गांधी समाधि पर नंगे पांव

यह गजब का सौभाग्य है कि इतनी रोमांचक सदी में मेरा जन्म हुआ। कृतज्ञता के ऐसे भाव मेेरे मन में तब उठे जब मुझे एक खबर पढऩे को मिली थी...

अन्य
गांधी समाधि पर नंगे पांव
अन्य

अलबर्ट कामू
यह गजब का सौभाग्य है कि इतनी रोमांचक सदी में मेरा जन्म हुआ। कृतज्ञता के ऐसे भाव मेेरे मन में तब उठे जब मुझे एक खबर पढऩे को मिली थी कि सर्वश्री ख्रुश्चेव और बुल्गानिन अपने जूते उतार कर, केवल मोजे पहने गांधी-समाधि पर फूल चढ़ाने पहुंचे। मैं ऐसा कभी सपने में भी सोच नहीं सकता था! सर्वशक्तिमान मार्शल और उनके प्रधानमंत्री ने एक योगी का सम्मान करने के लिए अपने जूते निकाले। पर ऐसा ही हुआ! सच में ऐसा ही हुआ। पूरी दुनिया अचरज से देखती रही। दो सौ बख्तरबंद फौजी डिवीजनों और एक फौलादी शासन प्रणाली के ताकतवर मुखिया अहिंसा के एक महान पुजारी का सम्मान करने पहुंच गए।
सही है, इस तरह की श्रद्धांजलि देने से किसी का कुछ घटता-बढ़ता नहीं है। यह भी सही है कि कूटनीति की तिकड़म में प्रवीण महान लोगों को अपने मोजे उतारने में तब कोई झिझक नहीं होती जब उसका फायदा एकदम साफ दिख रहा हो। चाहे फिर इसके लिए उन्हें अपने सुंदर, जरीदार जूतों पर फिसलकर गिरने की नौबत ही क्यों न आना पड़े, अगर कोई गांधी उनसे सही में मिलने आ जाए।
इस घटना विशेष में एक नाटकीय अंतर्विरोध था। यह साधारण घटना नहीं थी। राजघाट पर फूल और सम्मान अर्पित करना इन नेताओं के लिए कतई आसान नहीं था। खासकर उस गांधी के सम्मान में, जिसे सोवियत विश्वकोष सालों-साल ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एजेंट बताता आया है। सोवियत प्रचार-तंत्र गांधी को एक ऐसा कुटिल नेता बताता रहा है, जो लोगों की भावनाएं भडक़ा कर अपने लिए राजनीतिक समर्थन जुटाता है। कितना कठिन रहा होगा ऐसे प्रचार-तंत्र के शीर्ष पर बैठे इन सेनाधिपतियों के लिए अपने जूते उतार उनकी समाधि पर फूल चढ़ाना!
सोवियत संघ के संस्थापक लेनिन और गांधी के बीच मतभेद गहरे और मूलभूत हैं। ऐसा नहीं था कि गांधी किसी भी मायने में लेनिन से कम यथार्थवादी थे। गांधी मानते थे कि हिंसा का स्वभाव ही ऐसा है कि वह हिंसक व्यक्ति को दबोच कर रखती है। ऐसे व्यक्ति का मानस हत्या के उपाय ढूंढ़ता है, अपनी मौलिकता नहीं खोजता है और आखिरकार उसकी हिंसा प्रभावहीन हो जाती है।
क्या गांधी के इस सत्व को सोवियत सरकारें लगातार गांधी का सबसे बड़ा दुर्गुण नहीं बताती आ रही हैं? गांधी का विरोध इसलिए नहीं होता था कि वे अहिंसा का सबक सिखाते थे। नहीं, सोवियत संघ गांधी को उलाहना इसलिए देता था क्योंकि उन्होंने बिना किसी की हत्या किए 40 करोड़ लोगों के देश को आजाद करवा दिया था। जिसे उन्होंने यथार्थ बताया था, वह आखिर में सिद्ध हो गया? क्या गांधी के इस अपराध को कभी माफ  किया जा सकता है! सोवियत वाले यथार्थ पर अपना एकाधिकार जो मानते हैं।
