होली खेलना है- आधार कार्ड है

‘मैं तो रंग डालूंगा...।’ इतना सुनते ही उस व्यक्ति ने आवाज लगाई- ‘पुलिस...।’ और चौक पर खड़ा पुलिसमैन बोल पड़ा-‘क्या है? क्यों चिल्ला रहे हो?’...

होली खेलना है- आधार कार्ड है
प्रभाकर चौबे

व्यंग्य
प्रभाकर चौबे

‘मैं तो रंग डालूंगा...।’
इतना सुनते ही उस व्यक्ति ने आवाज लगाई- ‘पुलिस...।’ और चौक पर खड़ा पुलिसमैन बोल पड़ा-‘क्या है? क्यों चिल्ला रहे हो?’
उस व्यक्ति ने कहा- ‘इसके पास आधार कार्ड नहीं है और यह रंग डाल रहा है।’
पुलिस- ‘कौन है, होली के दिन कानून तोड़ रहा। बेकार दिमाग खराब कर रहा’ और वह उनके पास आया, बोला- ‘क्या है?’
व्यक्ति ने कहा- ‘ये फूलचंद जी हैं। इनके पास आधार कार्ड नहीं है और होली पर रंग डालने निकले हैं। नियम-कायदे की खबर नहीं, सुध नहीं भांग खाकर पड़े रहते हो क्या? आधार कार्ड कहां है। रंग डालना हो तो आधार कार्ड होना। नहीं तो घर में सोते रहिये।’


