डिलीट करो व्हाट्सएप, दफा हो जाओ फेसबुक और ट्विटर की दुनिया से!

'हफिंगटन पोस्ट' की सीईओ एरियाना हफिंगटन ने इस साल के शुरू में अपनी भारत यात्रा से पहले एक खुला खत लिखा...

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डिलीट करो व्हाट्सएप, दफा हो जाओ फेसबुक और ट्विटर की दुनिया से!
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- प्रतिभा कटियार

'हफिंगटन पोस्ट' की सीईओ एरियाना हफिंगटन ने इस साल के शुरू में अपनी भारत यात्रा से पहले एक खुला खत लिखा। इसमें उन्होंने प्रौद्योगिकी विशेषकर स्मार्टफोन जैसे उपकरणों के पीछे भारतीयों के पागलपन को रेखांकित करते हुए इससे जुड़े खतरों के प्रति आगाह किया है। एरियाना का यह खत जिस दिन छपा उसी दिन एक और खबर यह थी कि 31 दिसंबर की रात 12 बजे के आसपास भारतीयों ने व्हाट्सएप पर इतने संदेश भेजे कि यह एप ही आधे घंटे तक ठप रहा। समझ नहीं आया कि ऐसी कौनसी आग लगी थी कि लोगों ने उन विशेष (अगर वे थे) क्षणों का आनंद उठाने के बजाय उन्हें चमकती मोबाइल स्क्रीनों के अंधेरे में  जाया किया।

यह हाल तो तब है जबकि सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत में अधिकतर लोगों की स्मार्टफोन, इंटरनेट व सोशल मीडिया तक पहुंच ही नहीं है। अगर समूची जनता के पास यह सुविधा हो तो? इस तो का जवाब शायद हमारी कल्पनाओं के घोड़े जहां थककर थम जाएंगे वहां से शुरू होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्हाट्सएप हो, फेसबुक, टिवटर या हाइक या कोई और मंच, निसंदेह संपर्क संवाद यानी कनेक्टिविटी का इससे सस्ता व तेज साधन अब तक विकसित नहीं हुआ।

सूचनाओं का इससे बड़ा तथा लोकतांत्रिक मंच आज तक हमें नहीं मिला। लेकिन जैसे हर क्रांति का दूसरा पहलू होता है वैसे ही इस सोशल मीडिया इस क्रांति का एक खतरनाक दूसरा पहलू है जिसकी अनदेखी करने का जोखिम भारत जैसा उदीयमान देश और प्रगतिशील समाज नहीं उठा सकता। लगभग मुफ्त का इंटरनेट और किस्तों में मिल रहे स्मार्टफोन एक समूची पीढ़ी की कल्पनाओं को बांधने व बींधने का काम तो नहीं कर रहे हैं यह सवाल बड़ा हो गया है। कहीं यह हमारी रचनाधर्मिता और समाज की उत्सवधर्मिता, खबरों की विश्वसनीयता के लिए संकट तो नहीं बन रहा? भारत- एक बाजार जिसमें हर महीने तीन करोड़ स्मार्टफोन बिक रहे हैं और जो हर महीने 150 करोड़ जीबी मोबाइल डेटा पीकर दुनिया में पहले नंबर पर है, उसके लिए इस संकट पर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है।

दरअसल खाते पीते, चलते फिरते, सोते जागते चार-छह ईंच की चमकती स्क्रीन को लेकर हमारे युवाओं का 'पागलपन' निराश करने वाला है। गौर करिए कि मोबाइल फोन को लेकर 'पागलपनÓ या एडिक्शन जैसी नयी बीमारी से पीडित भारतीय युवाओं की संख्या साल भर में 100 फीसद तक बढ़ी है। तनाव, कुंठा और निराशा, अध्ययन बताते हैं कि मोबाइल फोन से चिपके रहने वाले युवाओं में 65 प्रतिशत युवाओं में हताशा है। कोई हैरानी नहीं है कि देश के राष्ट्रपति मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को महामारी करार दे चुके हैं। प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो कार्यक्रम में इस संकट का जिक्र किया। एरियाना का कहना है कि युवाओं में तनाव व मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी इन सारी दिक्कतों के केंद्र में है प्रौद्योगिकी के साथ हमारा रिश्ता। इस रिश्ते में गड़बड़ता संतुलन खतरनाक होता जा रहा है।

इन हालात में यह बहुत जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया, इसके विभिन्न पहलुओं, उपयोगिता व खतरों के बारे में विस्तार से बात की जाए। चर्चा हो। खाते पीते सोते जागते आनलाइन व लाइव रहने वाले दीवानों के लिए यही सलाह है कि वह जितनी जल्दी हो सके इस भ्रम से निकल जाएं। यह आभासी दुनिया उनके काम की नहीं है। गुड मार्निंग-गुड इवनिंग के संदेश, दूसरों के कथनों व मुहावरों पर गढें गए वाक्य या उट पटांग से वीडियो फारवर्ड कर वे किसी क्राति में भागीदारी नहीं कर रहे। बल्कि यह आंकड़ों की बाजीगरी पर बाजार का रचा ऐसा जलसाघर है जो उनकी रचनात्मकता व उर्जा पर कुंडली मारकर बैठ गया है। इस सारे जलसाघर को समझने के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं पर बात की जा सकती है।

