पेंगुइन

एक बाएं हाथ से उठाता और घुमाकर अस्सी योजन आकाश में फेंक देता...

देशबन्धु
देशबन्धु

एक बाएं हाथ से उठाता और घुमाकर अस्सी योजन आकाश में फेंक देता। फिर दाएं हाथ से उठाता और दूसरी दिशा में उतना ही ऊपर उछाल देता। भीम-सी अकूत ताकत, पता नहीं, कहां से आ गई थी उसमें। सड़क पर उसकी तरफ आने वाली कोई भी कार या बस उससे बच नहीं पा रही थी।

पर नौ बजते न बजते वह हांफने लगा था और बसों-कारों का अटूट सिलसिला उसके दोनों बगल आ-जा रहा था। मेडिकल के चौराहे पर बत्ती लाल हुई तो आंखें फाड़े इस अंतहीन काफिले को असफल पहलवान-सा ताकने लगा।

दुबारा आकाश में उछाल देने की हिम्मत उसने जुटाई और चालू हो गया। जाने वाली कतार की गाड़ियां फेंकते उसका ध्यान आने वाली गाड़ियों पर भी था, जिन्हें गुजर देने के लिए वह मजबूर था। इससे उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था। वह आज एक भी गाड़ी सड़क पर नहीं रहने देना चाहता था... शहर के प्रदूषण का एकदम अंत।


कोई कह रहा था वह पर्यावरण वैज्ञानिक था, कोई कह रहा था कैंसर विशेषज्ञ!

जल्द ही वह हांफने लगा। आखिर इस तरह वह कितनी बसें-कारें फेंक सकता था? थक गया। भूख लग आई। वह बैठ गया और पैरों के बल चलने लगा। सड़क के बीचोंबीच मानो अंटार्टिका से उजड़ा कोई पेंगुइन चल रहा हो।वाहनों का रेला उसके दोनों बाजू बदस्तूर जारी था।
 जसवीर चावला

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