विकास के खोखले दावे : क्या पर्याप्त रोजगार का सृजन हो रहा?

हाल के समय में विकास पर बहस तो बहुत हो रही है पर विडंबना यह है कि विकास के अनेक सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसके बावजूद उपेक्षित हो रहे हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण पक्ष यह है ...

भारत डोगरा
भारत डोगरा

 भारत डोगरा
हाल के समय में विकास पर बहस तो बहुत हो रही है पर विडंबना यह है कि विकास के अनेक सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसके बावजूद उपेक्षित हो रहे हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि आय में जो संवृद्धि होती है वह पहले से धनी तबके के पास जाती है या निर्धन व अभावग्रस्त तबके के पास जाती है। पहली स्थिति में गरीबी व अभाव दूर करने में कोई उपलब्धि नहीं होती है, जबकि दूसरी स्थिति में महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है।
दूसरा अति महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि क्या पर्याप्त रोजगार का सृजन हो रहा है, व जिस रोजगार का सृजन हो रहा है वह संतोषजनक रोजगार है या नहीं। लोग अपनी आजीविका के प्रति निश्चिंत हैं या वे बहुत अनिश्चय की स्थिति में हैं। उद्देश्य यह होना चाहिए कि सबको संतोषजनक आजीविका प्राप्त हो जिससे उनकी बुनियादी सुविधाएं व जरूरतें पूरी हो सकें तथा साथ में वह कार्य उनकी क्षमताओं व रुचि के अनुकूल हो। पर चिंता की बात यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में दो तरह की प्रवृत्तियां बढ़ती हुई नजर आ रही हैं - ग्रोथ विदाऊट जाब्स एंड जाब्स विदाऊट हैपिनेस। यानि ऐसी आर्थिक संवृद्धि जिससे रोजगार नहीं बढ़ रहे हैं, व रोजगार बढ़ भी रहे हैं तो ऐसे रोजगार बढ़ रहे हैं जो लोगों की रुचि, क्षमता व संतोष के अनुकूल नहीं हैं।
विकास का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लोग अपनी क्षमताओं व रुचि की सही पहचान के आधार पर आजीविका प्राप्त करें तथा उसमें इस तरह प्रगति करें जिससे एक बेहतर दुनिया बनाने में उनका योगदान प्राप्त हो सके, पर इस लक्ष्य से अभी हम बहुत दूर हैं तथा अधिक दूर होते जा रहे हैं। विकास का बहुत उपेक्षित पक्ष यह है कि मानव जीवन में सामाजिक संबंधों व सामाजिक समरसता को अपेक्षित स्थान नहीं मिल रहा है। भौतिक व आर्थिक उपलब्धि की दौड़ में विभिन्न स्तरों पर परिवार व समुदाय की समरसता, प्रगाढ़ता, सहयोग उपेक्षित हो रहे हैं जबकि दैनिक जीवन में मनुष्य का दुख-दर्द व असुरक्षा कम करने के लिए व मानव-जीवन की प्रसन्नता को बढ़ाने के लिए यह सामाजिक संबंध ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
इससे कुछ जुड़ी हुई बात यह है कि मानव-जीवन के नैतिक आधार की उपेक्षा हो रही है। नैतिकता के कई शाश्वत पक्षों पर सर्व मान्यता बननी चाहिए जैसे ईमानदारी, सच्चाई, दूसरों को दुख न पहुंचाने को जीवन का आधार बनाना व संबंधों को निभाना, सभी तरह के जीवन के प्रति करुणा, एक अच्छे नागरिक के दायित्व का निर्वाह आदि। जहां एक ओर यह अति महत्त्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित होने से बहुत समस्याएं बढ़ रही हैं, वहां दूसरी ओर नैतिकता को संकीर्ण व कट्टर धर्मांधता व सांप्रदायिकता की राह पर धकेला जा रहा है जो बहुत चिंताजनक स्थिति है। इस कारण वास्तविक आध्यात्मिकता की संभावना निरंतर कम हो रही है जो नैतिक जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इसके साथ ही हर स्तर पर अमन-शांति के लिए प्रतिबद्धता के अति महत्वपूर्ण उद्देश्य की उपेक्षा हो रही है जिससे तरह-तरह की हिंसा, अपराध, दंगों व युद्ध की संभावना विश्व में बढ़ रही है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों व जीवन के विभिन्न रूपों के प्रति बढ़ती हिंसा ने विश्व में दुख-दर्द बहुत तेजी से बढ़ाया है। केंचुए, तितली, मधुमक्खी जैसे सबसे उपयोगी कीट अरबों की संख्या में मारे जा रहे हैं व बहुत से जीव-जंतु बुरी तरह संकटग्रस्त हो गए हैं।
विकास के आकर्षक पर खोखले दावों के बीच पर्यावरण संकट तो इतना विकट हो गया है कि इसने हवा, पानी, मिट्टी, वन आदि जीवन के सबसे बड़े आधारों को ही बुरी तरह प्रदूषित व संकटग्रस्त कर दिया है। आज जलवायु बदलाव, समुद्रों के अम्लीकरण, ओजोन परत की क्षति, महाविनाशक हथियारों के भंडारों के दौर में धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही संकटग्रस्त हो चुकी है। आज की सबसे बड़ी चुनौती तो धरती की इस जीवनदायिनी क्षमता को बचाने व सब लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की है। यह सब करने के लिए न्याय, समता, नैतिकता व पर्यावरण रक्षा के लिए बहुत गहरी प्रतिबद्धता व निष्ठा जरूरी है पर विश्व का मौजूदा बदलाव विकास के इस लक्ष्य से अभी बहुत दूर है।


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