नर्मदा पुनर्वास में भ्रष्टाचार

जिन लोगों का पुनर्वास होना था और उन्हें जो क्षतिपूर्ति की रकम दी गई थी उससे उन्हें अन्य स्थानों पर जमीन खरीदना थी। इसी खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ...

नर्मदा पुनर्वास में भ्रष्टाचार
Narmada
हाइलाइट्स
  • सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन नहीं

जिन लोगों का पुनर्वास होना था और उन्हें जो क्षतिपूर्ति की रकम दी गई थी उससे उन्हें अन्य स्थानों पर जमीन खरीदना थी। इसी खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। यह भ्रष्टाचार मिडिलमैन के द्वारा किया गया। यह भी पाया गया कि प्रोजेक्ट प्रभावित परिवारों द्वारा खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री से एक से अधिक बार क्षतिपूर्ति का पैसा लिया गया है। यह भी देखने में आया कि फर्जी सेलडीड के आधार पर जब दूसरी किश्त मांगी गई तो उसका भुगतान अत्यधिक द्रुत गति से हो गया। परंतु जो असली सेलडीड थी, उन पर भुगतान लंबे समय तक उलझा कर रखा गया। इन सब कामों में बीच के दलालों की महत्वपूर्ण भूमिका रही और दलालों की भूमिका के बारे में अधिकारियों को पता रहता था।

दिनांक 3, 4, 5 और 6 अगस्त को नर्मदा के डूब क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान हमें यहां अनेक प्रकार की कठिनाईयां और शिकायतें सुनने को मिलीं। शिकायतों में भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें प्रमुख थीं। नर्मदा बचाव आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा भेजी गई अधिकारियों की टीम के बीच हुई बातचीत में भी बार-बार भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया था।

लोगों द्वारा की जाने वाली शिकायतों की जांच करने के लिए हाईकोर्ट के आदेश पर एक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश एस.एस. झा थे। उन्होंने अपनी जांच के दौरान अनेक अनियमितताएं पाईं। हाईकोर्ट को भी यह शिकायत मिली थी कि संबंधित लोगों को क्षतिपूर्ति और जमीन के एवज में जमीन देने के मामलों में बहुत धांधली हुई है। झा आयोग ने अपनी जांच के दौरान इस तरह की अनेक अनियमितताएं पाईं।

आयोग ने पाया कि बड़े पैमाने पर फर्जी लोगों के नाम पर ज़मीन की रजिस्ट्री कर दी गई है। इस तरह की जालसाजी से संबंधित ढेर सारे दस्तावेज झा आयोग ने पाए। कई मामलों में असली जमीन मालिकों के नाम पर रजिस्ट्री तो की गई परंतु बिना उनकी मर्जी के उनकी जमीन अन्य लोगों को बेच दी गई और जालसाजी से हस्ताक्षर करवा कर अन्य लोगों के नाम पर रजिस्ट्री करवा दी गई। झा आयोग ने यह भी पाया कि असली हकदार को जमीन बेची गई परंतु वही जमीन अन्य व्यक्ति को भी बेच दी गई। यह प्रक्रिया इस तरह की गई कि जो जमीन का मूल मालिक था जमीन उसी के पास घूमकर वापस आ गई। इस तरह के अनेक फर्जी दस्तावेज जांच के दौरान पाए गए।

जिन लोगों का पुनर्वास होना था और उन्हें जो क्षतिपूर्ति की रकम दी गई थी उससे उन्हें अन्य स्थानों पर जमीन खरीदना थी। इसी खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। यह भ्रष्टाचार मिडिलमैन के द्वारा किया गया। यह भी पाया गया कि प्रोजेक्ट प्रभावित परिवारों द्वारा खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री से एक से अधिक बार क्षतिपूर्ति का पैसा लिया गया है। यह भी देखने में आया कि फर्जी सेलडीड के आधार पर जब दूसरी किश्त मांगी गई तो उसका भुगतान अत्यधिक द्रुत गति से हो गया। परंतु जो असली सेलडीड थी, उन पर भुगतान लंबे समय तक उलझा कर रखा गया। इन सब कामों में बीच के दलालों की महत्वपूर्ण भूमिका रही और दलालों की भूमिका के बारे में अधिकारियों को पता रहता था। यह बात सभी को पता थी परंतु इस संबंध में कोई निर्णायात्मक सबूत नहीं मिले इसलिए नर्मदा वैली डव्लपमेंट अॅथोरिटी के अधिकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध नहीं किया जा सका।

जमीन की खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी होने का मुख्य कारण सरकार की गलत नीति थी। जो नीति बनाई गई वह नर्मदा अवार्ड के प्रावधानों के विपरीत थी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि परियोजना प्रभावित परिवारों को बेहतर जीवनयापन करने की सुविधाएं दी जानी चाहिए। यह दु:ख की बात है कि पुनर्वास अधिकारियों और जमीन अर्जित करने वाले अधिकारियों को क्षतिपूर्ति देने के संबंध में खुली छूट दी गई थी फिर भी उनके द्वारा झूठे विक्रयपत्र बनाए गए।


