ग्लोबल वार्मिंगकब तक बचा पायेंगे खुद को

पर्यावरण के असंतुलित एवं प्रदूषित होने की स्थितियां इतनी भयावह एवं डरावनी है कि कोई भी कांप उठे। प्रतिवर्ष 1500 करोड़ पेड़ धरती से काट दिए जाते हैं, मनुष्य जाति की शुरुआत से आज तक 46 प्रतिशत ...

ग्लोबल वार्मिंगकब तक बचा पायेंगे खुद को
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 ललित गर्ग
पर्यावरण के असंतुलित एवं प्रदूषित होने की स्थितियां इतनी भयावह एवं डरावनी है कि कोई भी कांप उठे। प्रतिवर्ष 1500 करोड़ पेड़ धरती से काट दिए जाते हैं, मनुष्य जाति की शुरुआत से आज तक 46 प्रतिशत जंगल व पेड़ खत्म कर दिए गए हैं। जबकि धरती पर कुल पेड़ 30 लाख करोड़ हैं। धरती से 15500 विभिन्न जीव-जंतुओं की प्रजातियां सदा के लिए खत्म हो चुकी हैं। बढ़ते तापमान के कारण 66 प्रतिशत ध्रुवीय भालू 2050 तक खत्म हो जायेंगे। घटते जंगल ने इंसान के सबसे नजदीकी जानवर चिंपाजी 80 प्रतिशत तक खत्म हो चुके हैं। जिस तरह ग्रीन हाउस गैसेस का उत्सर्जन जारी रहा तो इस सदी के अंत तक न्यूनतम तापमान में 4 डिग्री की बढ़ोतरी हो जाएगी। श्वास और त्वचा से जुड़ी बीमारियों में पिछले 30 सालों में 3 गुना वृद्धि हुई है। 2015 तक भारत में हार्ट अटैक की न्यूनतम आयु 16 वर्ष हो चुकी है। भारतीय पुरुषों की प्रजनन क्षमता में पिछले 25 वर्षों में 31 प्रतिशत तक की कमी आई है। अंडमानी, राबरी जैसी आदिवासी जनजातियां आज विलुप्त होने के कगार पर हैं।  लगातार कम होते जंगलों के कारण आज तक तकरीबन 20 लाख लोग बेरोजगार और बेघर हो चुके हैं। धरती पर हर 8वीं मौत दूषित हवा से होती है। 21वंी सदी अभी तक की सबसे गर्म सदी रही है। नासा के अनुसार इस सदी में वैश्विक रूप से समुद्र का जलस्तर आधा फीट बढ़ गया है एवं पिछली शताब्दी के बराबर का स्तर मात्र गुजरे एक दशक में बढ़ा है। पृथ्वी के फेफड़े कहलाने वाले अमेजन के जंगल 28.5 प्रतिशत तक इंसानों द्वारा काट दिए गए हैं।
यह सब तो बस कुछ आंकड़े हैं हमारे आस-पास के सच्चाई तो और भी गंभीर है, दरअसल पिछले 30-40 सालों में भारत ने बहुत कुछ नया पाया है तो बहुत कुछ पुराना खोया भी और इन सबकी गंभीरता में एक कारण सामान रूप से सामने आता है और वह है ग्लोबल वार्मिंग। यही कारण है कि जिससे हमें प्रकृति के साथ-साथ मानव जाति को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यज्ञ का हमारे यहां प्राचीन काल से ही विशिष्ट महत्व रहा है, यज्ञ का न केवल आध्यात्मिक महत्व है बल्कि यज्ञ पर्यावरण के लिए भी विशेष रूप से महत्व रखता है। यज्ञ के सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक पहलू भी हैं। हवन करने से पर्यावरण में उपस्थित अनेक तरह के घातक बैक्टीरिया खत्म होते हैं। हवन वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है।
वृक्ष इस सजीव जगत के जीवन में रीढ़ की तरह है, पेड़ स्वयं कार्बन डाई ऑक्साइड का प्रयोग करते हैं और बदले में हमें फल, फूल और ऑक्सीजन देते हैं। पेड़ों की महत्ता का वर्णन आदिकालिक वेदों में तो है ही साथ ही वैज्ञानिक भी इनके महत्व को सत्यापित करते हैं। एक विकसित वृक्ष साल भर में लगभग 25 किलो कार्बन ग्रहण कर लेता है जो कि एक कार 45000 किलोमीटर चलने पर पैदा करती है। एक संपूर्ण विकसित वृक्ष 6 ऐसी-वातानुकूलित के बराबर ठंडक देता है। वृक्षों के कारण तेज बारिश या अकस्मात बारिश का पानी बह नहीं पाता, भयानक बाढ़ भी नहीं आती और पानी जमीन में ही सोख लिया जाता है जिससे न केवल मिट्टी का कटाव रूकता है बल्कि पानी की शुद्धता भी बढ़ जाती है। वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार का बहुत बड़ा साधन है जो कि हमारे देश में 35 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करती है। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार एक पेड़ 3000 प्रकार की जातियों के जीव-जंतुओं का घर होता है। एक व्यक्ति अगर जीवन में 4 पेड़ लगा पाता है तो वह अपने जीवन की लगभग सभी जरूरतें को पूरा करने के लिए साधन जुटा पाता है। ग्लोबल वार्मिंग से लडऩे का सबसे वैज्ञानिक और त्वरित समाधान अधिक से अधिक वृक्षारोपण ही है।
आज के समय में हमारे सामने दो कड़वे सच मुंह बाये खड़े है एक तो यह कि ग्लोबल वार्मिंग दिन-ब-दिन हमारी समस्याएं बढ़ाती ही जा रही हैं, समय रहते आज से ही इसका हल निकालना शुरू नहीं किया तो हमारे अस्तित्व पर सवाल खड़े होने में भी समय नहीं लगेगा। आखिर कितनी सुनामियों से, कितने प्राकृतिक तूफानों से, कितने अकालों से और कितने जलवायु बदलावों से हम कब तक खुद को बचा पायेंगे। हमारे देश में लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में कोई न कोई प्राकृतिक आपदा खड़ी ही रहती है, अब यह देखने और विचार करने की बात होगी कि हम कब तक इसे केवल सरकार के भरोसे छोड़ पायेंगे। जॉन लुबॉक का मार्मिक कथन है कि- ‘ जमीन-आसमान, जंगल-मैदान, नदियां और झीलें, पहाड़ और सागर दुनिया के बेहतरीन अध्यापक हैं। ये हमें वो सिखाते हैं, जो कभी किताबों में नहीं लिखा जा सकता।’

 


 

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