सिलिकोसिस बीमारी एक बहुत बड़ी त्रासदी

राजस्थान में अनेक तरह के पत्थर के खनन व इस पर आधारित स्टोन क्रशर का कार्य व्यापक स्तर पर होता है। इस कार्य व कुछ अन्य कार्यों में जो धूल के महीन कण फेफड़ों में पंहुचते हैं, ...

भारत डोगरा
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क्या पीडि़तों के दर्द को सरकार समझेगी

राजस्थान में अनेक तरह के पत्थर के खनन व इस पर आधारित स्टोन क्रशर का कार्य व्यापक स्तर पर होता है। इस कार्य व कुछ अन्य कार्यों में जो धूल के महीन कण फेफड़ों में पंहुचते हैं, उससे सिलिकोसिस नामक गंभीर बीमारी उत्पन्न होती है। सिलिकोसिस एक बहुत गंभीर रोग है। इससे पीडित व्यक्तियों में तपेदिक से संक्रमित होने की संभावना भी बढ़ जाती है, जिससे कि कई मरीज सिलिकोसिस के साथ तपेदिक से भी पीडि़त पाए जाते हैं। राजस्थान में पत्थर खनन कार्य की अधिकता के कारण सिलिकोसिस की अधिकता की संभावना तो पहले से थी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं व कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं व संगठनों के प्रयासों के कारण इस बारे में छिटपुट समाचार भी मिलते रहते थे। पर हाल के समय में जो जानकारियां मिली हैं उससे तो लगता है कि पहले के अनुमानों से भी कहीं बड़े पैमाने पर यह बीमारी राजस्थान में एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में मौजूद है।
कुछ समय पहले (वर्ष 2016 में) राजस्थान के अनेक जन-सगठनों ने मिलकर एक जवाबदेही यात्रा का आयोजन राजस्थान के सभी जिलों में किया जिससे अनेक जिलों में इस समस्या की गंभीरता और व्यापकता का पता चला। उसके बाद इस वर्ष के आरंभ में 4 जनवरी को भीलवाड़ा में सिलिकोसिस पर एक महत्त्वपूर्ण जन-सुनवाई का आयोजन किया गया जिससे यह और स्पष्ट हुआ कि यह समस्या बहुत गंभीर और व्यापक है।
इन दोनों प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश गोस्वामी बताते हैं कि 21 जिले इस समस्या से महत्त्वपूर्ण स्तर पर प्रभावित हैं व एक जिले में सिलिकोसिस से त्रस्त व्यक्तियों की संख्या औसतन दस हजार के आसपास होने की संभावना है। वे बताते हैं कि 100 फीट से भी अधिक गहराई से खनन कार्य तो उन्होंने स्वयं देखा है जबकि कुछ मीडियाकर्मीयों ने मौके पर जांच कर बताया है कि 400 फीट से अधिक की गहराई तक खनन हो रहा है। मजदूरों के स्वास्थ्य व जीवन की रक्षा की व्यवस्था बहुत कम की गई है। जहां खनन का मलबा व कचरा फैंका जाता है, उन गांवों के लोग भी सिलिकोसिस से प्रभावित हैं।
झुंझनु-सीकर क्षेत्र के बारे में एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा ने जन-सुनवाई में बताया कि खनन के अतिरिक्त स्टोन क्रशर से कार्य करने वाले बहुत से मजदूर सिलिकोसिस से प्रभावित हो रहे हैं। विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने बताया कि पहली बार वे कुछ सिलिकोसिस मजदूरों से मिले तो इतने कमजोर व्यक्तियों को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। ऐसा लगा कि इन मजदूरों से सारी जीवन-शक्ति निचोड़ ली गई है। इसके बावजूद उनकी राहत के लिए ऊपर से आया गया पैसा तब तक वितरित नहीं हुआ था अत: सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे शीघ्र वितरित करने का अभियान चलाया।
निखिल डे इन मजदूरों व मजदूर परिवारों को राहत दिलाने में बहुत सक्रिय तो हैं, पर उनका मानना है कि सबसे बड़ी जरूरत तो यह है कि इस बीमारी के उत्पन्न होने की संभावना को ही न्यूनतम किया जाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने वर्ष 2011 में कहा था कि यदि कार्य स्थितियों का सही नियमन हो, व बचाव के सब जरूरी उपाय किए जाएं तो सिलिकोसिस की बीमारी से बचा जा सकता है। अत: सिलिकोसिस के मरीजों व उनके परिवार को राहत देने के साथ सिलिकोसिस की रोकथाम करने व इस बीमारी की संभावना को न्यूनतम करने के व्यापक व मजबूत प्रयास बहुत जरूरी हैं।


 

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