दलालों को नर्मदा वैली डव्लपमेंट अथॉरिटी के दफ्तर में प्रवेश की खुली छूट थी। वे मनमाने ढंग से क्षतिपूर्ति का पैसा प्राप्त कर लेते थे और उसे निर्वासित होने वाले लोगों तक नहीं पहुंचाते थे। इससे साफ जाहिर होता है कि एनवीडीए के अधिकारियों और दलालों के बीच जबरदस्त मिलीभगत थी। जिन्हें क्षतिपूर्ति मिलना थी उन्होंने आयोग को बताया कि उन्हें एनवीडीए के कार्यालय में प्रवेश नहीं दिया जाता था और वे कार्यालय के बाहर ही बैठे रहते थे और उनकी तरफ से सारा कार्य दलाल करते थे और ये दलाल उनसे संबंधित दस्तावेजों में दस्तखत करवा लेते थे।

इस बीच एनवीडीए के अधिकारी पुनर्वासित होने वाले लोगों को आवश्यक जानकारी नहीं देते थे और इसलिए ही बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने और बेचने के मामले में धांधली हुई। पुनर्वासित लोगों के लिए जो निर्माण किया गया वह भी घटिया दर्जे का था। अनेक स्थानों पर यह पाया गया कि उपजाऊ काली मिट्टी पर प्लाट काट दिए गए और उन्हीं में रहने के लिए घरों का निर्माण किया गया। यह सभी को ज्ञात है कि काली मिट्टी पर मकान बनाना बहुत ही खर्चीला होता है क्योंकि उसकी नींव बनाने में ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है। वहां की जमीन का न तो किसी प्रयोगशाला में परीक्षण करवाया गया और ना ही यह देखने का प्रयास किया गया कि ऐसी जमीन पर निर्माण करना उचित है कि नहीं। यह भी देखने में आया कि जो वरिष्ठ अधिकारी हैं उन्होंने उन स्थानों पर पहुंचकर चलते हुए निर्माण का निरीक्षण तक नहीं किया। बाद में यह पता लगा कि घटिया दर्जे के निर्माण के लिए 40 से ज्यादा इंजीनियर दोषी पाए गए। घटिया दर्जे की निर्माण की बात पता लगने के बाद भी जो कमियां थी वह पूरी नहीं की गई। इस तरह यह कहा जा सकता है कि निर्माण में जो भी खर्च हुआ वह पूरी तरह से अनुपयोगी सिद्ध हुआ। क्योंकि इस तरह के अनेक निर्माणों में, जो प्रभावित लोग थे, रहने से इंकार कर दिया।

एनवीडीए ने पुनर्वासित होने वाले लोगों की रोज़ी-रोटी के लिए भी उचित प्रबंध नहीं किया और जो कुछ भी प्रबंध किया गया उसमें भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। मकान बनाने के लिए जो प्लाट काटे गए उनमें सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पूरी तरह से उल्लंघन हुआ। प्लाटों का आबंटन भी मनमाने ढंग से हुआ। इस तरह का अधिकार नहीं होने के बावजूद इन अधिकारियों ने प्लाटों की अदला-बदली की जिसमें दलालों की प्रमुख भूमिका रही। यह सिद्ध हो चुका है कि प्लाटों के आबंटन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है।

न्यायमूर्ति झा ने अपनी रिपोर्ट पिछले वर्ष पेश कर दी थी। रिपोर्ट की भूमिका में यह लिखा है कि उन्हें आयोग का संचालन करने के लिए जो साधन चाहिए थे वे उचित मात्रा में उपलब्ध नहीं करवाए और एक ऐसा अवसर आया जब कमीशन के लिए आर्थिक सहायता देना लगभग बंद कर दी गई, जिससे जिस भवन में आयोग का संचालन होता था उसका किराया, टेलीफोन और बिजली का बिल तथा अन्य कार्यालयीन गतिविधियों के लिए भुगतान नहीं किया जा सका। अंत में न्यायमूर्ति झा ने अपनी पीड़ा प्रकट करते हुए कहा कि वित्तीय साधन के अभाव में आयोग अपनी रिपोर्ट की एक ही प्रतिलिपी दे रहा है क्योंकि उसके पास एक से ज्यादा प्रतिलिपी करवाने के लिए पैसा नहीं है। इस संबंध में एक जानकार व्यक्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शायद ऐसा इसलिए किया गया जिससे आयोग उचित ढंग से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन न कर सके।

नर्मदा के डूब क्षेत्र में जो स्थितियां थीं उनके संबंध में मीडिया में समय-समय पर समाचार छपते रहे। जब यह तय किया गया कि 31 जुलाई, 2017 के पहले सभी को पुनर्वास होने वाली जगहों पर जाना है तो उसी बीच अनेक स्थानीय अखबारों में इस विषय से संबंधित समाचार छपे। 9 जून को स्थानीय समाचारपत्रों में छपा की 'पुनर्वास स्थलों की हालत खराब, कैसे हो विस्थापन?’; 'तालाब बने पुनर्वास स्थल’; उजड़े पुनर्वास स्थल पर नहीं बसना चाहते विस्थापित’। ये समाचार उस दौरान छपे जब मध्यप्रदेश सरकार यह चाहती थी कि 31 जुलाई तक जो भी लोग डूब के क्षेत्र में रह रहे हैं वे उन क्षेत्रों को खाली करके चले जाएं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मेधा पाटकर ने अपना अनिश्चितकालीन अनशन प्रारंभ किया था जो अभी तक जारी है।

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