बुरी तरह उपेक्षित है कलन्दर समुदाय

राजस्थान के टोंक शहर में कलंदर समुदाय के लगभग 200 परिवारों की बस्ती है। यहां रहते हैं मुहम्मद नूर या नूर भाई जो कलंदर समुदाय के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के प्रयासों से जुड़े हैं। ...

भारत डोगरा
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क्यों रोक लगी परंपरागत रोजगार पर

राजस्थान के टोंक शहर में कलंदर समुदाय के लगभग 200 परिवारों की बस्ती है। यहां रहते हैं मुहम्मद नूर या नूर भाई जो कलंदर समुदाय के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के प्रयासों से जुड़े हैं। मुहम्मद नूर बताते हैं, मेरी बचपन की यादें यह है कि यहां के बहुत से परिवार रीछ का नाच व खेल दिखाते थे। मैंने स्वयं अनेक वर्षों तक यह खेल दिखाया है। पर सरकारी नीति इस आजीविका के विरुद्ध रही। अब स्थिति यह है कि हमारी बस्ती में रीछ का खेल दिखाने वाला कोई भी नहीं बचा है।
हमारे देश में तरह-तरह के परंपरागत हुनर से जुड़े हुए अनेक समुदाय हैं। बदलते समय के साथ, बढ़ती आबादी के साथ यह स्वाभाविक है और शायद जरूरी भी है कि इन समुदायों को अपनी गुजर-बसर के लिए परंपरागत रोजगार के साथ कुछ नए रोजगारों को भी अपनाना पड़े। अत: परंपरागत और नई आजीविका का एक संतुलन इन समुदायों के लिए जरूरी हो सकता है। इस तरह के संतुलन से महत्त्वपूर्ण हुनर की विरासत को बचाना संभव हो जाएगा। ऐसे हुनरों के साथ कई तरह का महत्त्वपूर्ण व्यवहारिक ज्ञान और महत्त्वपूर्ण समझ भी प्राय: जुड़ी होती है, तरह-तरह की कुशलता जुड़ी होती है। इस तरह के हुनर को प्राय: एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को किया जाता है, पर अब कई महत्ववपूर्ण हुनरों के संदर्भ में वह प्रक्रिया थम सी गई है। इस प्रक्रिया को जीवित रखना जरूरी है।
कलन्दर समुदाय एक ऐसा समुदाय है जो बुरी तरह उपेक्षित है व हाशिए पर धकेल दिया गया है। इस समुदाय में रीछ और बंदर का खेल दिखाने का बहुत समृद्ध हुनर था, पर हाल के वर्षों में इस खेल पर व इस हुनर पर सरकार ने रोक लगा दी। यह पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के नाम पर किया गया। पर इस हुनर से जुड़े लोग व अन्य जानकार लोग बताते हैं कि कलन्दर समुदाय द्वारा इन पशुओं से क्रूरता नहीं की जाती थी अपितु इन समुदायों द्वारा इन पशुओं की अच्छी देख-रेख की जाती थी। आखिर जब इस समुदाय की आजीवका ही इन पशुओं का खेल दिखाने से जुड़ी थी तो वे इनका ध्यान ठीक से क्यों न रखते। पर कलंदरों का पक्ष सुने बिना ही एकतरफ ा कार्यवाही कर बहुत अलोकतांत्रिक तरीके से कलंदर समुदाय की रीछ व बंदर से जुड़ी आजीविका पर रोक लगा दी गई।
राजस्थान के टोंक शहर में कलंदर समुदाय के लगभग 200 परिवारों की बस्ती है। यहां रहते हैं मुहम्मद नूर या नूर भाई जो कलंदर समुदाय के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के प्रयासों से जुड़े हैं। मुहम्मद नूर बताते हैं, मेरी बचपन की यादें यह है कि यहां के बहुत से परिवार रीछ का नाच व खेल दिखाते थे। मैंने स्वयं अनेक वर्षों तक यह खेल दिखाया है। पर सरकारी नीति इस आजीविका के विरुद्ध रही। अब स्थिति यह है कि हमारी बस्ती में रीछ का खेल दिखाने वाला कोई भी नहीं बचा है।
नूर भाई इस आरोप को सिरे से नकारते हैं कि रीछ या बंदर के प्रति कोई क्रूरता होती थी। वे बताते हैं कि आजीविका से जुड़े इन पशुओं को परिवार के सदस्य की तरह रखा जाता था। यहां तक कि वह पशु बीमार हो जाए तो उनके लिए मन्नत मांगी जाती थी, चादर चढ़ाई जाती थी कि यह जल्दी ठीक हो जाए। सर्दी बढऩे पर उनके लिए तंबू की व्यवस्था की जाती थी।
रीछ व बंदर का खेल कोई पशुओं के प्रति क्रूरता का खेल नहीं था अपितु इससे इंसान व पशुओं के संबंध का एक महत्वपूर्ण पक्ष उभर कर सामने आता था। रीछ को प्राय: बहुत खतरनाक पशु माना जाता है, पर प्राय: अपने प्रशिक्षण के दौरान वह बहुत सी बातें सीखता था और बहुत मनोरंजन से भरे माहौल में वह अपने करतब लोगों को दिखाता था। जब उसका प्रशिक्षक उसे शराबी का अभिनय करने को कहता, तो वह जमीन में लोट कर दिखाता। जब प्रशिक्षक कहता कि भाई, बहन, दोस्त आदि की कसम खाओ कि झूठ नहीं बोलोगे तो वह हां में सिर हिला देता पर पत्नी की कसम खाने के लिए कहने पर नकारात्मक सिर हिला देता।
इस तरह के मनोरंजक खेल से जुड़ी आजीविका को उजाडऩा उचित नहीं था। यदि यह आजीविका ऐसी ही उजड़ी रही, तो यह हुनर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा व इस तरह इंसान व पशु के संबंध का एक आयाम समाप्त हो जाएगा। अत: इस आजीविका को नया जीवन मिलना चाहिए व उसके साथ कलंदर समुदाय को नई व विविध आजीविकाओं के अवसर भी मिलने चाहिए।
नूर भाई बताते हैं कि आज मेरे पास तो यह हुनर सुरक्षित है, पर मेरे बाद आगे की पीढ़ी भी इसे अपनाए यह तभी संभव होगा यदि सरकार अपनी प्रतिकूल नीतियों को वापस ले व इस हुनर को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाए।


 

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