स्मृति शेष : डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी

‘बदउं गुरूपद कंज....!’ के विचार जब भी मेरे जेहन में आते हैं, गुरूदेव डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी जी का व्यक्तित्व मेरे मानस पटल पर उभर आता है। कुछ भी लिखने से पहले जब गुरू-स्मरण का ध्यान आता है, ...

देशबन्धु
स्मृति शेष : डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी
देशबन्धु

डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’
बंदउं गुरूपदकंज.
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‘बदउं गुरूपद कंज....!’ के विचार जब भी मेरे जेहन में आते हैं, गुरूदेव डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी जी का व्यक्तित्व मेरे मानस पटल पर उभर आता है। कुछ भी लिखने से पहले जब गुरू-स्मरण का ध्यान आता है, आपकी शैली दौडऩे लगती है दिमाग में। मेरी कोई ऐसी किताब नहीं, जिसमें आपका उल्लेख नहीं हो, मेरा कोई ऐसा शोधपरक व्याख्यान नहीं, जिसमें आपका जिक्र न हुआ हो। जब भी क्लास में प्रवेश करता हूं, आपकी तीव्र गति की उपस्थिति लेना और व्याख्यान का प्रत्यास्मरण संस्कारवत् हो जाता है। समीक्षा शास्त्र हो या व्यंग्यालेख, सब जगह आप मेरे साथ लगते हैं। एक नई उर्जा के स्रोत के रूप में आप मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों को जाने-अनजाने सकारात्मक सोच के साथ प्रभावित करते रहे हैं।
19 फरवरी, रविवार की वह मनहूस दोपहरी! एक प्रतियोगी परीक्षा की पहली पाली सम्पन्न होने के बाद देश-दुनिया को देखने के लिए जब फेसबुक खोला तो व्यंग्यश्री सुभाष चंदर जी लिखकर सूचित कर चुके थे कि कि बालेन्दु जी अब हमारे बीच नहीं रहे। अब आप नहीं हैं, ऐसा कैसे कहा जा सकता है! एक शिक्षक के रूप में अपने विद्यार्थियों के बीच, मित्र के रूम में प्राध्यापकों के बीच, रचनाकार के रूप में लेखकों-समीक्षकों के बीच और हास्य-व्यंग्यकारों के बीच प्रखर व्यंग्यकार की तरह हर जगह आपकी उपस्थिति आज भी बनी हुई है। पर मेरे लिए तो आप इन सबसे अधिक, शिक्षक, गुरू, मार्गदर्शक और बड़े भाई होने के साथ ही और भी जाने क्या-क्या थे। इसीलिए अब आपके बारे में कुछ लिखते वक्त हाथ कांपने लगता है कि क्या ऐसे बहुविध व्यक्तित्व के लोग आगे भी मेरे भाग्य में हैं!
विद्यार्थी जीवन की बात हो, या बाद की, कभी भी तिवारी जी अपने विद्यार्थियों से विलग नहीं हुए। जब कभी कुछ पूछना हुआ, जवाब आपकी जुबान पर मिला। किसी लेखकीय विधान की रचना का विचार जैसे ही हमारे मन में आया, उनके सामने रखा गया और त्वरित समाधन की कुंजी थमा दिये हमें। याद है, उनकी इसी प्रतिभा के कारण एक बार डॉ. कमल बोस प्राध्यापक, संत जेवियर्स कालेज, रांची ने मुझसे कहा था-‘‘तिवारीजी हमारे लिए प्रयोजन मूलक तिवारी हैं।’’ पटना में आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा और कुमार विमल जैसे विद्वानों का प्राध्यापकीय गुरूत्व तो उन्हे मिला ही, सासाराम के एसपी जैन कॉलेज में रामेश्वर सिंह कश्यप ‘लोहासिंह’ जैसे व्यंग्यकार प्राचार्य का और रांची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में डॉ. रामखेलावन पाण्डेय, डॉ. बचनदेव कुमार, डॉ. दिनेश्वर प्रसाद, डॉ. सिद्धनाथ कुमार जैसे विद्वानों का भी सानिघ्य उन्हें सहजता से प्राप्त हुआ था। डॉ. नागेश्वर लाल, डॉ. अशोक प्रियदर्शी, डॉ. सिद्धेश्वर प्रसाद जैसे लोगों का प्राध्यापकीय अग्रजत्व मिला तो डॉ. जंगबहादुर पाण्डेय, कमल बोस, जयप्रकाश पाण्डेय जैसे कई कुशल शिष्यों की जमात उन्होंने ही तैयार की है।
