शहर सिसकते न हों कहीं

जीवन ने जो बहुत सारी बातें सिखाई हैं उनमें से एक यह भी है कि जिस तरह व्यक्ति से मिलना व्यक्ति से मिलना नहीं होता, उसी तरह शहर में जाना शहर में होना नहीं होता...

देशबन्धु
शहर सिसकते न हों कहीं
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देशबन्धु

प्रतिभा कटियार

जीवन ने जो बहुत सारी बातें सिखाई हैं उनमें से एक यह भी है कि जिस तरह व्यक्ति से मिलना व्यक्ति से मिलना नहीं होता, उसी तरह शहर में जाना शहर में होना नहीं होता। आप एक हाथ में टिकट और पीठ पर बैग लेकर किसी शहर में उतरेंगे और वो शहर आपके लिए अपने दरवाजे खोल देगा इसमें संदेह है। शहर पहले आपको टटोलता है। वो आपकी घुम्म्क्कजी की नब्ज की टोह लेता है। आपके कदम जब शहर की सडको पर रखे जा रहे होते हैं, तब आप नहीं जानते कि शहर की सजकें आपके भीतर के कोलाहल को, शहर से दोस्ती करने की आपकी इच्छा को तलाश रहे होते हैं। शहर की हवाएं आपके जिस्म को नहीं छूतीं वो आपके भीतर टटोलती हैं वो आवेग जिसमें शहर के प्रति प्रेम है, शहर से इकसार हो जाने की इच्छा है, यात्रा के जोखिम उठाने का साहस है, जिसमें कोई हजबजी नहीं है।

शहर अपने प्रेमियों की तरफ पूरी मोहब्बत से हाथ बजाते हैं बाकी बचे लोग टूरिस्टों की भीज बनकर शहर की सजकों को रौंदते हुए, शहर के मिजाज को लांघते हुए, शहर की आत्मा को चोटिल करते हुए सेल्फीस्टिक के सहारे मोबाईल कैमरों में कैद होते रहते हैं, सोशल मीडिया पर अपलोड होते रहते है। शहर गाजियों के कोलाहल, सामर्थ्य से ज्यादा पर्यटकों का बोझ वहन करते हुए और बेहिसाब फैलाये गए कचरे को उठाते-उठाते सिसक रहे होते हैं।

शहरों की सिसकियां किसी को सुनाई नहीं देती। गाजियों के हॉर्न सुनाई देते हैं। भीज की लिस्ट में एक शहर और जुज जाता है लेकिन शहर की तासीर नहीं जुडती, मौसम नहीं जुजते। जाने वो लौटने के बाद अपने भीतर जरा भी परिमार्जन महसूस करते हैं या नहींज जाने  यात्रा उनके भीतर की गांठों को खोल भी पायी या नहीं, जाने वो बादल का टुकजा जिसे लपककर कैमरे में कैद किया था वो आँखों की कोर से बरसा भी या नहींज उनमें से किसी के पास कहाँ था वक्त जो शहर के सीने से लगकर शहर के किस्से सुनता। 


सिनेमा देखने, मॉल जाने, नए फैशन के कपडे पहनने, जन्मदिन पर केक काटने, न्यू ईयर पर जबरिया उल्लास का लिबास पहनने की तरह ही टिक मार्क वाली यात्राएँ भी जीवन में  शामिल होने लगी हैं। इसका नतीजा है शहरों की लगातार होती ऐसी-तैसी। एक तो यूँ ही पर्यटन स्थलों खासकर पहाजों पर विकास के नाम पर सीम्नेट और कंक्रीट का जंगल खूबसूरत हरे जंगलों को काटकर उगाया जा रहा है तिस पर ये नए किस्म का उपभोक्तावाद जो यात्रा को भी चपेट मे ले रहा है। हमारे शहर सिसक रहे हैं, कोई सुनता नहीं। खूबसूरत झील के किनारे कचरे का ढेर हो रहे हैं। किसी भी सुन्दर जगह से गुजरिये कचरे का ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, पौलिथिन, चिप्स के पैकेट, दारू की बोतलें दांत चियारे मिल जायेंगी। हमारे सभ्य होने का उपहास उजाते।

पिछले बरस इन दिनों मैं अपनी पहली और अब तक की इकलौती विदेश यात्रा पर थी। स्कॉटलैंड के खूबसूरत पहाजों को देखते हुए पहला ख्याल अपने उत्तराखंड के पहाजों का आया था कि कहीं से कम खूबसूरत तो नहीं हैं हमारे देश के पहाज, यहाँ के मौसम बस कि हम उनका ख्याल रख पाने में बुरी तरह से चूक जाते हैं। हमने अपने खूबसूरत शहरों को रौंद कर रख दिया है। हमने फेसबुक पर अपडेट करने के लिए या दोस्तों पर रौब झाजने के लिए पर्यटन के नाम पर शहरों की ओर दौज लगाना तो सीख लिया, तस्वीरें खींचकर अपलोड करना तो सीख लिया लेकिन शहरों से पेश आने का सलीका नहीं सीखा। 

पिछले दिनों जब एक कार्यशाला के दौरान नैनीताल में थी एक बार फिर यही सब आँखों के सामने था। समूचा शहर गाजियों के जाम, लोगों के हुजूम और गंदगी के ढेर के बीच बिलख रहा था। एक तरफ ऊंची पहाजियों पर बादलों का खेल चल रहा था दूसरी तरफ नकली मुस्कुराहटों से बजबजाती तस्वीरों के उद्योग में बदल चुका एक पूरा हुजूम नैनी झील के सीने में छुपे दर्द को सुनने की फुर्सत और जिक्र किसी के पास नहीं थी।

वो सुन नहीं पा रहे थे कि असल में शहर को आपके जाने का इंतजार था बारिशों के पहाज, समंदर, जंगल, खेत, सजकें बेहद मोहक होते हैं। पहाजों पर बादलों का अप्रतिम खेल चलता है जिसमें सूरज की मनमर्जियां अलग ही रंग भरती हैं...शहर अपने मेहमानों से प्यार करते हैं। लेकिन मेहमानों को भी सलीकेमंदी से  पेश आना तो सीखना होगा नज जिन शहरों की खूबसूरती से खिंचकर हम वहाँ जाते हैं उसे ही नष्ट करके चले आते हैं ये कहाँ का सलीका है, ये कैसी यात्रा है!

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