महिला की हकदारी के सार्थक प्रयास

भारत डोगरा प्राय: यह देखा गया है कि गांवों की समस्याओं को समझने में या गांववासियों की भलाई के बारे में सोच बनाने में केवल पुरुषों से ही राय ली जाती है। महिलाओं से इस बारे में पूछा ही नहीं जाता है या उ...

महिला की हकदारी के सार्थक प्रयास
भारत डोगरा

भारत डोगरा
प्राय: यह देखा गया है कि गांवों की समस्याओं को समझने में या गांववासियों की भलाई के बारे में सोच बनाने में केवल पुरुषों से ही राय ली जाती है। महिलाओं से इस बारे में पूछा ही नहीं जाता है या उनकी बात को महत्व नहीं दिया जाता है। किन्तु कुछ समय से यह स्थिति बदलने के प्रयास कुछ संगठन कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि महिलाओं से भी उनकी समस्याओं के बारे में पूछो ताकि दुख-दर्द के बहुत से कारण दबे छिपे न रहें। उनकी समस्याओं का पता चले तो इन्हें महत्व दो, इन्हें सुलझाने का प्रयास करो। ऐसी ही एक संस्था है दिशा जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में लगभग तीस वर्षों से काम कर रही है। अब इसका कार्य उत्तराखंड के अनेक गांवों में भी फैलने लगा है।
दिशा ने विशेषकर गरीब परिवारों की महिलाओं, दलित व मुस्लिम महिलाओं, मजदूर और दस्तकार महिलाओं में अधिक कार्य किया है। सब लोग जानते हैं कि गांवों में सबसे कमजोर आर्थिक स्थिति भूमिहीन खेत मजदूरों की है, किन्तु यह बात बहुत कम लोग जानने की कोशिश करते हैं कि खेत मजदूरों में महिला मजदूरों की स्थिति पुरुष मजदूरों से भी अधिक विकट है। देश के बहुत से क्षेत्रों में महिला मजदूरों को पुरुषों से कम मजदूरी दी जाती है। बहुत कम लोगों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। किन्तु दिशा एक ऐसा संगठन है जिसने अपने कार्य के आरंभ से ही महिला मजदूरों की समस्याओं पर विशेष ध्यान किया। उसने महिला मजदूरों को इस बारे में जागृत किया कि महिला मजदूरों को समान कार्य के बदले में समान आय प्राप्त करने का हक है, और उन्हें सरकारी कानूनों से तय वही न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करने का हक है जो हक पुरुष मजदूरों को है।
इस जानकारी ने महिला मजदूरों को समान आय के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी और जिस गांव में दिशा का मुख्य कार्यालय है, उसी सुल्तानपुर चिलकाना गांव में महिला मजदूरों ने समान मजदूरी के लिए हड़ताल कर दी। उन्होंने अन्य गांवों से आने वाली महिला मजदूरों को भी भेदभाव पर आधारित मजदूरी स्वीकार न करने का आग्रह किया और समस्त मजदूरों को संघर्ष से जुडऩे का निमंत्रण दिया। धीरे-धीरे महिला मजदूरों का यह आंदोलन आसपास के गांवों में भी फैलने लगा। इस आंदोलन को दिशा व दिशा के संस्थापक के.एन.तिवारी का भरपूर समर्थन मिला। बड़े भूस्वामियों के इशारे पर तिवारी जी पर तो हमला करने बहुत से लोग पंहुचे। इस हमले को शान्तिपूर्ण दृढ़ता से विफल करने में भी कुछ महिलाओं का बहुत योगदान रहा। तरह-तरह की धमकियों और तनावों से गुजरने के बाद अंत में हड़ताल सफल रही और महिलाओं की मजदूरी लगभग दो गुणा बढ़ाकर पुरुषों के बराबर कर दी गई। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी जिससे मजदूर परिवारों को बहुत लाभ मिला। किन्तु कुछ समय बाद जब पुरुषों की मजदूरी और बढ़ी तो महिलाओं की मजदूरी उस अनुपात में नहीं बढ़ी। आज की स्थिति देखें तो फिर पुरुषों की मजदूरी महिलाओं से अधिक है। इस अन्तर को दूर करने के लिए अभी आगे और प्रयास करना पड़ेगा। फिर भी जितनी सफलता महिला मजदूरों ने अपनी हड़ताल से प्राप्त की वह भी बहुत उल्लेखनीय है।
