बौनों का आकाश

सुबह जब मैं अपने झोपड़े से बाहर निकला, तो मैंने एक अजीब दृश्य देखा। मेरे झोपड़े के बाहर भीड़ जमा थी। सूट-बूट पहने, धोती-कुरता पहने, खादी पहने, सिल्क पहने...

देशबन्धु
बौनों का आकाश
Dwarves
देशबन्धु

- सच्चिदानंद जोशी

सुबह जब मैं अपने झोपड़े से बाहर निकला, तो मैंने एक अजीब दृश्य देखा। मेरे झोपड़े के बाहर भीड़ जमा थी। सूट-बूट पहने, धोती-कुरता पहने, खादी पहने, सिल्क पहने। यानी भीड़ में सभी वर्गों के लोग जमा थे। यह भीड़ उत्साहित थी, प्रफुल्लित थी। जरा गौर से देखने पर ज्ञात हुआ कि भीड़ में दो-चार कैमरे भी मौजूद हैं। मुझे समझ में नहीं आया कि ये भीड़ क्यों जमा है। मेरे बाहर निकालते ही किसी ने कहा- 'बाबाजी आ गए।' और फिर देखते-ही-देखते पूरा गांव मेरी जय-जयकार में डूब गया।

लोग आगे बढ़-बढ़कर मेरे पैर छूने लगे। मेरे गले में हार-माला डालने लगे। भीड़ में रेलमपेल मच गई। फिर कुछ लोगों ने मेरे चारों तरफ चटाइयां बिछा दूं। ढोल-मंजीरे आ गए और कीर्तन होने लगा। मेरे आश्चर्य का तब पारावार नरहा, जब मैंने उन भजनों को गौर से सुना। वे सभी भजन मुझे लेकर बनाए गए थे। उन भजनों में मेरी महिमा का वर्णन था। जो कुछ मेरे सामने हो रहा था, जो सब मेरे लिए अजूबा था, अनहोनी थी।
तभी भीड़ में आवाज आई- 'बाबाजी, दो शब्द कहिए,' 'बाबाजी,  आशीर्वाद दीजिए।' मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। मैं तो इतना सकते में आ गया था कि हड़बड़ाहट में बोल उठा-'ये सब क्या हो रहा है?' भीड़ ने पुन: जय-जयकार किया औरभजन दुगने जोर-शोर से चालू हो गया। अब वाकई मुझे खीज आने लगी थी। मगर इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, एक व्यक्ति मुस्कराता हुआ मेरे पास आया और बोला- 'मैं दैनिक

ज्वाला' का विशेष संवाददाता हूं। आपसे दो मिनट चर्चा करनी है।'
'मगर यह माचरा क्या है?' मैं चिढ़कर बोला।

'उसी विषय पर चर्चा करनी है। आइए, अंदर चले।' वह शांत भाव से बोला।
मैंने भीड़ को हाथ जोड़कर प्रणाम किया औरसारा गांवपुन: मेरे जयघोष से गूंज उठा।
'भाई साहब! यह सब क्या हो रहा है, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।' मैंने अंदर जाते-जाते असंयत होकर पूछा।
पत्रकार मुस्कराया और उसने अपने बैग से एक अखबार निकाला। उस अखबार की हैड लाइंस पर था-
'युवक अपना जीवन सुधारैं।' मुख्यमंत्री रतनलाल

'ये अपने मुख्यमंत्रीजी का भाषण है। कल उन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिया था।' पत्रकार ने जानकारी दी।
'पर इससे मेरा क्या वास्ता?' मैंने अधीरता से पूछा।

'आपका वास्ता है। देखिए, कल के भाषण में मुख्यमंत्रीजी ने आपका जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि उन्होंने आपसे प्रेरणा ली है। आप उनके आदर्श हैं। सात ङी उन्होंने यह भीकहा है कि सभी नवयुवक आपकी तरफ देखें और आपसे प्रेरणा लें।' पत्रकार ने संक्षेप में बात पूरी की। फिर उठते हुए बोला, 'अच्छा अब मैं चलता हूं। अभी बहुत काम बाकी है। कल के पेपर में देखिएगा, कैसी तारीफ छापता हूं आपकी।' और हां, राजाश्रय की बधाई हो!

