काम किया था और उस दौरान उसकी मां ने काफी पैसे कमाए थे। असल में यह रकम उस रकम से बहुत ज़्यादा थी जो आज उनके मां मांग रही है। लेकिन अदालत ने बेटे की आपत्तियों  को अस्वीकार कर दिया है। दरअसल ताइवान के सिविल कानून के अनुसार बुजुर्ग मां-बाप बालिग बच्चों की जिम्मेदारी होते हैं। यह बात अलग है कि अधिकांश बुजुर्ग मां-बाप अपने दायित्व से कतराने वाले बच्चों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते हैं।

अब एक और मामले के बारे में जान लें। अपने ही  मुल्क के शहर इटावा का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है जिसमें यह बताया गया है कि अपने पिता के सख्त रवैये से परेशान हो एक बच्चा सीधे थाने पहुंच गया है और पुलिसवालों से गुजारिश कर रहा है कि वे उसके पिता को सबक सिखाएं। इस प्रसंग में अपने मुल्क की बात मैंने जानबूझ कर की है। इसलिए कि पश्चिम में तो बच्चों द्वारा अपने मां-बाप की शिकायत बहुत आम है। वहां बहुत छोटे बच्चे भी बात-बात  पर मां-बाप को पुलिस बुला लेने की धमकी देते रहते हैं। लेकिन अपने यहां यह बात नई है। विचारणीय यह है कि क्या रिश्ते अब इस मुकाम तक आ पहुंचे हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए कोर्ट कचहरी की मदद लेनी पड़ रही है! इस बात पर भी विचार जरूरी है कि इस स्थिति का सामना कैसे किया जाए। 

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