फेसबुक हो या टिवटर, हर प्रमुख सोशल मीडिया कंपनी अपने ऐसे 'लाईटÓ संस्करण ला रही है जो कि भारत में कम इंटरनेट स्पीड में भी बेहतर काम करें। क्यों भई? दरअसल हमारे यहां सोशल मीडिया में जो तीन प्रमुख एप लोकप्रिय हैं वे हैं फेसबुक, व्हाट्सएप व टिवटर। भारत में करीब 24 करोड़ फेसबुकिया हैं जो उसका नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं। इस संख्या के हिसाब से अमेरिका के बाद भारत उसका दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। व्हाट्सएप की बात करें तो दुनिया भर में उसके 120 करोड़ सक्रिय उपयोक्ताओं में से 20 करोड़ से अधिक भारत में हैं। भारत उसका भी सबसे प्रमुख बाजार है। भारत में लगभग सवा दो करोड़ लोग ट्विटर पर हैं। यह तो शुरुआत भर है। सवा अरब वाले इस देश में जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा है, खुद को व्यक्त करने के लिए मरा जा रहा है, जहां स्मार्टफोन लगातार सस्ते हो रहे हैंज् भारत कितना बड़ा बाजार है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि हर बड़ी कंपनी यहां बाजी लगाने को तैयार है।

टिवटर पर किसी हस्ती को फालो करने का मतलब है कि हम उसके अनुयायी हो रहे हैं। वह हस्ती अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर जो कुछ भी लिखेगी लिखेगा तो उसकी सूचना हम तक मिलेगी। बात इतनी सी भी है और नहीं भी। इतनी सी इसलिए क्योंकि हम अमुक हस्ती के फालोअर बन गए उनसे हमारी रिश्तेदारी नहीं हो गई। उदाहरण के लिए विराट कोहली के टिवटर एकाउंट को लगभग सवा दो करोड़ लोग फॉलो करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कोहली उन सभी सवा दो करोड़ लोगों को जानते, पहचानते हैं या उनके लिखे मैसेज का जवाब देते हैं। ऐसा नहीं है कि हम कोहली को टैग करते हुए उन्हें बधाई दें और उनका जवाब आए – हां भाई थैंक्यू, अगली बार भोपाल आया तो मिलूंगा। ऐसा कुछ नहीं होता न ही होने जा रहा है। विराट कोहली टिवटर पर केवल 51 लोगों को फालो करते हैं यानी इनकी गतिविधियों पर निगाह रखते हैं। इसलिए अगर हम विराट कोहली, अनुष्का शर्मा , फलांना धिंकाना को फॉलो कर रहे हैं तो कोई तीर नहीं मार रहे बस उनके द्वारा परोसी गई सूचनाओं के लक्षित 'आडियंस' भर बन रहे हैं।


दूसरा पहलू बाजार का है। विराट कोहली का ही उदाहरण लें। विराट के इंस्टाग्राम पर करीब 1.5 करोड़, ट्विटर पर सवा दो करोड़ और फेसबुक पर 3.6 करोड़ फॉलोवर हैं। यह उनकी ब्रांड वैल्यू बढाने वाला है। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार विराट कोहली सबसे महंगे एथलीट हैं जिनके एक इंस्टाग्राम पोस्ट की कीमत करीब 3.2 करोड़ रुपये है। ऐसा लगभग हर चर्चित हस्ती के साथ है। जितने ज्यादा फालोअर उतनी अधिक ब्रांड वैल्यू और वैसे ही कमाई। तो भाई लोगों हम, एक तरह से बाजार में कमाई का जरिया बन गए हैं। लोग हमारे जरिए कमाई कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर 'ब्रेकिंग ..ब्रेकिंग' कर उल्टे सीधे समाचार डालने वालों को भी इसे समझना चाहिए। शाहरुख खान ने अपनी नयी फिल्म का पोस्टर जारी किया। यह खबर सुबह से लेकर शाम तक अलग अलग मीडिया माध्यमों में ब्रेकिंग के रूप में आती रहती है। वास्तव में क्या होता है। उदाहरण के लिए शाहरुख अपनी फिल्म का पोस्टर टिवटर पर डालते हैं। सबसे पहले यह सोशल मीडिया पर उनके फालोवरों तक पहुंचती है। यहीं से कोई मीडिया हाउस उसे उठाकर खबर बनाता है। यह खबर मीडिया से अन्य मीडिया घरानों या कंपनियों के मंच पर आती है और वहां ब्रेकिंग बनकर चलती है। इसके बाद यह कहीं व्हाट्सएप जैसे माध्यमों में ब्रेकिंग बनकर आती है। यानी इस दौरान खबर खुद कई बार टूट बन चुकी होती है। उसके लेकर हम जैसे आम लोगों का पागल हो जाना किसी काम का नहीं। पहली बात तो यह कि जिन लोगों की शाहरुख और उनकी फिल्मों में रुचि है उन तक वह पहले ही पहुंच चुकी होगी। जिन लोगों तक नहीं पहुंची उनके लिए शायद इससे जरूरी और काम होंगे और उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शाहरुख की नयी फिल्म आई या नहीं। हमें यह समझना होगा जिस ब्रेकिंग न्यूज को लेकर हम सोशल मीडिया मंचों पर बावले हो जाते हैं वह एक बहुत बड़े धोखे और भ्रम से अधिक कुछ नहीं।