तिवारी जी हमारी रचनात्मक दुनिया में पारस की तरह उपलब्ध रहे। जो कोई उनके संपर्क में आया वह, रचनाकार बना ही। चाहे लेखक न हो, समीक्षक है, श्रोता है, या दिल खोलकर हंसनेवाला है। एक शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों को सकारात्मक जीवन की सहज प्रेरणा देनेवाला ऐसा दूसरा व्यक्तिव मैं आज तक तलाश ही रहा हूं। देश-दुनिया की साहित्यिक गतिविधियों की अद्यतन जानकारी रखनेवाले तिवारी जी को आज की शब्दावली में इंटरनेट ही कहा जाएगा। कौन कहां पर क्या लिख-पढ़ या शोध रहा है, तिवारी जी अपने विद्यार्थियों को बड़ी आसानी के साथ बतलाने में माहिर थे।
आपकी अनुसंधान दृष्टि तो ऐसी थी कि आप शोध निर्देशकों का भी निर्देशन करने में पीछे नहीं रहेे। किसी विषय पर अनुसंधान करना हो तो शोध निर्देशक यही कहते थे कि-‘पहले तिवारी जी से संपर्क कीजिए।’ ऐसा मैंने रांची विश्वविद्यालय के परिसर में कई बार सुना है। ऐसा सिर्फ हिन्दी विषय के साथ ही नहीं था। एक बार मेरा एक मित्र किसी प्राध्यापक के कहने पर अंग्रेजी विषय में पीएच-डी करने का विचार लेकर उनके समक्ष चर्चा करने के लिए उपस्थित हुआ था। वर्ड्सवर्थ की कविता पर पीएच-डी की सिनॉप्सिस उससे नहीं बन पा रही थी। गुरूदेव ने दस मिनट के अंदर ही वडर््सवर्थ और सुमित्रा नन्दन पंत के काव्य को लेकर एक रूपरेखा बना दिया था।
कुल आयु लगभग 68 साल और आपकी कुल छोटी-बड़ी कृतियों की संख्या भी इतनी ही। अपने जीवन के लगभग पांच दशकों के रचनात्मक इतिहास में आपने व्यंग्य विधा सहित लघु व्यंग्य, नाटक, कविता, व्यंग्यालोचन, और पत्रकारिता में तीसाधिक कृतियों का सृजन किया है। इनके अतिरिक्त अध्ययन और अनुसंधान से जुड़ी दो दर्जन से अधिक श्रेष्ठ ग्रंथों की रचना में आपने अपनी लेखनी का प्रयोग धारदार हथियार की तरह किया है। सिर्फ आंकड़ों की बात करें तो हिन्दी के चार दर्जन से अधिक विद्यार्थियों को आपने अपने सीधे मार्गदर्शन में डॉक्टर बनाया है। जबकि आपका परोक्ष मार्गदर्शन लेकर न जाने कितने लोगों ने अपने को शिक्षक, प्राध्यापक और इंसान बनाया है।
मेरी जानकारी के अनुसार 2016 में परिक्रमा प्रकाशन, दिल्ली से छपी हुई ‘नमनोस्मरण’ उनकी अंतिम कृति है। यह उनके संस्मरणों का संग्रह है। इसमें उन्होंने अज्ञेय, यशपाल, नागप्पा, परसाई, रवीन्द्रनाथ त्यागी, रामावतार  चेतन, शरद जोशी, काका हाथरसी, नागार्जुन, भुशुंडी, लोहासिंह सहित अपने पारिवारिक जनों के अविस्मरणीय संस्मरण संजोये हैं। इसमें एक जगह उन्होंने लिखा है कि एक बार जब वे जबलपुर में परसाई जी के साथ किसी रेलवे गुमटी पर पान खाकर लौट रहे थे तो ट्रेन आने की सूचना से गुमटी बंद हो गई थी, जिसके चलते दोनो वहीं रूक गये थे। वे लिखते हैं-‘‘सहसा परसाई ने जो कहा, वह मेरे लिए किसी भारतरत्न से कम नहीं था। परसाई बोले-‘इस ट्रेन के अभागे यात्रियों को नहीं पता कि यहां गुमटी पर हिन्दी का सबसे बड़ा व्यंग्यकार और सबसे बड़ा व्यंग्य समीक्षक खड़ा है।’’
