दिल्ली की बस्तियों में भूख और अभाव से संघर्ष

शाहबाद डेयरी ‘ए’ ब्लाक झुग्गी की बस्ती बाहरी दिल्ली में स्थित है। यहां अधिकतर मजदूर रहते हैं। इनमें से अधिकतर निर्माण मजदूर हैं। इनमें से अधिकतर मजदूर बुंदेलखंड के महोबा क्षेत्र से हैं।...

दिल्ली की बस्तियों में भूख और अभाव से संघर्ष
भारत डोगरा

भारत डोगरा
शौचालय न होने के कारण खुले में जाना पड़ता है

शाहबाद डेयरी ‘ए’ ब्लाक झुग्गी की बस्ती बाहरी दिल्ली में स्थित है। यहां अधिकतर  मजदूर रहते हैं। इनमें से अधिकतर निर्माण मजदूर हैं। इनमें से अधिकतर मजदूर बुंदेलखंड के महोबा क्षेत्र से हैं। वे पहले शालीमार बाग के पास रहते थे पर वह स्लम हटने के बाद यहां आकर बस गए।  वैसे तो इन मजदूरों की आय पहले भी कम थी पर नोटबंदी के बाद उनका रोजगार व आय पहले की अपेक्षा 50 प्रतिशत ही रह गये हैं। इस कारण अब अनेक परिवारों में भूख व कुपोषण की समस्या भी गंभीर रूप में उपस्थित हो गई है।     इतना ही नहीं, नोटबंदी के बाद कैश की कमी की स्थिति में यहां बीमार पड़े कई लोगों का इलाज नहीं हो सका है। इस कारण यहां दो किशोरों (महेश व सोनू) तथा दो व्यस्क व्यक्तियों (दयाराम व भगवानदास) की मृत्यु हो गई। इसके अतिरिक्त हाल ही में गरीबी व अभाव से परेशान एक महिला अन्नू ने आत्म-हत्या कर ली। शौचालय न होने के कारण महिलाओं को खुले में जाना पड़ता है व असामाजिक तत्व उन्हें बहुत परेशान करते हैं। पेयजल सप्लाई टैंकर से है जो कम व अनिश्चित है। यहां पास के स्कूल की मरम्मत हो रही है तो बच्चे दूसरे स्कूल में जाने को मजबूर हैं। वहां से उन्हें कहा जाता है कि यहां पढऩे मत आओ। यहां के छात्रों को वहां मारा-पीटा भी गया व कई छात्रों को चोट आई।
पश्चिम विहार से हटाए गए लोग बवाना जे. जे. कालोनी के ‘के’ और ‘एल’ ब्लाक के सामने बसे हैं। उन्हें सरकार ने अभी तक पुनर्वास के कागज नहीं दिए। उन्हें अब तक राशन कार्ड भी नहीं मिले हैं। बहुत गरीबी झेल रहे इन लोगों को राशन कार्ड की बहुत जरूरत है पर उन्हें सस्ता अनाज नहीं मिल रहा है। यहां अनेक वृद्ध लाचार व्यक्तियों, विकलांग व्यक्तियों व विधवा महिलाओं को पेंशन की बहुत जरूरत है पर उन्हें पेंशन नहीं मिल रही है। यहाँ अनेक विकलांग बच्चों को भी सहायता की बहुत जरूरत है पर उन तक कोई पंहुचता ही नहीं है।
यहां के अधिकांश निवासी भी मुख्य रूप से निर्माण मजदूर है व उनके रोजगार में नोटबंदी के बाद तेजी से कमी आई है। अत: यहां भी भूख और कुपोषण की समस्या विकट है। अस्पताल व स्कूल दूर है। तिसपर छेड़छाड़ के कारण लड़कियों के लिए स्कूल जाना और कठिन है।     बवाना जे. जे. बस्ती ‘जी’ और ‘एच’ ब्लाक में बनूवाल नगर के स्लम से हटाए गए लोग बसाए गए हैं। यहां की घरेलूकर्मी महिलाओं ने बताया कि आज तक वे पहले वाले स्थान पर 24 किमी. की दूरी तय कर रोजगार के लिए जाती हैं। अब उन्हें आराम तो बिलकुल नहीं मिलता है। पास में उद्योग तो बहुत हैं पर वे महीने में मात्र 4500 से 5000 रुपए की मजदूरी देते हैं। जबकि प्रतिदिन 8 घंटे से भी ज्यादा काम करवाते हैं। यह कानूनी तौर पर मान्य पुनर्वास कालोनी है तो भी यहां के अधिकांश लोगों को अभी तक शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है। पेयजल की खर्चीली व्यवस्था भी अपने स्तर पर करनी पड़ती है। सफ ाई की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। ऐसी बस्तियों की बढ़ती कठिनाईयों को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह यहां बुनियादी सुविधाओं को ठीक से उपलब्ध करने के लिए शीघ्र समुचित कार्यवाही करे।


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