होली और सरकार दोनों एक ही तासीर के हैं रंग-बिरंगी होली। रंग-बिरंगी सरकारें। न चेहरा दिखता न गुण का पता चलता- बस पुती हुई होली, बस पुती हुई सरकारें। सरकारों के आदेश होली के रंग की तरह बदरंग भी हो जाते हैं-कहीं गुलाबी मनभावन, कहीं काला रंग- देखकर मन खट्टा हो जाए। होली है कि जगह सरकार है कहने का मन होता है।
होली खेलो- कुछ होली से परहेज करते हैं। लेकिन सरकार से तो परहेज किया नहीं जा सकता- अन्नदाता होती हैं सरकारें और अन्नदाता से मुंह मोडऩा मतलब दलदल में पड़े सहायता की गुहार लगाना होता है। होली और सरकारों के गुण में एक और समानता है- दोनों ही ‘घोषणाप्रिय’ हैं। होली की घोषणा कि मस्त रहो। भले रंग से आप की आंख दुखने लगे। सरकार की घोषणा कि सुखी रहोगे भले पंचर स्कूटर को एकटक देखते समय गुजारना-सा हो। होली और सरकार में एक समानता और है होली रंगे हुये को और रंगती है। सरकारें खाये-अघाये को और अघाती हैं- जिनकी कोठी पहले से भरी है उनकी कोठी में और देती हैं। होली और सरकारों में एक यह भी समानता है कि होली के 15 दिनों तक ‘होली’ मनाओ कोई रोकटोक नहीं- होली से लेकर 15 दिनों तक होली मिलन। सरकार को भी 5 साल तक सरकार मानते रहो-भले सरकार एक दिन में ही बैठ जाये। सरकार है। सरकार है तो 5 साल सरकार है कहते रहो। होली और सरकार में एक समानता यह भी कि दोनों बुरा नहीं मानतीं ‘होली है’- चिल्लाते हुये रंग-कीचड़-गुलाल डालो। सरकार है बोलते हुये अवैध कब्जा करो- सब अपने मतलब सरकार के आदमी मान लिए जाते हंै। मुझे होली और सरकार दोनों समान रूप से प्रिय हैं- दोनों हास्य पैदा करते हैं। दोनों पर हास्यरस की कवितायें लेख लिख सकते हैं।
होली पर जैसे तरह-तरह के प्रयोग होते रहते हैं, किये जाते हंै उसी तरह सरकार भी अपने लिये कुछ प्रयोग करते चलती है। जैसे कभी गीली होली चली तो फिर नया प्रयोग आया सूखी होली मनाने का। निवेदन किया जाने लगा सूखी होली मनाइये, पानी बचाइये। सरकार कहती है सब्सिडी छोडि़ए...। होली पर पानी बचाना और सब्सिडी छोडऩा दोनों मनोरंजन के लिए हैं। लगता है होली भी सनक से मना ली जाती है। सरकारें भी कभी-कभी सनक से काम करने लगती है। सनक सवार होने पर सरकारें होली की तरह लाल और फिर रंग-बिरंगी होने लगती हैं- डोलने भी लगती है, लगता है होली चढ़ी है। लेकिन होली और सरकार में एक फर्क है- होली कभी भी लोगों को लाईन में नहीं लगाती। सरकारें जनता को लाईन में लगा देती रही है। पहले राशन के लिए लाईन और कुछ दिन पहले सरकार ने नोट बदलने की लाईन लगवा दी। खड़े रहो लाईन में और भूल जाओ कि इस बीच महंगाई बढ़ा दी गई है। केवल नोट बदलने पर चर्चा करो। नोट बदलना न हुआ केंचुली बदलना हो गया- दोनों में कष्ट। वैसे जो सरकार जनता को तंग न करें, हलाकान न करे, डराकर न रखे वह सरकार नहीं शक्तिहीन- लोग कहेंगे क्या सरकार है, कोई डरता ही नहीं। एक लुंजपुंज सरकार है। इसलिये सरकार बीच-बीच में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने व डराने का रोल करने लगती है। सरकार का सबसे दयालु रूप ‘चुनाव काल’ होता है- एकदम अवघढ़ दानी के रूप में सरकार प्रकट होती है। ये देगे वो देंगे आदि-आदि और सत्ता में आने के बाद विस्मृत रोग से पीडि़त हो जाती है। इसका कोई इलाज नहीं। होली के साथ यह अच्छा है कि उसे होली कभी रोगीली होती नहीं हर हाल में मस्त।
कभी-कभी सरकारें अचानक झूमने लगती हैं- न बाजा न संगीत न अवसर लेकिन जनता ने देखा कि सरकार अचानक झूमने लगी- ‘का हो गओ, कोई पूछता है।’ ‘पता नहीं सरकार है, कब सनक में आ जाये पता नहीं चलता।’ अभी सरकार को ‘आधार कार्ड’ चढ़ा हुआ है। हर काम में आधार कार्ड। आधार कार्ड ठीक है। लेकिन इतना भी ठीक नहीं कि बच्चे को सू-सू करनी है तो आधार कार्ड मांगा जाये। मिड डे भोजन चाहिए तो आधार कार्ड लाओ। सरकार ने आदेश निकाला कि बिना आधार कार्ड के बच्चों को मिड डे मील नहीं मिलेगा। और बच्चे पढ़ाई छोड़ आधार कार्ड बनवाने लाईन में लग गये। परीक्षा है लेकिन पालक अपने बच्चे को आधार कार्ड की लाईन में ले जा रहे हैं। कुछ बच्चे अपनी किताब लेकर आधार कार्ड की लाईन में खड़े दिखे। लाईन में पढ़ रहे हंै। यह साल लाईन लगाने के रूप में इतिहास में दर्ज होगा। आने वाली पीढ़ी पढ़ेगी कि उस साल पूरा देश किसी न किसी काम से लाईन में खड़ा था और इतनी लाईन कि धरती को पांच बार अपने घेरे में लपेट ले। अब बिना आधार कार्ड बैंक से पैसा नहीं निकलेगा और आधार कार्ड बिना आनलाईन टिकिट बुकिंग नहीं होगी। आधार कार्ड न हुआ गाड़ी का ‘स्टार्टर’ हो गया।
