दूसरी पृथ्वी खोजने से पहले

विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी चौहत्तर वर्षींय प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने चेतावनी देते हुए कहा है...

देशबन्धु
दूसरी पृथ्वी खोजने से पहले
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राजकुमार कुम्भज
मनुष्य खुद ही प्रकृति के बुनियादी कणों का एक संग्रह मात्र है

विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी चौहत्तर वर्षींय प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि मानव जाति अपने इतिहास में आज सबसे अधिक खतरनाक वक्त का सामना कर रही है। हमारी यह पृथ्वी संकट में है। मनुष्यों को पृथ्वी से परे अपने रहने लायक किसी दूसरे ग्रह की तलाश करनी होगी, हमारी आज की दुनिया अत्यधिक पर्यावरणीय और तकनीकी चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे में बेहद जरूरी हो जाता है कि मानवता की रक्षा के लिए एकजुट होकर काम किया जाए। स्टीफन हॉकिंग कहते हैं कि हम जिन बहुत ज्यादा पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनमें जलवायु परिवर्तन, खाद्य उत्पादन, ज्यादा आबादी, अन्य प्रजातियों का विनाश, महामारी और समुद्रों का अमलीकरण आदि शामिल हैं, इन तमाम बातों से जाहिर होता है कि हम मानवता के विकास में सबसे खतरनाक क्षण में जी रहे हैं। हालात इतने दयनीय और नाजुक हो चुके हैं कि अपनी इस नाजुक पृथ्वी पर मनुष्य अब एक हजार बरस से अधिक वक्त तक बचा नहीं रह सकेगा, अर्थात अगले एक हजार बरस में हमें हमारे लिए एक दूसरी पृथ्वी खोजना होगी, किन्तु दूसरी पृथ्वी खोजने से पहले इसी पृथ्वी को बचा लेना क्या बेहतर विकल्प नहीं होगा?
माना कि इक्कीसवीं सदी की मानवता अपने तकनीकी विकास के मामले में चरमोत्कर्ष पर है, किन्तु क्या हमने अपनी इस विकास प्रक्रिया में प्रकृति के साथ भी कुछ तादात्म्य बैठाने का प्रयास किया है? जाहिर है कि हमने प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए प्रकृति से आगे निकल कर प्रकृति को पछाड़ देने में ही अधिक दिलचस्पी दिखाई है। आज हम जिस तकनीकी विकास पर इतरा रहे हैं, वह विकास नहीं विनाश ही अधिक है। सर्व-सुलभ प्राकृतिक संसाधन तेज गति से खत्म हो रहे हैं, आबादी बढ़ रही है। शुद्ध हवा, शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है, कहीं अल्प वर्षा तो कहीं अतिवर्षा का आलम है। कुपोषण और महामारियां मानवता के दुश्मन बने हुए हैं। प्रदूषण हमारे नियंत्रण से बाहर है। सूखा आए दिन का संकट बन गया है। बेहतर जीवन की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है। नगरीय प्रशासन व्यवस्थाएं हांफ रही है और मनुष्य की बुनियादी जरूरतें सुरसा की तरह मुंह फाड़ रही है, आखिर हमने ये कैसा विकास कर लिया है? तमाम वैकल्पिकताओं का क्या हुआ? क्यों विचार से बड़ा व्यक्ति हो गया है?
वैश्विक-राजनीति में बदलाव के दौर पर हॉकिंग ने कहा है कि अमेरिका में सत्तर वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप का उदय और यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने का निर्णय, अपने नेताओं द्वारा पीछे-छोड़ दिया जाना महसूस कर रहे लोगों के गुस्से की स्वीकारोक्ति है। स्टीफन हॉकिंग कहते हैं कि हमारे पास अपने ग्रह (पृथ्वी) को नष्ट करने की तकनीक तो है, किन्तु इससे बच निकलने की क्षमता हमने कहां विकसित की है? बहुत संभव है कि कुछ सौ बरस में हम तारों के बीच मानव बस्तियां बसा लेंगे, किन्तु अभी तो हमारे पास सिर्फ एक ही ग्रह है। वे कहते हैं कि ‘मेरे विचार में अंतरिक्ष में जाए बिना मानव जाति का कोई भविष्य नहीं है। वे कहते हैं कि मैं अंतरिक्ष के प्रति सार्वजिनक दिलचस्पी को प्रोत्साहित करना चाहता हूं। लोग अंतरिक्ष यात्राओं में और अधिक दिलचस्पी लें, तारों को निहारना याद रखें और अपने कदमों को न देखें तब बहुत संभव है कि हम एक दिन गुरुत्वाकर्षण तरंगों का इस्तेमाल करके अतीत में हुए महाविस्फोट (बिग-बैंग) को देख सकेंगे। ऐसी विश्व-मान्यता है कि यह ब्रह्मांड एक महाविस्फोट से ही पैदा हुआ है, हमें भूलना नहीं चाहिए कि वैज्ञानिक उन्नति के आधार पर ही आज हम अबाध अंतरिक्ष का