इसी शक्ति का परिचय कुछ समय बाद इन गांवों की महिलाओं ने एक बार फिर पठेड़ गांव में शराब के ठेके को हटाने के लिए किए गए संघर्ष में दिया। यह केवल एक गांव का संघर्ष नहीं था अपितु आसपास के अनेक गांवों में पठेड़ का आंदोलन शराब विरोधी संघर्ष का प्रतीक बन गया था। इस संघर्ष का असर दूर-दूर तक हुआ। इस संघर्ष के दौरान यह अच्छी तरह पता चल गया कि इन गांवों में महिलाओं की शराब विरोधी भावनाएं कितनी गहरी है। कई महीनों तक शराब के विरुद्ध चल रहे धरने-प्रदर्शन के कारण पहले से गरीब मजदूर महिलाओं के लिए आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ। पर उन्होंने आर्थिक तनाव, बदमाशों की धमकियों और पुलिस की लाठियों सभी को झेला और अंत में शराब के ठेके को हटाकर सफलता प्राप्त की। इसके कुछ समय बाद एक महिला निर्वाचित प्रतिनिधि से हुए बुरे व्यवहार के विरुद्ध संघर्ष में एक बार फिर दिशा की महिला कार्यकत्र्ताओं को पुलिस की लाठियों की मार सहनी पड़ी और कई दिन अस्पताल में रहना पड़ा। इन संघर्षों से यह सिद्ध हो गया कि दिशा की सामाजिक कार्यकत्र्ताओं में किसी सार्थक उद्देश्य की प्राप्त करने के लिए बहुत कष्ट सहने और विकट से विकट स्थिति का सामना करने की क्षमता है। दूसरी ओर दिशा की महिला सामाजिक कार्यकत्र्ताओं ने किसी ग्रामीण महिला पर अत्याचार और जोर-जुल्म का समाचार मिलने पर दूर-दूर के गांवों में जाकर उन्हें न्याय दिलवाने की भी भरपूर कोशिश की है। इस तरह कितनी ही महिलाओं को राहत मिली है, न्याय मिला है।
सहारनपुर जिले (उत्तर प्रदेश) के अनेक गांवों में, विशेषकर सरसावा व सधौली कदीम प्रखंडों में, जब भी कोई महिला अत्याचार या अन्याय का शिकार होती है, तो प्राय: सहायता व सहयोग के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में दिशा सामाजिक संस्था को याद किया जाता है। इस संस्था के कानूनी सहायता विभाग व महिला कक्ष ने अनेक महिलाओं को बहुत विकट स्थिति में सहायता पंहुचाकर ऐसी प्रतिष्ठा स्थापित की है कि अब अनेक महिलाओं के दर्द भरे पत्र उनके कार्यालय में दूर-दूर से पंहुचते रहते हैं। वैसे तो इस संस्था ने कितनी ही महिलाओं को सहायता पंहुचाई है, पर यहाँ कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि किस तरह के पेचीदे और कठिन मामले संस्था की कार्यकत्र्ताओं के पास आते हैं और अपने सीमित साधनों के बावजूद वे उन्हें प्राय: सुलझाने में सफ लता भी प्राप्त करती हैं। इन उदाहरणों में किसी भी अत्याचार या उत्पीडऩ का शिकार हुई महिला का पूरा नाम व गांव हम नहीं दे रहे हैं केवल अनुभव यहां बताए जा रहे रहे हैं।
