मतदाता एक निष्पक्ष न्यायाधीश की भूमिका अपनाने से गुरेज न करे

वर्तमान में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें से एक उतराखंड भी है। राज्य के निवासी इसे देवभूमि भी मानते हैं। ...

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मतदाता एक निष्पक्ष न्यायाधीश की भूमिका अपनाने से गुरेज न करे
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वीरेन्द्र पैन्यूली
वर्तमान में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें से एक उतराखंड भी है। राज्य के निवासी इसे देवभूमि भी मानते हैं। अपने को देवभूमि वासी मानने के कारण उत्तराखंड में चुनावी पवित्र आयोजन में यहां के मतदाता की  शुचिता से हिस्सेदारी करने की जिम्मेदारी और ही बढ़ जाती है। उत्तराखंड में कुछ दशक पूर्व दुरूह पर्वतीय क्षेत्रों के लोकगीतों में कुछ ऐसी युवतियों की पीड़ा भी मार्मिक तौर पर चित्रित की जाती थी, जिनमे वेें अपने से काफी बढ़ी उम्र के व्यक्ति से विवाह के लिए या किसी अन्य बेमेल विवाह के लिए अपने प्यारे पिता को कोसती हैं। व्यथित युवती की पीड़ा गीतों के बोलों में यही रहती थी, कि पैसों के लालच में उसका सौदा कर दिया गया है। क्या ऐसे गीत बदली किन्तु समकक्ष परिस्थितियों में आज भी उतराखड में ही नहीं पूरे देश के मतदाताओं को काल-स्थान निरपेक्ष होकर गहरे तक नहीं चीरेगा।
 विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान सामने आ रही वास्तविकताएं हमें जतला रही हैं कि मतदाता का अनिर्णय राजनीतिक वातावरण की शुद्धि न हो पाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। यदि हम व्यक्तिगत जीवन में शुचिता व नैतिकता की अपेक्षा करते हैं तो चुनाव के दौरान उससे पीछ क्यों हट जाते हैं। हमारे घर-परिवार वाले पीढिय़ों से ये जानते आये हैं कि यदि पवित्र अनुष्ठान आयोजित करना है, उसके पुण्य का भागीदार होना है,तो आयोजन के पहले और उसके दौरान हमें क्या शुचिता अपनानी है। प्रजातंत्र में चुनाव भी एक पवित्र आयोजन है। यदि यह हमारे घर में हो रहा है, तो क्या हमें मतदाता के रूप में अपनीे शुचिता की अवहेलना करनी चाहिए? एक मनीषी से सुना हुआ कथन पहले मुझे अटपटा लगता था। किन्तु इसका भाव मैं अब समझा हूं ,प्रसंगवश, आप से साझा करना चाहता हूं। मनीषी का कहना था कि पवित्र नदियों में स्नान के पहले घर से स्नान कर चलो। निश्चित रूप से यह अव्यावहारिक कथन लगता है। भला, जब जाकर नदी में नहाना ही है, तो घर से नहा कर क्यों चलो। देखते तो हम यह भी आए हैं, कि,लोगों को यदि नदी-धारों पर जाना होता है, तो कई बार तो सारे कपड़े बर्तन लेकर वहीं धोने का निष्चय लेकर निकलते हैं। और कभी-कभार तो नहाने के पहले वहीं आस-पास नित्यकर्म से भी फ ारिग हो लेते हैं। व्यक्ति न भी करे तो नगर महानगरों की व्यवस्थाएं ऐसा करने में नहीं हिचकती हैं। मनीषी कहते हैं, नदी में नहाने से पहले नहाने का बोध इसलिए कराया जा रहा है, कि आप जब नदी सफाई जैसे संकल्प लिए हों, तो अपनी तरफ से जितना कम से कम गन्दगी नदी में छोडक़र आयेंगे, उतना ही वह आपका नदी सफाई के लिए सहयोग होगा।  वर्तमान में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें से एक उतराखंड भी है। राज्य के निवासी इसे देवभूमि भी मानते हैं। अपने को देवभूमि वासी मानने के कारण उत्तराखंड में चुनावी पवित्र आयोजन में यहां के मतदाता की  शुचिता से हिस्सेदारी करने की जिम्मेदारी और ही बढ़ जाती है। उत्तराखंड में कुछ दशक पूर्व दुरूह पर्वतीय क्षेत्रों के लोकगीतों में कुछ ऐसी युवतियों की पीड़ा भी मार्मिक तौर पर चित्रित की जाती थी, जिनमे वेें अपने से काफी बढ़ी उम्र के व्यक्ति से विवाह के लिए या किसी अन्य बेमेल विवाह के लिए अपने प्यारे पिता को कोसती हैं। व्यथित युवती की पीड़ा गीतों के बोलों में यही रहती थी, कि पैसों के लालच में उसका सौदा कर दिया गया है।
