नीरज के साथ एक तस्वीर 

जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाए थे...

देशबन्धु
नीरज के साथ एक तस्वीर 
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- प्रतिभा कटियार

जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाए थे। घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट ्रटीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल 'बीबीसी की खबरें' या 'बिनाका गीतमाला' और 'हवा महल' सुनने के लिए होता था, कभी-कभी 'फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम' भी। कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था। ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी। चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाए थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे। महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे। उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी 'लता के सुपरहिट गीत', दूसरी थी 'मेरा नाम जोकर', तीसरी थी 'मुकेश के गीत' और चौथी थी 'नई उमर की नई फसल।' मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था। धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी।

'कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे' तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है 'आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहां आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी' इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज।

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला। इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी। अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी। उनसे मेरी पहली मुलाकात थी। अखबारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है। उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था। यह उन दिनों की बात है जब मेरी नई-नई शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइजिंग वगैरह तो उसका दबाव भी था। तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक 'न' कहना सीखा नहीं था)। बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ। अगले दिन हिंदुस्तान अखबार में 'नीरज खरे प्रेम के गांव' शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ। मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा। मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं।

स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक। हालांकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से। खैर, वक्त ने न्याय किया। इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं। कुछ अखबारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी। वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते। ढेर सारी बातें करते। मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती। पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियां और स्नेह हासिल किया। एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था। उस शाम नीरज जी ने याद किए थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैरी वगैरह हुआ करते थे। वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आंखों में चमक थी।

उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की। किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है। साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते।


मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर। उन्हें भी कविता याद नहीं थी। वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते। उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख्वाब को जी लेने जैसा होता था। उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता।

हालांकि उनकी आवाज कांपने लगी थी। लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। मेरा मन बहुत उदास था। आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था। उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी। जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी।

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते। सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे। बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा 'एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ।' मैंने छलक आए अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, 'अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे।' वो हंस दिए थे'क्या पता अगली बार हो ही नहीं'। मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे। तस्वीर खींची जा चुकी थी। मन की उदासी कायम ही रही। आज उनका जन्मदिन है। उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूं। दुआ कर रही हूं कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भी। में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कविताएं। इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी पक्का। लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!

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