भारत में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च है

कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है...

देशबन्धु
भारत में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च है
Constitution
हाइलाइट्स
  • कार्यपालिका - न्यायपालिका के बीच सार्वजनिक बहस लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक

- जाहिद खान 

कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है। संविधान दिवस के मौके पर आयोजित हुए एक कार्यक्रम में केन्द्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने-अपने वक्तव्य में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर जो बातें रखीं, वे इस बात का इशारा कर रही थीं कि सरकार और न्यायपालिका के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं। कहीं न कहीं कुछ कसक है, जो अंदर ही अंदर चुभ रही है। शुरूआत विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में दीगर बातों के अलावा यह सवाल उठाया कि क्यों निष्पक्ष न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका उन पर और प्रधानमंत्री पर विश्वास नहीं करती है?

वे यहीं नहीं रुक गए, बल्कि उन्होंने न्यायपालिका को यह नसीहत भी दे डाली कि शासन का काम उनके पास रहना चाहिए, जो शासन करने के लिए निर्वाचित किए गए हों। विधि मंत्री ने न्यायपालिका को विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत की याद दिलाते हुए आगे कहा कि शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत न्यायपालिका के लिए भी उतना ही बाध्यकारी है, जितना कार्यपालिका के लिए। इन सवालों का तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने। अपनी बारी पर तल्ख लहजे में उन्होंने कहा, एक-दूसरे के लिए सम्मान होना चाहिए और कोई भी शाखा सर्वोच्चता का दावा नहीं कर सकती है।

उच्चतम न्यायालय संवैधानिक संप्रभुता में विश्वास करता है और उसका पालन भी करता है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ संतुलन स्थापित करने के लिए संविधान के अंतिम संरक्षक की शक्ति दी गई है। ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि संबंधित सरकारें कानून के प्रावधान के अनुसार अपने दायरे के भीतर काम करें। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट तौर पर साथ ही यह भी कहा कि नागरिकों के मौलिक अधिकार के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। नागरिकों का अधिकार सर्वोच्च होना चाहिए। हमारी किसी भी तरह की नीति लाने में दिलचस्पी नहीं है, लेकिन जिस क्षण नीति बन गई, हमें इसकी व्याख्या करने और इसे लागू किया जाए यह देखने की अनुमति है। जाहिर है कि प्रधान न्यायाधीश ने जो कहा, उसमें कोई भी बात गलत नहीं है। उन्होंने वही कहा, जिसकी जिम्मेदारी न्यायपालिका को संविधान से मिली है। संविधान ने न्यायपालिका को जो अधिकार सौंपे हैं, वह उसी का पालन कर रही है।

यह पहली मर्तबा नहीं है जब मोदी सरकार, न्यायपालिका पर दबाव बनाने और उसे अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रही हो, बल्कि आये दिन ऐसे मौके आते रहते हैं जब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर न्यायपालिका को यह नसीहत दी जाती है कि वह अपनी हद में रहे और सरकार से नाहक ही टकराने की कोशिश न करे। इस कार्यक्रम से एक दिन पहले ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक दीगर कार्यक्रम में न्यायपालिका पर तंज कसते हुए कहा था कि 'अदालतें कार्यपालिका का काम नहीं कर सकती हैं और दोनों की स्वतंत्रता को सख्ती से कायम करना होगा।' यह बात सच है कि अदालतें, कार्यपालिका का काम नहीं कर सकतीं। दोनों के भिन्न कार्य हैं और उन्हें अपने-अपने काम अच्छी तरह से निभाना चाहिए।

न्यायपालिका तभी हस्तक्षेप करती है, जब कार्यपालिका अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने में नाकाम रहती है। सरकार को यह बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि संविधान के तहत न्यायपालिका की एक भूमिका है और वे कार्यपालिका से निश्चित तौर पर सवाल पूछ सकती है। कार्यपालिका को जवाब देने से बचना नहीं चाहिए। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जब न्यायपालिका ने कार्यपालिका को उसके संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाते हुए, उनका पालन करने की हिदायत दी। जाहिर है कि यही बात मोदी सरकार को बार-बार खटकती है। लिहाजा उसकी चाहत है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में उसका हस्तक्षेप बढ़़ जाए। उच्च अदालतों में यदि उसके मनपसंद न्यायाधीशों की नियुक्ति होगी, तो वह फैसले भी अपने पक्ष में करा सकेगी। वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका भी नहीं चाहती कि सरकार उसके कार्यक्षेत्र में कोई हस्तक्षेप करें।


न्यायाधीशों की नियुक्ति पहले की तरह उसी के हाथ में रहे। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने अपने एक असाधारण फैसले में, संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी को ही असंवैधानिक ठहरा दिया। इस फैसले के बाद उच्च अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली दोबारा बहाल हो गई है। जाहिर है कि यही फैसला सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की जड़ है। जब भी सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम, नये न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश सरकार से करता है, वह उसमें किसी न किसी बहाने से अड़ंगा लगा देती है। इस टकराव की वजह से उच्च अदालतों में जरूरत के मुताबिक न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। देश के अनेक हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के पद खाली पड़े हुए हैं। जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्हें अदालतों से इंसाफ देर से मिल रहा है।

कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सार्वजनिक बहस लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक है। बहस का स्तर यदि स्वस्थ एवं सकारात्मक हो, तो उससे लोकतंत्र फलता-फूलता और मजबूत होता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका के अपने-अपने अधिकार हैं। संविधान के तहत दोनों की सुपरिभाषित भूमिकाएं हंै और अदालतों की भूमिका अंतत: विधि का शासन सुनिश्चित कराने की है। न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों अपना-अपना काम करती हैं।

विधायिका कानून बनाती है और इसे लागू करना कार्यपालिका का और विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने की जांच करना न्यायपालिका का काम है। अलबत्ता संशोधन जैसा बेहद महत्वपूर्ण अधिकार विधायिका के पास ही है। टकराव के मूल में यही वह अधिकार है, जिसे विधायिका संसद की सर्वोच्चता का आधार मानने की गाहे-ब-गाहे भूल कर बैठती है। साल 1973 में चर्चित केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की संविधान पीठ अपने फैसले में यह स्पष्ट कर चुकी है कि भारत में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है।

अपने इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने टकराव की स्थिति को खत्म करने के लिए संविधान के मौलिक ढांचे का सिद्धांत भी पारित किया था। जिसके मुताबिक संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती है, जो संविधान के मौलिक ढांचे को प्रतिकूलत: प्रभावित करता हो। साथ ही न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार के तहत न्यायपालिका, संसद द्वारा किए गए संशोधन से संविधान का मूल ढांचा प्रभावित होने की जांच करने के लिए स्वतंत्र है। जाहिर है कि व्यवस्था के किसी भी अंग को निरंकुश होने से बचाने के लिए एक दूसरे पर प्रत्यक्ष या परोक्ष निगरानी रखने का अधिकार बेहद जरूरी भी है।

बावजूद इसके यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शक्ति पृथक्करण जैसा बुनियादी सिद्धांत विवाद का विषय बना हुआ है। जबकि इस गंभीर मुद्दे पर सार्वजनिक बहस से बचा जाना चाहिए। न तो न्यायपालिका को और न ही कार्यपालिका को एक-दूसरे के क्षेत्र में दखल देना चाहिए। सरकार को यदि न्यायपालिका से कोई शिकायत है, तो वह सार्वजनिक तौर पर छाती पीटने की बजाय अदालत के समक्ष उचित आवेदन दायर करने के तरीके का इस्तेमाल करे, जैसे कि हमारे संविधान में व्यवस्था है।

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