क्या ऐसे गीत बदली किन्तु समकक्ष परिस्थितियों में आज भी उतराखड में ही नहीं पूरे देश के मतदाताओं को काल-स्थान निरपेक्ष होकर गहरे तक नहीं चीरेगा। अब क्या ऐसी स्थितियां उनको मर्माहत नहीं करेंगी, कि जब सदैव से साथ रही उनकी  प्रिय अन्तरात्मा, और अस्मिता भी मतदान कक्ष से बाहर निकलने के बाद उन पर यह लांछन लगाएगी कि अपने लालच में उसने उसका हाथ बेमेल व्यक्ति के हाथ सौंप दिया। बेमेल रिष्ता उस व्यक्ति के हाथ अपना प्रतिनिधित्व सौंपना है, जो आचार व्यवहार से हमारे संस्कारों और नैतिकता का प्रतिनिधि लगता ही नहीं है। जिसकी शोहरत गोली चलाने,दबंगई करने, खनन व शराब माफियाओं के साथ नजदीकी या खुद के बिकने और बिकवाने खरीदवाने में मददगार की रही हो। या जो दायित्वहीन दायित्वधारी होने पर भी व जनता के धन व हक पर बोझ बनने में जरा भी लज्जित न होता हो। यदि हम जिस प्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं, उसके दुर्गुण हम अपने में, अपने परिवार वालों में, अपने मित्र परिचितों में नहीं देखना चाहते हैं, तो आत्ममंथन करें कि तो हम उसे अपना वोट देकर अपना प्रतिनिधि होने का प्रमाणपत्र क्यों देना चाहते हैं। न भूलें कि अव्वल दर्जे का अपराधी व लम्पट भी जब कोई चुनाव जीत लेता है, तो उसकी धौंस यह भी रहती है कि  जनता की अदालत ने उसे बरी कर दिया है। अर्थात एक उम्मीदवार यदि आपको अदालत मानता है तो वह आपका अभयदान पाकर भस्मासुर हो सकता है। अत: मतदाता एक निष्पक्ष न्यायाधीश की भूमिका अपनाने से गुरेज न करे। यह न सोचे कि मेरे एक के करने से क्या होगा। एक बादशाह ने अपने मंत्री की सलाह पर लोगों को परखने का एक नायाब तरीका अपनाया। उसने एक बड़े से हौज में सुबह रोषनी से पहले ही एक-एक लोटा दूध डालने को कहा। सुबह हौज में उसे पानी ही पानी दिखा। सबने या जनता के भारी बहुमत ने यही सोचा कि मेरे एक के पानी डालने से क्या फ र्क पड़ेगा। बाकी सब तो बादशाह के डर से दूध ही डालेंगे।
  विधानसभा चुनावों को पवित्र आयोजन के रूप में लेने का एक अन्य कारण भी हो सकता है। स्मरण करें कि पंचायतों में चुने गये पंचों को पंच परमेश्वर की मान्यता मिली थी। विधानसभा भी राज्य की पंचायतें होती हैं। पंच परमेश्वरों को बिना शुचिता के न गढ़ें। यदि परमेश्वर को गढऩा है, तो स्वयं में भी ब्रह्म की अनुभूति करें।
इधर चुनावी मौसम में मैं कई ऐसे आयोजनों में भी गया हूं, जहां विभिन्न समूह या विधानसभा चुनावों को लडऩे के इच्छुक संगठन अपने को मुख्य राजनैतिक दलों के विकल्प बनने के लिए रणनीति तय करने का प्रयास कर रहे होते हैं। इन आयोजनों में मेरा बार-बार यही कहना रहता है विकल्प बनना है या यदि लीक से हटकर वैकल्पिक राजनीति देनी है तो वैकल्पिक मतदाता तैयार करिये। उसके सफ ल होने के वातावरण बनाने के कामों की उपेक्षा न करें। वैकल्पिक मतदाता अर्थात अनिर्णय, प्रलोभनों, व शायद व्यसनों से भी आखिरी क्षणों में न डिगने वाला मतदाता। कई बार लोग आखिरी क्षणों में अपात्र दल या व्यक्ति को वोट देने के पीछे यह दलील भी देते हैं कि वो अपना वोट बेकार नहीं करना चाहते हैं। ऐसे मतदाता को वैकल्पिक मतदाता नही कहा जायेगा।


 

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