अबाध न•ाारा बखूबी देख पा रहे हैं। मानवता के भविष्य की खातिर अंतरिक्ष में जाना जारी रहना चाहिए। समस्त पृथ्वी का जीवन किसी आपदा से अचानक नष्ट हो जाने के खतरे की ओर निरंतर बढ़ रहा है। अचानक ही इस दुनिया में बहुत कुछ घटित हो सकता है जैसे कि अचानक ही परमाणु युद्ध हो सकता है, जैसे अचानक ही जैविक तौर पर परिवर्तित वायरस आ सकता है, जैसे कि अचानक ही कृत्रिम बुद्धि से बढ़ रहा खतरा बढ़ सकता है, ये तमाम खतरे वे हैं जो हमारे मनुष्य जीवन को समाप्त कर सकते हैं। प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या जीवित रहने और सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में गंभीर से गंभीरतम शोध करने का यह शानदार समय नहीं ंहै?
कौन नहीं जानता है कि पिछले पचास बरस में ब्रह्मांड की तस्वीर कितनी बदल चुकी है? क्या हम जानते नहीं है कि मनुष्य खुद ही प्रकृति के बुनियादी कणों का एक संग्रह मात्र है? तो क्या हम उन नियमों को जानने-समझने के बेहद करीब नहीं पहुंच गए हैं? कौन कहेगा कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के सिद्धांत को जान लेने का दिन अब भी बहुत दूर है? एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों...। ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं तलाशने के बाद वैज्ञानिक अब तारों की ओर बढ़ रहे हैं, हाल ही में दुनिया के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सबसे निकटतम तारे ‘अल्फा प्रोक्सिमा’ को खोज निकाला है, जो पृथ्वी से सिर्फ चार प्रकाश वर्ष दूर है, किन्तु यहीं यह भी जान लेना बेहद दिलचस्प हो सकता है कि तारों का निर्माण, विकास और अंत क्यों? किस लिए और किस तरह होता है? और यह भी कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति से तारों का क्या संबंध है? जैसे सवालों का रहस्य, संसार भर के वैज्ञानिक अभी तक नहीं सुलझा सके हैं?
नैनीताल के देवस्थल में आने वाले दिनों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य सुलझाने के लिए एशिया की अब तक की सबसे बड़ी 36 मीटर प्रकाशीय दूरबीन लगाई गई है और बहुत जल्द ही चार मीटर लिक्विड मिरर दूरबीन भी लगाई जाएगी, जिससे कि हमारे देश के ‘आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान संस्थान’ (एरीज) को अपने अनुसंधान कार्यों में बहुत मदद मिलेगी। एक सम्मानजनक बात यह है कि इन दूरबीनों के जरिए ब्रह्मांड  की उत्पत्ति आकाशगंगा और तारों पर शोध करने के लिए दुनिया भर के भौतिकविद वैज्ञानिक ‘आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान संस्थान’ (एरीज) से संपर्क करने लगे हैं।
माना जाता है कि हमारी आकाशगंगा में दस करोड़ से अधिक तारे हैं, जबकि ब्रह्मांड में इतनी ही संख्या आकाश गंगाओं की भी मानी जाती है। प्रकाशकीय दूरबीन और लिक्विड मीटर दूरबीन से इस वैज्ञानिक खोज की दिशा में बेहद मदद मिलेगी। छोटी दूरबीनों से की गई अब तक की अधूरी खोजों को आगे बढ़ाने में इन बड़ी दूरबीनों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भूमंडलीकरण के आर्थिक असर और तेजी से चल रही प्रौद्योगिक परिवर्तन की चिंताएं बेहतर समझा जाना जरा भी अन्यथा नहीं है। तकनीक के बढ़ते प्रयोग ने प्रारंभिक तौर पर पारंपरिक उद्योगों में रोजगार के अवसर पहले ही सीमित कर दिए हैं। आज हम उस दुनिया में रह रहे हैं, जहां आर्थिक-विषमता बराबर और लगातार बढ़ रही है।, आज हमारे चारों तरफ एक ऐसी दुनिया का निर्माण होता जा रहा है जहां लोग स्तरीय-जीवन जीने को भूलकर यह सोचने में सक्रिय है कि जीवकोपार्जन के रास्ते क्यों बंद होते जा रहे हैं? स्टीफन हॉकिंग कह रहे हैं कि उनका कल्पना लोक पहले से कहीं ज्यादा विशाल होता जा रहा है। जाहिर है कि प्रकृति के संरक्षण में लौट कर ही हम मानवता की रक्षा कर पाएंगे; क्योंकि प्रकृति के ही पास अनेक वैकल्पिक क्षमताएं और विविधताएं अपार हैं। इतनी वैकल्पिक क्षमताएं और विधिताएं प्रौद्योगिकी और तकनीक में उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी पृथ्वी खोजने से पहले इसी पृथ्वी को बचा लेना क्या बेहतर विकल्प नहीं होगा?


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