1)    ‘त’ एक बदकिस्मत महिला थी जिसे अपनी बच्ची के साथ इधर-उधर कई जगह भटकना पड़ा। ‘र’ एक बदमाश किस्म का व्यक्ति था पर और कोई सहारा न देखकर ‘त’ ने उसी को पति के रूप में स्वीकार किया। बच्ची बड़ी होने लगी तो ‘र’ उसी को बुरी नजर से देखने लगा। किसी तरह दिशा की कार्यकत्र्ताओं को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अपने ही घर में संकट में पड़ी इस लडक़ी को शरण दी और उपयुक्त वर की तलाश कर उसका शीघ्र ही विवाह कर दिया।
2)    ‘फ’ दिशा की कार्यकत्र्ताओं की नजर में जब पहली बार आई तो वह जीने की सब उम्मीद छोड़ चुकी थी और आत्महत्या करने की मनोदशा में थी। दिशा की कार्यकत्र्ताओं ने उसे अपने पास रखकर कुछ सामान्य होने दिया और फि र धीरे-धीरे उसका पता और अन्य जानकारियां प्राप्त की। अन्त में दिशा की कार्यकर्ता पहले उसके मायके गई जहां ‘फ’ के परिवार के सदस्य बहुत व्याकुल होकर उसे ढूंढ़ रहे थे। ‘फ’ के ससुराल में समस्याएं तो थीं पर ऐसी नहीं जिन्हें सुलझाया न जा सके। दिशा की कार्यकत्र्ताओं की मदद से इन समस्याओं का हल खोजा गया।
3)    ‘ऊ’ एक दलित लडक़ी है जिसे विवाह से पहले लडक़े ने भली-भांति देखा था पर विवाह के बाद यह कह कर ठुकरा दिया कि लडक़ी तो काली है। दिशा की कार्यकत्र्ताओं की जांच से पता चला कि वास्तव में उसकी इच्छा और दहेज प्राप्त करने की है। इस स्थिति में लडक़ी को दहेज के 62000 रुपए वापिस दिलवाए गए, और नई जगह उपयुक्त वर खोजकर ‘ऊ’ का विवाह कर दिया गया।
4)    ‘श’ नामक युवती के बलात्कार का प्रयास गांव के एक बड़े भूस्वामी के बेटे ने किया। ‘श’ ने किसी तरह चिल्लाकर अपने को बचाया। आरंभ में तो अपराधी धमकियां देता रहा पर दिशा द्वारा कार्यवाही के बाद उसने खुली पंचायत में माफी मांगी और आगे से कभी ऐसी गलती न दोहराने का वायदा किया।
5)    15 वर्षीय ‘सा’ का 20 वर्षीय युवक से प्रेम हो गया और दोनों ने भागने की योजना बनाई। ‘सा’ के परिवार को इसका पता चल गया। उन्होंने ‘सा’ को बहुत मारा-पीटा, उसके बाल काट डाले, उसे जंजीर से बांध कर कमरे में कैद कर दिया। दिशा ने उसे आजाद करवाया और फिर यह विवाद हल करने का समझौता करवाया।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि दिशा की महिला कार्यकत्र्ताओं को प्राय: बहुत पेचीदा और कठिन मामले सुलझाने पड़ते हैं। जब वे दूर-दूर के गांवों में जांच के लिए जाती हैं या कोर्ट-कचहरी में जाती हैं तो कई बार इन्हें अपराधियों की धमकियां मिलती रहती हैं या अन्य लोग अपमानित करते हैं। हमारे समाज में चली आ रही रूढिय़ों के कारण कई बार बलात्कार का शिकार हुई महिला को उसके आसपास के लोग या कभी-कभी तो अपने परिवार के सदस्य तक ताने देते हैं या अपनाने से इंकार तक कर देते हैं। इन परिस्थितियों में इन सामाजिक कार्यकत्र्ताओं की स्थिति भी विकट हो जाती है। अत: सेवाभाव से कार्य करने वाले वरिष्ठ नागरिकों विशेषकर वकीलों, डाक्टरों आदि को ऐसे सामाजिक कार्यकत्र्ताओं व संगठनों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए। दिशा की एक अन्य आवश्यकता यह है कि उसे सरकार से ऐसा संस्थान चलाने की सहायता मिले जहां सताई गई, अत्याचार की शिकार महिलाएं कुछ समय रह सकें व कोई टे्रनिंग, प्रशिक्षण आदि प्राप्त कर आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बन सकें।


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