चाहे कुछ भी हो, लगातार गांधी का मजाक उड़ाने और उन्हें उलाहना देने के बाद, आखिरकार क्रेमलिन के नेताओं ने इस महान यथार्थवादी सबक को सलाम कर ही लिया। अब चाहे जो उलट-पलट होती हो सो हो, चाहे जनता कितनी भी सहनशील बनी रहे और राज करने वालों के पाप भूल जाए, कुछ बातें तो अब निश्चित हैं। अब कुछ अनैतिक बातें करना उतना आसान नहीं होगा, क्योंकि उसके विरोध का भाव गांधी के काम की वजह से जगह-जगह फैल गया है।
जब सत्तावान लोग अनैतिक बातें करेंगे, गांधी एक बार फिर सामने आ जाएंगे। उन्होंने सिखाया ही है कि संवाद करना, लगातार संवाद करना भी एक कर्म है, जिससे इतिहास रचा जा सकता है। जरूरी यह है कि व्यक्ति अपनी बातें और अपने जीवन में इतनी एकरूपता ले आए कि वह आजीवन टूटे नहीं। गांधी कहते थे कि सत्य का आग्रह, सौम्यता की मजबूती और शांति की शक्ति ही हिंसा की शातिर हठधर्मिता को जीत सकता है। गांधी की इस बात का साक्ष्य लाखों लोगों ने पिछले दस साल से लगातार दिया है, अंग्रेज सरकार की गोलियों का सामना कर के भी।
ये दोनों सत्ताधीश अब एक कदम और आगे बढ़ा सकते हैं, अपने आपको राजघाट के लायक सिद्ध करने के लिए। उदाहरण के लिए  ख्रुश्चेव साहब ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा कि कोई भी देश सही मायनों में स्वतंत्र तब तक नहीं हो सकता जब तक उसके पास अपने उद्योग न हों। गांधी उनकी इस वाजिब बात से एकदम सहमत होते। गांधी ने चरखे के माध्यम से दिखलाया था कि अगर आजादी के साथ रहना हो, तो अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए किसी और पर निर्भर रहा नहीं जा सकता। परंतु ख्रुश्चेव साहब की बात सुनकर गांधी उन्हें टोकते जरूर कि औद्योगिक आत्मनिर्भरता ही आजादी के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके लिए कुछ और भी आत्मनिर्भरताएं चाहिए। गांधी जरूर दिखलाते उस दूरी को जो माक्र्सवाद के अर्धसत्यों को उस विचार से अलग करती है जो यथार्थ है, सत्य है, और व्यापक है।
लेकिन हमें बहुत ज्यादा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अगर उस विनम्र समाधि से विवेक की एक सांस भी हमारे पश्चाताप करने वाले अधिकारियों को उस दिन मिली हो, तो यह हमारे लिए आनंद का विषय होगा। चाहे वह अनुभूति एक क्षण भर की ही क्यों न हो, वह उन दो शक्तिशाली शासकों को रूस के साधारण लोगों की शाश्वत और असली महानता से परिचित कराएगी। अगर हमारी ऐसी अभिलाषाएं एक-दूसरे से जुड़ पाई, तो हम सब मिल-जुल कर एक सार्वजनिक तीर्थयात्रा की कामना करेंगे। ऐसी यात्रा जिसके दौरान हमारे तरह-तरह के सत्ताधारी लोग, साथ ही उनके दार्शनिक और विदूषक भी, हमारे समय के उस सबसे महान व्यक्ति से क्षमा मांगेंगे क्योंकि उन्होंने बारंबार  गांधी  का अपमान किया है, सालों-साल उन्होंने निर्लज्जता के साथ अपने हिंसक कर्मों को, अपने युद्धों को शांति के घोषणापत्रों से ढका है।

 


 

 

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

संबंधित समाचार