'राजाश्राय?' कैसी बात कह गया वो पत्रकार! और यह रतनलाल को क्या सूझी, जो मुझको अपना आर्दश बना लिया। और यह रतनलाल है ही शरारती, बल्कि थोड़ा उद्दंड है। बचपन से ही देख रहा हूं उसे, या ये कहें कि बचपन में ही देखा था उसे। दरअसल मैं इस गांव में प्राइमरी टीचर था और रतनलाल गांव के सरपंचजी का लड़का। मेरे स्कूल में वह पांचवीं तक ही पढ़ा, मगर वह जब तक स्कूल में रहा, मैं उसके सामने दबा-दबा सा रहा। ऐसा लगता था मानो मास्टर मैं नहीं, वो है।

मैंने रतनलाल को डांटना चाहा, पर डांट न सका। मारना चाहा, पर मार न सका। उसके गंदे और गलत कामों को भी मुझे चुप रहना पड़ता था। मैं तभी जान गया था कि रतनलाल गांव में टिकनेवाला नहीं है। वह बहुत आगे जाएगा।
दूसरे दिन के अखबारों में पहले पृष्ठ पर बड़े-बड़ै अक्षरों में छपा था-

'देश में यह सब क्या हो रहा है? रतनलाल अभी बच्चा है, उसे बल दीजिए-बाबाजी,' इस शीर्षक के नीचे उन सारी बातों का वर्णन था, जो कल वहां घटी थीं।

मेरा को दिमाग चकराने लगा था। मुझे रतनलाल पर रह-रहकर गुस्सा आ रहा था। कैसा मजाक किाय था उसने मेरे साथ।
इतने में एक कार मेरे झोपड़े के सामने आकर रुकी। उसमें से एक अधिकारीनुमा सज्ज्न उतरे। वे मेरे पास आए और मेरे पैर छूते हुए बोले, 'बाबाजी, मुख्यमंत्री आपको लेने स्वयं आनेवाले थे, मगर आप तो जानते ही हैं, कितना काम रहता है उन्हें। और फिर आप ही ने तो कहा है कि कर्म पहले करो। इसलिए मैं आपको लेने आया हूं। मैं उनका पी.ए. हूं। आप मेरे साथ राजधानी चलें। वहां सभी आपके दर्शनों को व्याकुल हैं।' 
हालांकि मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था कि कर्म पहले करो। मगर फिर भी मेरा रतनलाल से मिलना जरूरी था। मैंने सोचा, चलो राजधानी और निपटाओ यह बाबाजी का चक्कर। 

शायद पी.ए. ने मेरे आगमन कीसूचना पहले दे दी थी। स्वागत की बड़ी तैयारी की वहां पर। रतनलाल के निवास पर भारी भीड़ जमा थी। चारों तरफ मेरी जय-जयकार हो रही थी। मार्ग पर फूल खिले थे, हजारो लोग मेरे दर्शन के लिए उतावले हो रहे थे। घर के पोर्टिको में रतनलाल स्वयं मेरे स्वागत के लिए खड़ा था। अपना इतना स्वागत-सत्कार देख मेरा मन डांवाडोल होने लगा। मन का गुस्सा उड़ने लगा। एक विचार आया- 'बने रहो बाबाजी, क्या फर्क पड़ता है।'  मगर एकाएक घबराहट होने लगी कि यदि नहीं निभी बाबागिरी तो?