हमें इस सचाई को बिना हिचक स्वीकार कर लेना चाहिए कि सोशल मीडिया झूठ और आधे सच पर आधारित सूचनाएं फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम बन गए हैं। खुद फेसबुक से लेकर गूगल तक इससे परेशान हैं। 'फेक न्यूज' पिछले साल इस तरह की कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक रही । कंपनियों ने अपने मंचों के जरिए फैलाए जा रहे झूठ पर चिंता जताई है। सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे इस झूठ में भी उपयोक्ता के रूप में कहीं न कहीं भागीदारी करते हैं। बिना तथ्यों के सत्यापन के ही उल जुलूल संदेशों को फारवर्ड व शेयर करना इसकी सबसे बड़ी वजह है। ऐसा कर हम भी कहीं न कहीं झूठ फैलाने के 'पाप' के भागीदार बनते हैं।

मजे की बात है कि जो प्रौद्योगिकी व्यक्तिगत व सामाजिक उन्नति में मददगार होनी थी उसका उपयोग भाई लोग ब्राह्मण महासभा और जाट जिंदाबाद जैसे ग्रुप बनाकर कर रहे हैं। एक साथ काम कर रहे दो लोग सोशल मीडिया पर किसी अलग जाति, धर्म, वर्ग समूह के ग्रुप में जुबानी जंग लड़ रहे होते हैं। वह भी बिना बात की। हाल ही में अनेक घटनाओं में सोशल मीडिया की भूमिका पर बड़ा सवाल उठा है। बीते कुछ साल में दूरदराज के गांव में रहने वाले मेरे कई दोस्त व्हाट्सएप, फेसबुक व टिवटर जैसे सोशल मीडिया पर नमूदार हुए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ी है।

यह अच्छा संकेत है और खुशी की बात भी कि त्वरित संवाद का नया माध्यम आया है। लेकिन इस संवाद की सार्थकता की बात की जाए तो निराशा ही होगी। व्हाट्सएप पर फारवर्ड किए गलत सलत संदेशों, वीडियो, फोटो की भरमार रहती है। फेसबुक पर आपका चेहरा किस हीरो हीरोइन से मिलता है जैसे फर्जी एप से निकले फोटो भरी रहती हैं। टिवटर तो लोगों ने साल भर में खोलकर भी शायद देखा हो। फिर भी देखा भाई लोग लगे रहते हैं। अब समझ में नहीं आता कि मलकीसर के पास किसी ढाणी में रहने वाले किसान दोस्त के लिए यह इस तरह का सोशल मीडिया किस काम का है। यह कड़वा सच है कि हमारे यहां सोशल मीडिया पर दो ही तरह के लोग अति सक्रिय हैं- जिनका धंधा है, या जिनका एजेंडा है।

सीधी सी बात है कि कोई भी प्रौद्योगिकी हमारे लिए तभी काम की है जबकि या तो वह हमारे व्यक्तिगत उन्नयन के काम आए यानी वह हमारी सोच, समझ का दायरा विस्तृत करे। हम उससे कुछ न कुछ सीखें। दूसरा वह हमारे कामधंधे के विस्तार में काम आए। हमारी आय/कारोबार बढ़ाने वाली हो। या तीसरा वह किसी न किसी रूप में हमारे जीवन को और सुगम बनाए। अगर कोई प्रौद्योगिकी इन तीनों मानकों पर खरी नहीं उतरती तो हमें उसे बिना हिचक छोड़ देना चाहिए। वह हमारे किसी काम की नहीं। बात यही है कि जैसे हर पेशे का एक सलीका होता है, हर प्रौद्योगिकी का एक लिहाज व संस्कार होता है जिसके अनुसार ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। चीन में कहा जाता है कि पुल अपने आप में बहुत अच्छी चीज है। हम बड़ी से बड़ी और गहरी से गहरी नदियों को पुलों के जरिए पार कर सकते हैं। लेकिन पुल पर घर नहीं बनाया जा सकता। यही बात सोशल मीडिया मंचों पर लागू होती है। यह बहुत अच्छा माध्यम, बहुत क्रांतिकारी खोज है लेकिन हम सबकुछ भूलकर यहां ल_ गाड़कर नहीं बैठ सकते । इसके इस्तेमाल का संयम और सलीका अगर हममें नहीं है तो बेहतर यही है कि हम इस आभासी दुनिया से विदा ले लें। कल नहीं यह काम आज ही कर लें।

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