कठपुतली कला से जुड़े परंपरागत कलाकार

हमारे देश में कुछ ऐसे परंपरागत कलाएं हैं तो बहुत समृद्ध हैं, पर आधुनिकता के दौर में उनके बारे में जल्दबाजी में ऐसी सोच बना ली गई है कि अब उनका वक्त बीत गया है। ...

कठपुतली कला से जुड़े परंपरागत कलाकार
भारत डोगरा

भारत डोगरा
हमारे देश में कुछ ऐसे परंपरागत कलाएं हैं तो बहुत समृद्ध हैं, पर आधुनिकता के दौर में उनके बारे में जल्दबाजी में ऐसी सोच बना ली गई है कि अब उनका वक्त बीत गया है। कठपुतली कला एक ऐसी ही कला है। सिनेमा, टीवी और कंप्यूटर के दौर में बहुत से लोगों ने यह जल्दबाजी में मान लिया कि अब कठपुतली तो पुरानी बात हो गई, इतने सशक्त माध्यमों के सामने भला कठपुतली के कार्यक्रम कैसे टिक पाएंगे।
पर इस तरह की सोच में यह भुला दिया जाता है कि परंपरागत कलाओं को भी आधुनिक समय की जरूरतों के अनुसार ढालकर उन्हें अधिक उपयोगी व प्रासंगिक बताया जा सकता है। परंपरागत कठपुतली कला में इस तरह के बदलाव कर उसे सामाजिक बदलाव से जोडऩे का प्रयास आज कुछ कलाकार कर रहे हैं।
रामलाल एक ऐसे ही कठपुतली कलाकार हैं जो इन प्रयासों से जुड़े रहे हैं। रामलाल का मानना है कि जहां एक ओर कठपुतली कार्यक्रमों के विषय और तकनीक में नई जरूरतों के अनुसार प्रयोग करने की जरूरत है वहां उन समुदायों में कुछ व्यापक सुधार व प्रगति के प्रयासों की जरूरत है जो परंपरागत तौर पर इन कलाओं से जुड़े रहे हैं।
रामलाल स्वयं राजस्थान के ऐसे ही समुदाय से हैं। उन्होंने अपना आरंभिक कार्य राजस्थान में स्थित बेयरफुट कालेज में किया जोकि कठपुतलियों के सार्थक उपयोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। इसके कुछ समय बाद वे उत्तराखंड में गए व वहां के लोक कलाकारों व लोक कलाओं की सहायता के प्रयासों से भी जुड़े। यह प्रयास जारी रखते हुए वे चाहते हैं कि जिस समुदाय से उन्होंने अपना जीवन आरंभ किया उसकी व्यापक भलाई के कार्यों से जुडऩा उनके लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।
राजस्थान के कुछ क्षेत्र जैसे नागौर क्षेत्र कठपुतली कला का एक बड़ा केंद्र रहे हैं। यहां के भाट व नट समुदायों ने कठपुतली कला को बहुत समय तक आगे बढ़ाया पर समय के साथ इस कला पर आधारित आजीविका के अवसर कम होते गए। हालांकि पर्यटन व शिक्षा से कठपुतली कला के कुछ प्रयास अवश्य हुए, पर इन छिटपुट प्रयासों से समुदाय की व्यापक भलाई के कार्य नहीं जुड़ सके, कोई समग्र व बड़ा प्रयास इस दिशा में नहीं हो सका।
चंद कलाकारों को कुछ अच्छे अवसर मिल जाएं, वे विदेशों में भी कार्यक्रम कर आएं, पर्यटकों को भी रिझा दें, यह सब भी अपनी जगह अच्छा लग सकता है, पर वास्तविक जरूरत तो इस बात की है कि पूरे समुदाय को व्यापक स्तर पर अवसर मिलें जिससे कि नई पीढ़ी में भी अपनी परंपरागत कला के प्रति रुचि जागृत हो तथा इस तरह इस कला को आगे भी व्यापक स्तर पर जीवित रखा जा सके तथा नई जरूरतों के अनुसार और समृद्ध भी बनाया जाए।
रामलाल मानते हैं कि जिस निराशा और उपेक्षा से इन समुदायों को गुजरना पड़ा है उस दौर में इन समुदायों में कई आन्तरिक समस्याएं भी आ गई हैं, कुछ कुरितियां भी आ गई हैं और उन्हें भी दूर करना जरूरी है। जब कुछ नए अवसर उत्पन्न होंगे, कुछ नई उम्मीद जगेगी तो इन बुराईयों जैसे नशे की समस्या को दूर करने के लिए भी नया उत्साह जागृत होगा।
ऐसे प्रयासों की सफ लता के लिए समुदाय के बाहर के वरिष्ठ कलाकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग भी बहुत उपयोगी है। कठपुतली कला में सार्थक सामाजिक सरोकारों से जोडऩे में बहुमूल्य योगदान दिया है मजदूर किसान शक्ति संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता शंकर सिंह ने। शंकर सिंह जैसे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं व कलाकारों के सहयोग से कठपुतली कला को सामाजिक सरोकारों से जोडऩे के प्रयास आगे बढऩे चाहिए व इन प्रयासों में कठपुतली कला से जुड़े परंपरागत समुदायों की भरपूर भागेदारी होनी चाहिए।
शंकरसिंह व उनके साथियों ने कठपुतली कला का बहुत सार्थक उपयोग सूचना के अधिकार व मनरेगा जैसे राष्ट्रीय अभियानों में बहुत सफलता से किया। जिस तरह लोगों ने कठपुतली कला के इस नए रूप को सराहा व पसंद किया, उससे यह उम्मीद जागती है कि इस तरह के अनेक सार्थक प्रयास और व्यापक स्तर पर सफल हो सकते हैं।


 

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