यह राजनीति हो रही है या षड्यंत्र रचा जा रहा है?

चकल्लस और हँसी मजाक में वही महीन सा अंतर है जो षड्यंत्र और राजनीति में है, हमेशा आप देखेंगे कि लोग हँसी मजाक में तो आनन्द लेते हैं मगर जैसे ही हँसी मजाक हद पार कर चुभने लगती है...

देशबन्धु
यह राजनीति हो रही है या षड्यंत्र रचा जा रहा है?
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- समीर लाल 'समीर'

चकल्लस और हँसी मजाक में वही महीन सा अंतर है जो षड्यंत्र और राजनीति में है, हमेशा आप देखेंगे कि लोग हँसी मजाक में तो आनन्द लेते हैं मगर जैसे ही हँसी मजाक हद पार कर चुभने लगती है तो लोग पल्ला झाड़ लेते हैं कि यार!! क्या चकल्लस मचा रखी है? हमको इस चकल्लस से दूर ही रखो।

राजनीति तो लोकतंत्र की शान है मगर षड्यंत्र उसी राजनीति को घृणा का पात्र बना देता है, आज तो ये इतना कुछ आपस में घुल मिल गये है कि समझना मुश्किल हो जाता है कि यह राजनीति हो रही है या षड्यंत्र रचा जा रहा है? वही हाल हँसी मजाक का हो गया है, लोग बात हँसी मजाक में करते हैं और उद्देश्य होता है सामने वाले को नीचा दिखाया जाये..ऐसे में फिर चकल्लस और हँसी मजाक में भेद कर पाना भी मुश्किल होता जा रहा है।

चुनावों के दौरान 'चुनावी चकल्लस' भी शायद इसी घाल मेल का नतीजा हो मगर मुझे इस चकल्लस का भविष्य बड़ा ही चुनौतीपूर्ण लग रहा है।

जमाना बदल रहा है, आज वैश्विक स्तर पर बात डिजिटल, इलेक्ट्रानिक आदि से बहुत आगे बढ़कर आर्टिफिशियल इंन्टेलिजेन्स (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और मशीन लर्निंग (यंत्र अधिगम) की चल रही है इस ग्लोबल विलेज में इसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। आर्टिफिशियल इंन्टेलिजेन्स को ऐसे समझें कि किसी सिस्टम में ढेर सारे लॉजिक डाल दिये हो जैसे कि अगर बंदा चाय की पत्ती खरीदे तो सिस्टम उसे बताये कि दूध तो तुमने लिया ही नहीं.. इसके साथ अमूल का दूध अच्छा रहेगा और बंदा दुकान में इस मैसेज को पढ़ फिर दूध भी अपनी शॉपिंग कार्ट में रख ले। मगर अमूल के सुझाये दूध की बजाय नेस्टले का दूध रखे। अब अगली बार जब बंदा चाय की पत्ती खरीदेगा तो सिस्टम उसे याद दिलायेगा कि वो नेस्टले वाला दूध ले लो, यह अमूल की जगह व्यक्ति विशेष को उसकी पसंद के पिछले अनुभव के आधार पर नेस्टले सुझाना मशीन लर्निंग कहलायेगा। यह उदाहरण मात्र विषय को समझाने हेतु पेश किया है। विषय इससे बहुत गहन है, मशीन लर्निंग का जिन्दा उदाहरण हमारे इर्द गिर्द पति पत्नी के रुप में सदियों से रहा है मगर कभी इस तरफ किसी का ध्यान ही न गया। हर पत्नि जानती है कि उसके पति के हर कदम के बाद वह क्या कदम उठायेगा। यह आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स कहलाया, शुरु में भूल हो भी जाये तो समय के साथ साथ तो कुछ ही बरसों में उसकी अवधारणा अचूक हो जाती है और पति वही कदम उठाता है, यह मशीन लर्निंग कहलाया।

इसी के चलते न्यूजीलैण्ड ने एक रोबोट बना लिया है. नाम दिया है मिस्टर सैम, उसके अंदर ऐसे ऐसे समीकरण डाल दिये हैं कि एक सबसे बेहतरीन इन्सान के सारे गुण उसके अंदर भर डाले हों। इतना बेहतरीन इंसान कि उसे वह 2020 में न्यूजीलैण्ड में चुनाव लड़वाने की सोच रहे हैं, सोचिये, एक बेहतरीन इन्सान, जिसमें सबसे अच्छे अर्थशास्त्र के नियम, विदेश निति, फायनेन्स, कानून, संविधान, कृषि, बेस्ट प्रेक्टिसेस आदि आदि सब कुछ कूट-कूट कर प्रोग्राम कर दिये गये हों, उससे बेहतर कौन हो सकता है जो देश को ही नहीं, विश्व को भी नेतृत्व प्रदान करे, जो भी बात करे उसके पीछे तथ्य हों, ज्ञान हो, नियम हो, तर्क हो.. कौन न चुनना चाहेगा ऐसा नेता? लोग तो इसमें से कोई भी योग्यता न होने पर भी मात्र इस दिशा में जुमलेबाजी कर विश्व को नेतृत्व प्रदान करने का सपना पाल बैठे हैं, और जनता भी इसमें उलझ कर कम से कम अपने देश का नेतृत्व तो उनको सौंप ही चुकी है।