किसके जीवन में विपरीत परिस्थितियां नहीं आतीं! इनके जीवन में भी आईं। बचपन में ही पिता की छाया गई तो दादाजी ने ही पितृत्व प्रदान किया। घरेलू परिवेश ऐसा कि दादी को ही मां की तरह मानते आये। पर कभी कमजोर नही हुए तिवारी जी। विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को व्यवस्थित करनेवाले गुरूदेव को हास्य और व्यंग्य की कला बचपन में ही आ गई थी। बीस बरस की उम्र में ही आपने व्यंग्यकारी दुनिया में अपनी पहचान स्थापित कर ली। याद आ रहा है कि छठवें दशक (1967) में काशी से प्रकाशित होनेवाली एक ‘भोजपुरी कहानियां’ नामक पत्रिका ने जो एक व्यंग्य विशेषांक निकाला था उसमें तिवारी जी की पहचान नये रचनाकार के रूप में नहीं, स्थापित व्यंग्यकार के रूप में है।
ऐसे साहित्य मनीषी का शिष्य होने पर किसे गर्व नहीं होगा! जो कोई उनकी कक्षा में बैठा है, उन्हें मंचों से व्यंग्यपाठ करने सुना है, वह उनका अपना होगा ही। मेरा सौभाग्य कि कक्षा में तो उनसे पढ़ा ही आकाशवाणी सहित कई काव्य पंचों पर भी साथ में काव्यपाठ किया। अत: मैं कह सकता हूं कि एक शिष्य को अनुज, और फिर समानधर्मी रचनाकार बनाने की कला सिर्फ तिवारी जी जैसे विशेष लोगों में ही होती है। पत्राचारी जमाने में सदैव ‘प्रियवर’ के संबोधन से संबोधित करनेवाले मेरे गुरूदेव मेरे लिए सदैव आशीर्वादी मुद्रा मे ही मिले। पारिवारिक जुड़ाव ऐसा कि श्रीमती जी को ‘बहु’ ही संबोधित किये। अब ऐसे संबंध और संबोधन अतीती शब्दकोश के लिए सुरक्षित हो रहे हैं। जब कभी अपने आयोजनों में मैने बुलाया, वे जरूर आये। पीएच-डी की मौखिकी लेने के लिए स्कूटर पर पीछे बैठकर स्टेशन से महाविद्यालय तक जानेवाले तिवारी जी जैसे बाह्य परीक्षक अब कहीं नहीं मिलेंगे।
जब मेरी पहली पुस्तक छपने जा रही थी, तब कुछ परामर्श मांगने पर आपने कहा था-‘‘ध्यान रखिएगा! पुस्तक ऐसी होनी चाहिए, जो हाथ में लेने पर पुस्तक जैसी लगे।’’ दूसरी किताब ‘भोजपुरी साहित्य में हास्य-व्यंग्य’ की भूमिका लिखने का जब मैने निवेदन किया था, तब उन्होंने मुझे न देकर सीधे प्रकाशक को ही भेजने का आश्वासन देते रहे। बहुत निवेदन के बाद भी भूमिका मेरे पास नहीं भेजकर सीधे प्रकाशक के पास भेज दिये थे। इसमे एक बहुत बड़ा राज था। पहली बात तो यह कि भूमिका मेरी पांडुलिपि से पहले ही प्रेस में चली गई थी। पर रहस्य तो तब खुला जब पस्तक छपकर मेरे पास आई। उन्होंने लिखा है-‘‘डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ मेरे प्रिय और समानधर्मा छात्र रहे हैं। मुझे अफसोस है कि उन्होंने अपना शोधकार्य मेरे निर्देशन में नहीं किया। मुझे प्रसनता है कि उन्होंने अपना शोधकार्य रांची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर अग्रज डॉ. अशोक प्रियदर्शी के निर्देशन में किया।’’
 मुझे क्या पता कि रांची विश्वविद्यालय में मुझे शुरू से ही जिनका इतना स्नेहाशीष मिलता रहा है वे गुरूदेव मुझे अपने मार्गदर्श में एक सामान्य विद्यार्थी से डॉक्टर भी बनाना चाहते थे?
विभागाध्यक्ष-हिंदी
शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय
राजनांदगांव (छ. ग.) पिन- 491 441


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