क्रांतिकारी विचारक : स्वामी विवेकानंद

भारत की भूमि सचमुच अत्यन्त उर्वर, और रत्नगर्भा है जिसमें अनेकानेक महापुरुष पैदा हुए। स्वामी विवेकानंद इसी भूमि में पैदा हुए एक अनूठे रत्न थे, ...

ललित सुरजन
क्रांतिकारी विचारक : स्वामी विवेकानंद
ललित सुरजन

प्रदीप पाटिल
भारत की भूमि सचमुच अत्यन्त उर्वर, और रत्नगर्भा है जिसमें अनेकानेक महापुरुष पैदा हुए। स्वामी विवेकानंद इसी भूमि में पैदा हुए एक अनूठे रत्न थे, जिन्होंने महान संत और आध्यात्मिक पुरुष श्री रामकृष्ण परमहंस के चिंतन के बीजकणों को सारे संसार में वितरित करने का गौरवपूर्ण कार्य किया है। समकालीन विश्व को अपने क्रांतिकारी विचारों से आंदोलित करने वाले इस युवा सन्यासी की आभा चिरन्तन है।
विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1856 को कलकत्ता में हुआ। उनका शैशव और बाल्यकाल यूरोपीय पुनर्जागरण काल के कलाप्रेमी सा रहा। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी नृत्य-संगीत, फैशन और गायन में अनोखी रुचि थी और वे नेतृत्वक्षमता भी रखते थे जिस पर श्री रामकृष्ण भी मुग्ध हुए थे। विवेकानंद का नजरिया बेहद प्रमाणनिष्ठ था। बौद्धिक अंधता से उन्हें आजीवन नफरत रही। प्रारंभ में वे जहां एक ओर हिन्दू देवी-देवताओं का खण्डन करते, वहां अद्वैतवाद को भी अपनी तीखी तार्किकता का निशाना बनाते। कई ऐसे अवसर भी आते जब उनकी तीखी आलोचना से रामकृष्ण भी मर्माहत हो जाते। एक बार विवेकानंद ने उनसे पूछा था- ‘आप कैसे जानते हैं कि आपकी सारी उपलब्धियां निरी मरीचिका नहीं है, एक रोगी मस्तिष्क की उपज नहीं है! आहत होकर रामकृृष्ण मां की शरण में जाते। किन्तु रामकृष्ण से सम्पर्क की निरंतरता  बने रहने से विवेकानंद यह महसूस करने लगे कि समाधि की स्थिति में चले जाने वाला यह व्यक्ति जो पहले सर्वथा हृदय की प्रेरणाओं से चलित जान पड़ता था, वास्तव में एक परम साधक है। उसकी बुद्धि का खजाना भी  विवेकानंद की तुलना में ज्यादा समृद्ध है। कालान्तर में उन्होंने कहा भी था कि रामकृष्ण बाहर से सम्पूर्ण भक्त थे पर भीतर से सम्पूर्ण ज्ञानी-मैं इसका ठीक उल्टा हूं।’
कहते हैं प्रकृति को जीवन और मनुष्य की हर हानि, हर अभाव का कोई न कोई मुआवजा किसी न किसी रूप में अदा करना पड़ता है। जीवन के मुआवजे सदा ही दिखाई पडऩे वाले नहीं होते। जीवन ऊपर-ऊपर से बहुत कुछ छीन कर कोई अमूल्य आंतरिक निधि दे सकता है। प्रकृति का यही नियम स्वामी विवेकानंद के जीवन को भी रूपान्तरित कर गया। सन् 1884 में पिता की आकस्मिक मृत्यु ने उन्हें बाहरी तौर पर निपट दीन बना दिया था। विकट गरीबी और ऋण के बोझ से दबे विवेकानंद ने अत्यन्त मार्मिक वेदना से अपने क्लेशों का वर्णन किया है- ‘मैं लगभग भूखों मर रहा था। नंगे पैर मैं दफ्तर -दफ्तर भटकता रहा, पर निराशा ही मिलती। मुझे जीवन में कटु सत्य का अनुभव हो गया। मैंने देखा कि दुर्बल-निर्धन, असहाय के लिए कोई स्थान नहीं है। जो कुछ दिन पहले मेरी सहायता के लिए तत्पर रहने वाले लोग बाद में साधन रहते हुए भी मुझे देख मुंह फेर लेते।’ घर पर कई बार ऐसा भी हुआ कि खाने की कमी देखकर मैंने मां से कह दिया कि ‘मेरा बाहर निमंत्रण है’ और बाहर भूखा भटकता रहा। मेरी जीवन की मेरे धनी बंधु मुझे अपने घर गीत गाने बुलाया करते किन्तु मेरी दशा के बारे में किसी ने कोई जिज्ञासा प्रकट नहीं की। घोर दुर्दिन और दुर्भाग्य की अति के चलते विवेकानंद इतने निराश हो गये थे कि एक दिन उन्होंने संसार छोडऩे का निश्चय कर लिया। प्रकृति को शायद इसी मनोवैज्ञानिक क्षण की प्रतीक्षा थी सो ठीक उसी दिन संयोग से रामकृष्ण कलकत्ता आये और विवेकानंद को अनुरोध कर अपने साथ दक्षिणेश्वर ले गये। विषम आर्थिक परिस्थितियों की पीड़ा भोगते विवेकानंद ने रामकृष्ण से कहा कि ‘वे उनके परिवार के लिए प्रार्थना करें।’ रामकृृष्ण बोले-‘बेटा यह प्रार्थना तो मैं नहीं कर सकता। तुम स्वयं क्यों नहीं कर लेते?’
जब विवेकानंद माँ के मंदिर गये तो उनकी चित्तवृत्ति बदल गई। श्रद्धा के जज्बे में वे इस तरह बह गये कि उन्हें अपने दुख-निवारण की प्रार्थना का ध्यान नहीं रहा। दूसरी और तीसरी बार भी उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया किन्तु उनकी प्रार्थना का उद्देश्य धुध्ंाला पड़ जाता। उन्होंने आत्मग्लानि में कहा, ‘कितनी तुच्छ बाते है ये, कि इनके लिए माँ के सामने आया?’ ‘उन्होंने केवल यही प्रार्थना की-‘माँ मुझे और कुछ नहीं चाहिए केवल यही कि मैं जागता रहूं और मेरा विश्वास बना रहे...।’ उस दिन से उनके जीवन में ज्ञान और श्रद्धा सच्चे अर्थों में जगी जिसने उनका पूरा जीवन सुवासित कर दिया। शिकागो की विश्वधर्म सभा में लोगों से प्राप्त स्नेह, संवेदना और समादर इसका स्पष्ट प्रमाण है कि उनकी वाणी में ज्ञान श्रद्धा और करुणा का सच्चा स्वर मुखरित हुआ था।
अपने तीर्थाटन के प्रारंभिक दिनों में जब वे जयपुर के निकट खेतड़ी के महाराज के पास थे, तब एक सामान्य नर्तकी ने अनजाने में उन्हें विनम्रता का पाठ पढ़ा दिया। जब वह आई तो युवा भिक्षु तिरस्कार से उठकर जाने लगा। महाराज के अनुरोध पर वह रुका ही था कि नर्तकी बाला ने गाया-
‘प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो
समदरसी है नाम तिहारो...।’
भजन में जो आस्था की अनुगूंज थी वह विवेकानंद के अन्तरतम पर छा गयी। कालान्तर में उनके पश्चिम जाने और पश्चिम के जीवन में तालमेल बिठाने में उस नर्तकी के प्रभाव ने जितना सहयोग दिया उतना किसी और ने नहीं। वहां विवेकानंद को जिनका साथ मिला ये सभी महिलाएं थीं और जो महिला उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिष्या बनी वह मार्गरेट नोबल अर्थात भगिनी निवेदिता थी जिसने रामकृष्ण और विवेकानंद के विचारों को सारी दुनिया में पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। यदि विवेकानंद के जीवन में वह नर्तकी न आती तो शायद विवेकानंद अपनी पारम्परिक मान्यताओं और पूर्वाग्रहों से मुक्त न हो पाते।
