नगर-वधू

नगर-वधू
देशबन्धु

कहानी
-सुशीला मिश्र

मथुरा नगर के प्राचीन-प्राचीरों के द्वार पर पड़े भिक्षु उपगुप्त के वक्षस्थल पर अपने चरणों से प्रहार करने वाली नृत्यांगना जब उनसे क्षमा-याचना करके अपने रंगमहल में, आगमन के लिए, आमंत्रित करती है तो क्षमाशील, नेत्रों से उपगुप्त प्रति उत्तर देते हैं- ‘हे, सुन्दरी मैं तुम्हारे पास उचित समय पर एक दिन अवश्य आऊंगा।’
कैसे इतिफाक उसी स्थल पर वर्षों पश्चात वही सौन्दर्य के मद में उन्मत्त वारांगना असाध्य लोगों से ग्रसित, समस्त जीर्ण-शीर्ण शरीर लेकर उपगुप्त से मिलती है जो उसके शुष्क ओठों को जल से सींचकर आश्वासन भरे शब्दों में कहते हैं- ‘हे सुन्दरी। वक्त आ गया है और मैं आ गया हूं।’
गौतम बुद्ध के अनुयायी भिक्षु उपगुप्त के बारे में, टैगोर की यह रचना जो उन्होंने सुन्दर कविता द्वारा रची है, सहसा याद आ गई।
मुझे अभी तक की जिन्दगी में, शुभांगी जैसी स्त्री देखने को नहीं मिली है।
मैं अपने पति और बच्चों के साथ भ्रमण हेतु उड़ीसा गई थी जहां अनेक दर्शनीय स्थल देखने की अभिलाषा हम सभी के दिलों में थी। बच्चियों की गर्मियों की छुट्टियां थीं। अतएव पन्द्रह दिन का प्रोग्राम बनाकर हम उड़ीसा के लिए रवाना हुए। कोणार्क, भुवनेश्वर, उदयगिरि की गुफाएं, कटक, नीलगिरि के सोने-चांदी के अत्यन्त सुन्दर, बारीक नक्काशी किये हुए आभूषण, जिन्हें सारी दुनिया की औरतों ने सराहा है, जगत प्रसिद्ध जगन्नाथपुरी का मंदिर, पुरी की एक अथाह गहरा समुद्र और अनेक दर्शनीय स्थल देखने की लालसा हमें वहां ले गई।
उसकी मेरी प्रथम भेंट पुरी के समुद्र तट पर हुई। उसे देखकर मैं चकित रह गई थी। ऐसा लगता था, जैसे किसी मूर्तिकार ने सम्पूर्ण अनुपात को ध्यान में रखकर उनकी रचना की थी। ऊंचा कद, गोरा रंग, चमकदार और काली बड़ी-बड़ी आंखें, उसके उरोज उसके वस्त्र को विदीर्ण कर प्रस्फुटित होते मालूम पड़ते थे। उस पर उसकी शृंगार की रुचि भी पष्किृत थी। किसी राजकुमारी से किसी तरह कम न था उसका सौष्ठव एवं सौन्दर्य, उसकी मोहक मुस्कान और विनोद-पूर्ण चुटकुले से प्रभावित हो, थोड़ी देर में ही, उससे इतनी घुल-मिल गई जैसे वर्षों से एक दूसरे को जानते हों।
यह जानकार कि शुभांगी भी दिल्ली में रहती है, मुझे आन्तरिक खुशी हुई। उसे एक सप्ताह और वहां ठहरना था। इसलिए जल्दी मिलने का आग्रह कर, अपना पता देकर, मैं अपने परिवार के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गई।
एक दिन मैं क्लीनिक में बैठी, मरीजों की जांच कर रही थी कि शुभांगी का कार्ड लिए नर्स आई।
वह मुझसे चैकअप कराने आई थी। बातों-ही-बातों में वह बोली-‘शीलू आजकल, गनोरिया, सिफलिस, पता नहीं क्या-क्या बीमारियां हो रही हैं, डर लगता है।’
मैंने हंसते हुए कहा-‘बिना वजह इस तरह का शक क्यों पाल रही हो और एक बुद्धिमान व्यक्ति को किस बात का डर है?’
फिर अक्सर वह मुझे फोन करने लगी, कभी-कभी मैं भी खाली होती तो फोन पर उससे उसका हाल-चाल पूछती, फिर बीच-बीच में मिलना भी होता रहा।
मैं समझ रही थी उसकी कोई फैक्ट्री होगी, या कोई दूसरा व्यापार, वरना इस तरह के विलास एवं ऐश्वर्य से जीवन बिताना किसी नौकरीपेशा वाले के लिए संभव नहीं है। बड़े-बड़े अफसर महीने के आखिर में, पैसों की तंगी महसूस करते हैं। उनकी तनख्वाह का चन्द्रमा छोटा होता जाता है। ऊपरी आमदनी हो तो बात अलग है।
उस दिन तो वाकई मुझे सदमा सा लगा, जब मुझे बतलाया गया कि उसका पति एक एकाउण्टेंट है और शुभांगी कोई काम नहीं करती है। फिर वह करती क्या है?
वह अकेली रानी किस प्रदेश पर शासन करती थी?
