महाकवि 'निराला'

सखि, वसंत आया। भरा हर्ष वन के मन। नवोत्कर्ष छाया। सखि, वसंत आया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका। मिली मधुर प्रिय उर तरु-पतिका...

देशबन्धु
महाकवि
Mahakavi Nirala
देशबन्धु

सखि, वसंत आया। भरा हर्ष वन के मन। नवोत्कर्ष छाया। सखि, वसंत आया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका। मिली मधुर प्रिय उर तरु-पतिका...।

हिंदी साहित्य में वसंत को समर्पित सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक इस कालजयी कविता के रचनाकार 'निरालाÓ नाम से मशहूर सूर्यकांत त्रिपाठी का जन्म वसंत पंचमी के दिन ही 1896 में बंगाल के मेदनीपुर जिले में हुआ था। माता-पिता से उन्हें 'सूर्य कुमारÓ नाम मिला था, लेकिन काव्य क्षेत्र में पदार्पण के बाद उन्होंने अपना नाम बदल कर 'सूर्यकांतÓ कर लिया। बाद में अपने निराले स्वभाव के चलते ही 'निरालाÓ उपनाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया।

22 वर्ष की अल्पायु में विधुर होने के बाद जीवन का वसंत भी उनके लिए पत्नी-वियोग का पतझड़ बन गया। हालांकि पत्नी की प्रेरणा से निराला ने बंगाल से उत्तर प्रदेश अपने गांव गढ़ाकोला (जनपद उन्नाव) लौटकर हिंदी साहित्य का व्यापक अध्ययन किया। उनकी पहली कविता 'जूही की कली' (1916) तत्कालीन प्रमुख साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वतीÓ में प्रकाशन योग्य न मानकर संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लौटा दी थी। आज उसकी गिनती छायावाद की श्रेष्ठतम कविताओं में होती है। 1923 में निराला ने 'मतवाला' नामक पत्रिका का संपादन आरंभ किया, जो हिंदी का पहला व्यंग्यात्मक पत्र था।  सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा अपने संस्मरण 'पथ के साथी' में लिखती हैं 'उनके अस्त-व्यस्त जीवन को व्यवस्थित करने के असफल प्रयासों का स्मरण कर मुझे आज भी हंसी आ जाती है। एक बार अपनी निर्बंध उदारता की तीव्र आलोचना सुनने के बाद उन्होंने व्यवस्थित रहने का वचन दिया।

संयोग से तभी उन्हें कहीं से 300 रुपए मिल गए। अगले दिन पहुंचे। बोले-50 रुपये चाहिए... किसी विद्यार्थी का परीक्षा-शुल्क जमा करना है, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा। संध्या होते-होते किसी साहित्यिक मित्र को 60 रुपये देने की जरूरत पड़ गई। दूसरे दिन लखनऊ के किसी तांगे वाले की मां को 40 रुपये मनीआर्डर करना पड़ा। दोपहर को किसी दिवंगत मित्र की भतीजी के विवाह के लिए 100 रुपये देना अनिवार्य हो गया। इस तरह तीसरे दिन उनकी जमा धनराशि समाप्त हो गई और तब उनके व्यवस्थापक के नाते यह दान-खाता मेरे हिस्से आ पड़ा। मैंने समझ लिया कि यदि ऐसे औघड़दानी को न रोका जाए तो वह मुझे भी अपनी स्थिति में पहुंचाकर दम लेंगे।' फक्कड़ होते हुए भी वह 'अतिथि देवो भव' मंत्र को कभी नहीं भूले।


महादेवी लिखती हैं 'उनके अतिथि यहां भोजन करने आ जावें, सुनकर उनकी दृष्टि में बालकों जैसा विस्मय छलक आता है। जो अपना घर समझ कर आए हैं, उनसे यह कैसे कहा जाए कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे घर जाना होगा। भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन मांजने तक का काम भी वह अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते।' महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत बताते हैं कि अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए गांधी-नेहरू जैसी हस्तियों को फटकार देना निराला का स्वभाव था। आकर्षक और ओजपूर्ण व्यक्तित्व के कारण उन्हें आलोचक 'महाप्राण' कहते थे।

1935 में पुत्री के निधन के बाद वह विक्षिप्त-सी अवस्था में कभी लखनऊ, कभी सीतापुर, कभी काशी तो कभी प्रयाग का चक्कर लगाते रहे। 1950 से वह दारागंज, प्रयाग में स्थायी रूप से रहने लगे। वहीं 15 अक्तूबर 1961 को उनका देहावसान हुआ। अवरोधों और दैवीय विपत्तियों के बावजूद निराला कभी साहित्य-रचना से उदासीन नहीं हुए।

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