कार के रुकते ही रतनलाल ने स्वयं आगे बढ़कर कार का दरवाजा खोला और मैं जैसे ही नीचे उतरा, उसने मेरे पैर पकड़ लिए। खटाखट-खटाखट न जाने कितने कैमले चल गए।


भीड़ में से पुन: जय-जयकार की आवाजें आने लगीं थीं। इस बार जय-जयकार में मेरे साथ रतनलाल का भी नाम शामिल था। इस जय-जयकार ने तो मेर ेदिमाग की आग को पुन: भड़का दिया। आस-पास के लोगों की परवाह किए बगैर मैं चिल्लाया- 'रतनलाल, यहसब क्या लगा रखा है?'

जिंदगी में पहली बार मैं रतनलाल को डां पाया था। मैं उसे डांट पाया, इसके दो प्रमुख कारण थे। एक तो अब सरपंचजी स्वर्गवासी हो चुके थे, सो उनका डर नहीं थाछ दूसरा, मैं अब सरकारी कर्मचारी नहीं था। परंतु रतनलाल परडांट का कोई असर न हुआ। वह मुझे ससम्मान अंदर ले गया। बैठक में रतनलाल की पत्नी, बच्चों एवं स्टॉफ के कर्मचारियों ने मेरे पैरछुए। मैं सारी  जिंदगी एक शिक्षक रहा, मगर जिंदगी भर में इतने लोगों ने मेरे पैर नहीं छुए थे, जितने पिछले दो दिनों से छू रहे थे। मैं अस्वस्थ हो उठा। अजनबियों के बीच मुझे भय लगने लगा। आखिर रतनलाल ने ही मेरी समस्या हल की। मुझे उठाते हुए वह बोला, 'आइए बाबाजी, अंदर बैठकर बातें करें।' हम उठकर अंदर के कमरे में चले गए। कमरे में पहुंचते ही मैंने रतनलाल से व्याकुलता से पूछा, 'रतनलाल! ये क्या माजरा है। ये क्या मजाक कर रहे हो तुम?' यह मेरी दो दिन की बाबागिरी का ही असर था कि मैं उसे 'तुम' कह रहा था।

'चिंता की कोई बात नहीं है, मास्टरजी। बात यों हुई कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि मेरा भी कोई आदर्श होना चाहिए, प्रेरणास्रोत होना चाहिए। हरेक का रहता है, तो मेरा क्यों न हो। तब हमारे पी.ए. ने सुझाया कि आप तो किसी की भी आर्दश पुरुष बना लो, महापुरुष तो हम बना देंगे उसे। तब मैंने सोचा कि अपन ने पढ़ाई के सबसे ज्यादा साल, यानी पांच साल आपके ही साथ गुजारे हैं, तो पहला हक तो आपका ही बनताहै। आप आदमी भी ठीक हो, हार्मलेस हो, इसलिए बना लिया आपको आदर्श।' रतनलाल बोलता चला जा रहा था और मैं उसे हतप्रभ हो सुन रहा था।

'सो गुरुजी, अब आज से आप मेरे गुरु हैं और आदर्श भी। आज से आप मेरे ही पास रहेंगे। आपका काम होगा बोलना, कुछ भी बोलना और बोलते रहना। पर मेरे ही खिलाफ  नहीं। और हां, गांव में आपका आश्रम बनने तक आपको यहीं रहना होगा।' और वह चलता बना।
दूसरे दिन से मैं फुल-फ्लेज बाबा हो गया। मैं रोज कुछ-न-कुछ कहने लगा। बाद में इसे लोग सुभाषित कहने लगे। ये सुभाषित वे ही थे, जो कभी गांधीजी, नेहरूजी, महावीर, बुद्ध, आइंस्टाइन, सुकरात वगैरह कह गए थे। मैंने कहीं भाषा बदल दी, कहीं वाक्य बदल दिए और ये सुभाषित मेरे नाम से चलने लगे। धीरे-धीरे मुझे यह महसूस होने लगा कि रोज एक सुभाषित देना भी आसान काम नहीं है। अब मुझे उन महापुरुषों पर दया आने लगी थी। बेचारे कैसे कह गए होंगे इतने सुभाषित।