जिस दिन मैं उसके यहां गई तो बरामदे में कई लोग उससे साक्षात्कार करने के लिए लाइन में बैठे थे। मैं अन्दर गई तो वह किसी से बात कर रही थी। उसकी एक असिस्टेंट एक डायरी लिए खड़ी थी। मेज पर कई लिफाफे रखे थे। मुझे देखकर वह प्रसन्न नहीं दिखी।
उसने लडक़ी को आज्ञा दी कि पन्द्रह मिनट तक वह किसी को अन्दर न भेजे।
उसने पूछा- ‘कॉफी या चाय?’
-‘चाय’
‘आज तुमसे, तुम्हारे ही घर में मिलने का मन हुआ, आज छुट्टी भी मैंने ले ली है सोचा तुम्हें अपनी अचानक उपस्थिति से चौंका दूंगी किन्तु देख रही हूं तुम तो कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो।’
वह बहुत रूखे स्वर में बोली-‘हर काम मैं प्लानिंग से करती हूं। मेरा इन्जायमेंट उसी वक्त होता है जो समय उसके लिए निर्धारित है। ये तमाम लोग मेरा इन्तजार कर रहे हैं। किसी का कुछ केस है, किसी का कुछ, एक बड़ी समाजसेविका होने के कारण जिम्मेदारियों से लदी मेरी दिनचर्या है। अब आओ तो कृपया फोन से प्रोग्राम तय कर-ठीक है न?’
उसके इस तरह के बर्ताव और बोल से मैंने अपने आप को बहुत आहत और अपमानित महसूस किया। मैं वहां से फौरन चल दी।
एक दिन वह क्लब में मिल गई, देखते ही मुझसे लिपट गई। उस दिन के उसके बर्ताव से मैं आहत थी किन्तु उसकी गर्म-जोशी और प्यार के मिलन ने मुझे शांत कर दिया।
वैसे भी मेरे मिस्टर को मेरा उससे सम्पर्क अच्छा नहीं लगता था किन्तु पता नहीं क्यों उसके बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई। धीरे-धीरे वह मुझसे घनिष्ठ होती चली गई।
वह मुझसे कहती-‘मैं उन्मुक्त गगन में विचरण करने वाली निर्भीक वाहक हूं। दासता में शोषित इन दकियानूसी मूल्यों का क्या महत्व है? मैं अपना रास्ता खुद बनाती हूं। बड़े-बड़े अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानान्तरण की लगाम मैं थामे हुए हूूं।’ मैं डर गई उसकी बातें सुनकर सोचा ये तो बिना लगाम की घोड़ी है फिर भी पूछ लिया।
‘आपके पति को कोई आपत्ति नहीं है।’
‘वो’,  वह हंसी-‘बावन पत्तों की गड्डी में एक पत्ता है उसे किस बात पर अफसोस हो सकता है? स्वयं उसका सारा अस्तित्व, मेरी इच्छा पर टिका हुआ है। जरा कुछ आंखें दिखाये तो उसे दर-दर का भिखारी बना दूं... डॉक्टर, हम तो विश्वास करते हैं- खूब मौज करो और करने दो क्योंकि, जिन्दगी एक बार ही मिलती है इसलिए कोई कितना ही अपरिचित हो उसे अपनी बातों में समेट लेना मेरे लिए कठिन नहीं है। सौन्दर्य के पुजारी इस मंदिर में खुद अपनी बलि चढ़ाने आ जाते हैं। कोई उत्तरदायित्व शेष नहीं बचता। वर्तमान के आगे भूत, भविष्य सब धूल-धूसरित हो जाते हैं।’
मुझे लगा उसमें सामाजिक शक्तियों से लडऩे का अद्वितीय साहस है। परम्पराओं और रीति-रिवाजों को ठोकर मारकर स्वयं का मार्ग प्रशस्त करने की सामथ्र्य है उसमें। वह अपनी क्षमता और मनुष्य की कमजोरी को उसी तरह समझती है जैसे अनुभवी माली हर पौधे को। उसका शरीर वह क्रीड़ांगन है जहां बड़े-बड़े दिग्गज खेला करते हैं। वह एक राक्षसी की तरह कभी भी उनका खून चूस सकती है क्योंकि काम की उद्दाम शक्ति वह भली प्रकार पहचानती है।
वह काम के उन प्रतिबंधित क्षेत्रों का दौरा करने में भी नहीं हिचकिचाती जिन्हें समाज फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहता है।
वह कहती-‘संसार में श्रेष्ठ है शक्ति। औरत कौन-सी शक्ति है... उसी से दूसरी शक्ति पैदा होती है, दौलत की शक्ति... फिर राजनीति की... सारी दुनिया शीश झुकाती है।’
‘अति की गर्मी और अति का जाड़ा दोनों खराब होते हैं।’