खैर, न्यूजीलैंड का क्या होगा, मुझे नहीं पता, मगर विचार बनता है कि उस रोबोट को जो आर्टिफिशयली इन्टेलिजेन्ट है और मशीन लर्निंग के युग का है, उसे अगर भारत लाकर चुनाव लड़वा दें तो क्या होगा?


पहले पहल तो जब वो नया नया आकर चुनाव लड़ेगा तो उसमें भरे चुनाव जीतने के समीकरण (आर्टिफिशयली इन्टेलिजेन्ट) के आधार पर वह जनता के पैर छुयेगा, हाथ जोड़ेगा, सब बुजुर्गों को बाबू जी और अम्मा जी पुकारेगा, भाषण के शुरुवात भाईयों बहनों से करेगा, बीच बीच में अर्श को फर्श पर ले आने का सपना दिखाते हुए सबको मितरों पुकारेगा। अच्छी अच्छी बातें करेगा, गरीबी कैसे भूतकाल की बात होगी, कृषि कैसे बदलेगी..मशीन में आलू डालकर सोना कैसे निकाला जा सकेगा से लेकर बनारस को शंधाई बना देने का एक्शन प्लान और रोड मैप प्रस्तुत करेगा, कांग्रेस मुक्त की जगह भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन वाले देश में कौन सी नितियाँ निर्धारित होंगी जो देश को इस दिशा मे ले जायेंगी। 'मेक इन इंडिया' और 'मेड इन इंडिया' से परे 'मेक इंडिया द बेस्ट' की बात करेगा। भाषण में आवाज के उतार चढ़ाव और वाईस क्वालिटी को ओशो सा ओजपूर्ण और चुम्बकीय बनाना तो रोबोट बनाने वालों के लिए बायें हाथ का खेल है, कब रोना है, कब अपने आपको शहर का बेटा बोलना है, कब कौन सी भाषा में बात करना है..इन सब की महारत तो उसकी आर्कीटेक्चर का बहुत मामूली से हिस्सा होगा....

उससे बेहतर नेता मिलना कम से कम देश में तो न संभव हो पायेगा...वो और अगर वो चुनाव लड़ा तो  उसकी पार्टी की सुनामी के आगे कोई न टिक पायेगा... बस उसके चुनाव जीतने डर नहीं लगता साहेब.. ससुरी मशीन लर्निंग से डर लगता है।

जैसे ही वो पूर्ण बहुमत लेकर देश के नेतृत्व की कमान संभालेगा.. वो अपने पहले के नेतृत्व को मिनटों में अपने में समाहित कर लेगा..मात्र डाटा और व्यवहार डाऊनलोड टाईप की बात ही तो है..अपने आस पास देखगा और तुरंत सीख जायेगा..अपने पहले के नेताओं के व्यवहार का आंकलन करेगा और सीख जायेगा।

तब आप देखेंगे कि उसे मालूम हो जायेगा..कि अगर वो गरीबी हटा देगा तो अगला चुनाव किस मुद्दे पर लड़ेगा? भ्रष्टाचार मुक्त देश कर देगा तो पार्टी फंडिंग कहाँ से होगी? अगले चुनाव में कौन सा व्यापारी घराना उसे प्रचार हेतु हवाई जहाज और फंड देगा? फंड न होंगे तो कैसे वो दूसरी पार्टी के नेताओं को बहला फुसला कर उनकी खरीद फरोक्त करेगा? कश्मीर अगर शांत हो गया तो देश का ध्यान अन्य मुद्दों से कैसे भटकायेगा? सब देखते समझते वो इंसान रुपी मशीन..मशीन रुपी इंसान में बदल जायेगी।

फिर आप पायेंगे..इसमें वो सारे गुण अवगुण तो होंगे जो आज के नेताओं में है मशीन लर्निंग के कारण ..बस जो न होगा वो होगी संवेदनशीलता..जो हर नेता में लाख बुराई के बावजूद एक तिल ही मात्र हो ..होती तो है...मशीनयुग उसे भी समाप्त कर देगा..
कितना भयावह है यह विचार भी न!!

बस फिलहाल तो यह कहने का मन है कि हमें इस चकल्लस से दूर ही रखो!!

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