इस माहौल में हमारे मित्र फूलचंद जी होली मनाने निकले। हर साल निकलते हैं। उन्हें होली खेलना अच्छा लगता है। वे होली बीतते ही अगली होली का इंतजार करने लगते हैं और गब्बर सिंह की तरह हर एक से पूछने लगते हैं ‘होली कब है?’
एक पंडितजी तो हमारे मित्र फूलचंद से होली के एक सप्ताह के पहले तक मिलते ही नहीं। डरते हैं कि चैत्र नवरात्र में ही पूछ बैठे पंडित जी, होली कब है? माने चुनाव की घोषणा के बारे में पूछ रहे हो।ं
तो हमारे मित्र फूलचंद जी निकले होली खेलने। चौक तक पहुंचे और एक आदमी पर रंग डालने पिचकारी सामने की कि उस आदमी ने पूछा- अरे फूलचंद जी आधार कार्ड है। फूलचंद जी इस प्रश्न से हड़बड़ा गए। ‘आधार कार्ड’ क्यों चाहिये? नहीं है।’
‘होली खेलना है। रंग डालना है तो आधार कार्ड चाहिये। है तुम्हारे पास?’
‘ये क्या है। होली का मजाक है क्या? अरे यार तू तो शुरू से मजा किया रहा है।’ फूलचंद जी ने कहा।
‘मजाक नहीं फूलचंद जी। सरकारी आदेश है।’
‘क्या आदेश है?’ फूलचंद जी ने पूछा।
‘तुम यार अखबार नहीं पढ़ते? न्यू•ा नहीं सुनते? अरे आदेश है कि होली खेलने आधार कार्ड जरूरी है।’
‘कब निकला आदेश?’ फूलचंद जी ने पूछा
‘होलाष्टक पर निकला है आदेश।’ उसने कहा।
‘लेकिन होलाष्टक पर तो हमारे यहां शुभ काम होते नहीं।’ फूलचंद जी ने कहा।
‘पता नहीं। लेकिन सरकार ने आदेश प्रसारित कर दिया है।’ उसने कहा। तो आप फूलचंद जी आधार कार्ड दिखाइये और रंग डालिये।’
‘ये गलत है।’ फूलचंद जी बिफरे।
‘मैं तो रंग डालूंगा...।’
इतना सुनते ही उस व्यक्ति ने आवाज लगाई- ‘पुलिस...।’ और चौक पर खड़ा पुलिसमैन बोल पड़ा-‘क्या है? क्यों चिल्ला रहे हो?’
उस व्यक्ति ने कहा- ‘इसके पास आधार कार्ड नहीं है और यह रंग डाल रहा है।’
पुलिस- ‘कौन है, होली के दिन कानून तोड़ रहा। बेकार दिमाग खराब कर रहा’ और वह उनके पास आया, बोला- ‘क्या है?’
व्यक्ति ने कहा- ‘ये फूलचंद जी हैं। इनके पास आधार कार्ड नहीं है और होली पर रंग डालने निकले हैं। नियम-कायदे की खबर नहीं, सुध नहीं भांग खाकर पड़े रहते हो क्या? आधार कार्ड कहां है। रंग डालना हो तो आधार कार्ड होना। नहीं तो घर में सोते रहिये।’
फूलचंद जी बोले-‘होली खेलने का आधार कार्ड नहीं है मेरे पास।’
पुलिस- ‘तो बनवा लेना था।’
फूलचंद जी- ‘मुझे पता नहीं था।’
पुलिस- ‘तो पता होना था। पता करना था। तुम्हारे अड़ोस-पड़ोस में लोगों ने बनवाया होगा।’
फूलचंद- ‘मुझे किसी ने बताया नहीं।’
पुलिस- ‘आप के घर आकर बतायेंगे क्या? आप बड़े वीआईपी हैं। पता नहीं कि सरकार रोज-रोज नये-नये कानून बना रही है। आदेश-निर्देश निकाल रही। बता रही कि कितने रुपये घर में रख सकते हो आदि-आदि। तुमको तमाम ‘आदि-आदि’ का भी पता होना चाहिये।’
फूलचंद जी- ‘मुझे इस तरह के ‘आदि-आदि’ का पता नहीं था।’
पुलिस-‘तो आधार कार्ड नहीं है आपके पास?’
फूलचंद- ‘नहीं।’
पुलिस- ‘तो ठीक। आप रंग नहीं डाल सकते।’
फूलचंद- ‘मैं तो रंग डालूंगा।’
पुलिस- ‘कानून अपने हाथ में लोगे।’
फूलचंद जी- ‘नहीं पिचकारी में लूंगा...।’ और यह कह फूलचंद हंसने लगे...।
पुलिस-‘कानून तोडऩे की धमकी देता है और हंसता भी है चल थाने...।’ पुलिसमैन ने सीटी बजाई। चार पुलिस वाले आन खड़े हुये। पुलिसमैन ने कहा- इसके पास आधार कार्ड नहीं है। यह जबरदस्ती रंग डाल रहा है। पकड़ो ले चलो थाने।’
एक पुलिस वाले ने कहा- ‘कल ही बगीचे में एक बच्चा पकड़ा गया... वह तितली पकड़ रहा था। उसके पास आधार कार्ड नहीं था। उसे थाने ले गये उसकी जगह उसके पिता को लॉकअप में बंद कर दिया। आधार कार्ड जरूरी है- यह पहचान है।’ पुलिस वाले फूलचंदजी को थाना ले गये। लॉकअप में बंद कर दिया...।
फूलचंद ने पूछा- ‘कब छोड़ोगे मुझे होली खेलना अच्छा लगता है।’
थानेदार ने कहा-‘कानून तोड़ा है। घोर अपराध। अगली होली तक लॉकअप में सड़ो। यहां रहोगे तो एक रिस्पांसिबल नागरिक बन जाओगेे।’

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