‘प्रेमी के साथ दोनों ऋतुएं कितनी मधुर होती हैं, यह तुम जैसी घरेलू औरत क्या समझेगी? माना हमें भी धोखे मिलते हैं, रिस्क होता है लेकिन कहां नहीं होता? औरत के भाग्य में यह सब बंधा हुआ है। मां बनकर वह पुन: उस पुरुष की दास बनती है जिसे उसे जीवन-भर और बुढ़ापे में भी पालना होता है। ढोंगी पुरुषों की असलियत मुझसे पूछो डॉक्टर, ये सब किस प्रकार धोखा देते हैं, तुम्हें नहीं मालूम... न मैं कोई अफसर हूं और न राजनीतिज्ञ फिर भी ये सब मेरे पास क्यों आते हैं- बगैर कहे नोटों की गड्डियां क्यों मेरी टेबिल पर पटक जाते हैं?’
उसकी बातों से मेरी आत्मा को ठेस पहुंची। रोज यही सोचती रहती थी कि जितनी जल्दी हो उससे पिण्ड छुड़ाऊं। इसी बीच कुछ वर्षों के लिए मुझे, लंदन जाना पड़ा। मैं कई दिनों तक उस स्त्री के बारे में सोचती रही जिसने जिन्दगी में पहली बार मूल्यों और आदर्शों की होली जलाकर मुझे झिंझोड़ दिया था। किन्तु धीरे-धीरे मैं उसे भूलती चली गई।
कुछ वर्ष उपरान्त, अपनी भतीजी की शादी में हम कलकत्ता गये हुए थे। धरमतला में मुझे रिक्शे पर उसकी एक झलक-सी दिखाई पड़ी मैंने उसे गाड़ी रोक कर उतरवाया।
‘शुभांगी मैं विश्वास नहीं कर पा रही हूं कि तुम रिक्शे पर...’
‘ओ डॉक्टर-जिन्दगी भर तरह-तरह के वाहनों को बदलते-बदलते अब मैं रिक्शे पर उतर आई हूं।’ वह एक खिसियानी हँसी, हँसी।’
मैं उसे घर ले आई तो इन्हें अच्छा नहीं लगा। उसका शरीर काला पड़ गया था। चेहरे पर झुर्रियां आ गई थीं। वस्त्र भी मलिन और बेतरतीब थे।
शादी का घर था कुछ जलपान कर वह जल्दी ही चली गई।
आज एक माह उपरान्त अचानक मेरे क्लीनिक में आकर वह मेरे पांवों पर अपना सिर रख गिड़गिड़ा रही है।
मैंने उसे अपने हाथों से उठाया, प्यार से कुर्सी पर बैठाकर पूछा-‘तो अब कहो शुभांगी। सभी कुछ स्पष्ट और नि:संकोच। मैं तुम्हारा उपचार करने को तैयार हूं, क्या हुआ है तुम्हें?’
वह एक अज्ञात भय से पीडि़त थी। अपने जीवन से अब वह पूरी तरह से हताश थी।
खिन्न मन से वह बोली-‘डॉक्टर मेरा रोग असाध्य है। मैं अभी-भी अपनी जिन्दगी से प्यार करती हूं। किसी अट्टालिका से या ट्रेन के आगे कूदने का साहस मुझमें नहीं है। मैं तिल-तिल कर गल-गल कर मरना भी नहीं चाहती हूं। इसलिए मेहरबानी से मुझे सोने की गोलियां दे दो। वह अभी भी अनुनय-विनय कर रही थी-‘डॉक्टर... डियर मुझे टेबलेट्स दे दो... मरने के लिए-मेरी अब बस यही एकमात्र तमन्ना है प्ली•ा... मुझे निराश न करो।’ मैं असमंजस में पड़ गई-किन्तु डॉक्टर का काम तो जिलाना है मारना नहीं। मैंने अपने आप को संतुलित बनाये रखा। ‘आखिर तुम्हारी ऐसी क्या मजबूरी है?’
वह रोने लगी-‘मैं संसार की सबसे घृणित औरत हूं। मैं अब मरने के अलावा कुछ नहीं सोचती हूं। अब एक ही तमन्ना है मैं सोते-सोते इस दुनिया को छोड़ दूं।’
‘मगर तुम्हें हुआ क्या है?’ मैं अधीर हो उसे डांटती-सी बोली- ‘तुम अपना रोग बताओगी तभी तो मैं तुम्हें उसके मुताबिक गोलियां दूंगी।’
‘डॉक्टर, मुझे एड्स है.... मेरा सारा सिस्टम चौपट हो गया है। मुझे स्वचालित स्वस्थ करने की मशीनरी बिगड़ चुकी है। मैं कब तक इस पीड़ा को झेलूंगी- प्लीज...।’ वह टूटी हुई औरत की तरह अपने स्थान से उठी और अपने दोनों हाथों से, मेरे दोनों पैरों को आपस में जोडक़र उसने अपना सिर रख दिया। वह रो रही थी और अपने आंसुओं से मेरे पैरों को धो रही थी।
मैंने सोने की गोलियों से पूरी भरी शीशी उसे पकड़ा दी। अब वह शांति से चिरनिद्रा ले सकेगी। वह हठी मरते-मरते भी अपनी आखिरी तमन्ना को पूरा कर लेगी।


(कहानी संग्रह झाड़ी में सिसकती जिंदगी से)

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