इधर मैंने प्रार्थना-सभा एवं प्रवचन के कार्यक्रम भी आरंभ कर दिए। उन कार्यक्रमों की लोकप्रियता बढ़ती गई। प्रार्थना-सभा में, प्रवचनों में भीड़ बढ़ने लगी। हां, सामान्य जनता इन कार्यक्रमों में नदारद थी। इनमें केवल बड़े-बड़े लोग ही आते थे।
तभी एक दिन रतनलाल का पी.ए. मुझसे बोला- 'बाबाजी, आप कुछ दिनों के लिए घूम आइए।'
'अब मुझे कहीं नहीं जाना घूमने।' मैंने बाबा वाले अंदाज में कहा। 

'नहीं, आपका जाना जरूरी है। हमें जनता में आपके प्रति उत्साह देखना है।' पी.ए. जरा कड़क लहजे में बोला। पी.ए. का अंदाज इतना याद दिलाने के लिए काफी था कि मैं केवल मुख्यमंत्री का नौकर हूं, इसके अलावा मेरी हैसियत कुछ भी नहीं है।
मैंने शांत स्वर में पूछा, 'कहां जाना होगा?'

'यहीं आसपास हो आइए। हमें तो केवल मालूम पड़ना चाहिए कि जनता पर आपका प्रभाव कैसा है? यदि आपको वांछित सफलता मिलती है, तो यह प्रोजेक्ट सक्सेसफुल समझिए। फिर हम आपसे कुछ काम की चीजें भी बुलवा सकेंगे। तो फिर मैं परसों से आपके दौरे की घोषणा कर देता हूं। सभी तैयारियां हो जाएंगी। आपको बस कुछ ही दिनों में मुक्ति दिला देंगे।' 
'मुक्ति?' मैंने घबराते हुए पूछा।

'यानी फिर हम आपको आपके गांव में भेज देंगे, जहां आपका आश्रम बन रहा है। वहीं से आप बोलते रहिएगा। आपको क्या बोलना है, वह सब यहीं से लिखा हुआ आ जाएगा।' पी.ए. ने कहा और चला गया। 

उसके बाद हफ्ते भर मैं आसपास के गांवों में घूमता रहा। सभी जगह इंतजाम जोरदार था। पूरा सरकारी अमला मेरे स्वागत-सत्कार में लगा था। सामान्य जनता मेरे दर्शनों को आतुर थी। मैं भी बाबागिरी की सोच में कुछ वाक्य जनता पर फेंकता चला जा रहा था। रोज अखबार में फोटो, टी.वी. पर इंटरव्यू चल रहे थे। देखकर मन गद्गद् था। मुझे जैसे अदना शिक्षक को रतनलाल ने क्या बना डाला था। पहले मैं सरकारी कर्मचारी था, अब सरकारी संत के दर्जे में आ गया था।

इस बीच खबर आ गई कि मेरा ऑफिस बनकर तैयार है। मैंने गांव की ओर रुख किया। गांव पहुंच कर अपना घर देखा तो दंग रह गया। मेरे टूटे-फूटे मकान की जगह वहां एक आलीशान आश्रम बनकर तैयार था। लोगों की चहल-पहल वहां भी थी। पूछने पर मालूम पड़ा कि ये सारे मेरे भक्त और अनुयायी हैं। पुलिस का भी इंतजाम चाक-चौबंद था।

अपने घर को आश्रम के रूप में तब्दील होता देख मन खुश था और उत्साहित भी। अपने एक साधारण पुरुष से महापुरुष बनने की प्रक्रिया का मैं पूरा आनंद ले रहा था और देख रहा था कि आसमान अब झुककर बहुत नीचे आ गया है। लोग छोटे और बहुत छोटे होते जा रहे हैं।
(लोकप्रिय कहानी संग्रह से)

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