स्वामी विवेकानंद का समय ‘नवजागरण’ का समय कहलाता है। भारतीय समाज का सामाजिक और सांस्कृतिक नवजागरण उनके परिवेश की प्रमुख समस्या थी। कैसेे यह महान देश अपनी सांस्कृतिक पहचान पुन: प्राप्त करे? भारतीयता की पहचान क्या है? दलित, स्त्रियों की राष्ट्रीय विकास में भागीदारी कैसे संभव हो? कैसे यह विराट जन-समुदाय सामाजिक स्पंदन हासिल करें, हम कैसे हटा पायेंगे इस गतिरोध को ? हम अपने समाज की किन बातों पर गर्व करें और किनके खिलाफ संघर्ष ? इन तमाम  सवालों से विवेकानंद की चेतना निरंतर जूझती रही। वे झूठे गर्व के जरिये लोगों को गुमराह करने की बजाय ताकत और कमजोरी को ठीक-ठीक पहचानने का प्रत्यन करते थे।  विवेकानंद समकालीन राजनीति से दूर ही रहे लेकिन उनका धर्म लगातार सामाजिक सत्ता के सवालों से टकराता रहा।  कठमुल्लों की आक्रोश भरी चित्कारों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था - ‘हिन्दू हो या मुसलमान या ईसाई मुझे इससे मतलब नहीं, जो भी प्रभु का प्रेमी होगा मैं उसका सेवक रहूंगा। शारीरिक श्रम के प्रति हीनता का दृष्टिकोण समाप्त करने के लिए वे तत्व मीमांसा पर व्याख्यान देकर खेत जोतते, कुआँ खोदते और आटा सानने में हाथ लगाते। उन्होंने कर्म पर बेबाक टिप्पणी देते हुए कहा है कि ‘सभी कर्म श्रेष्ठ हैं, यदि मेरे गुरु भाई कहें कि जीवन भर मुझे मठ की नालियां साफ  करने का कर्तव्य निभाना है तो निश्चय ही मैं यही करूंगा...।’
विवेकानंद जातीय विषमताएं दूर करने के लिए अन्तर्वर्णीय विवाह के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने हिन्दू मानस का जीर्णोद्धार करने के लिए संस्कृति की वास्तविक पैरवी की। वे एक मानवतावादी विचारक थे जिन्होंने विद्या केन्द्रों को नई चेतना दी ताकि ये किताबें पंडित या अफसर पैदा करने वाले कारखाने बन कर न रह जाए, बल्कि इन विद्या केन्द्रों से माननीय गरिमा प्राप्त हो सकें। इसी तारतम्य में उन्होंने धर्म की जो व्याख्या की है वह अद्भुत है। ‘धर्म केवल प्रेम में प्रतिष्ठित है- बाह्य पूजा आंतरिक पूजा का प्रतीक मात्र है।’ आंतरिक पूजा और पवित्रता ही वास्तव में सब धर्मों का सार है। पवित्र रहना और परहित करना, जो दीन-दुर्बलों में शिव को देखता है वही शिव की सच्ची पूजा करता है। नि:स्वार्थता ही धर्म की असली कसौटी है।’
विवेकानंद जैसी बेचैन मेधा को जानने-समझने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें खंडित या सलेक्टिव आधार पर नहीं, बल्कि उन्हें अखंड और समग्र रूप से देखा जाए।  उनके विचारों को सम्पूर्णता में देखकर ही हम उनकी एक मुकम्मिल तस्वीर बना सकते हैं।


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