मोबाइल तुझे सलाम

वेपिछले पांच सालों से रोज की तरह आज भी ऑफिस के सारे काम बंद कर कुर्सी पर पसरे हुए मोबाइल पर पूरे मनोयोग से जुटे थे। फेसबुक पर, व्हाट्सएप पर या फिर किसी और चीज पर, वे ही जाने।...

मोबाइल तुझे सलाम
देशबन्धु

व्यंग्य
अशोक गौतम

वेपिछले पांच सालों से रोज की तरह आज भी ऑफिस के सारे काम बंद कर कुर्सी पर पसरे हुए मोबाइल पर पूरे मनोयोग से जुटे थे। फेसबुक पर, व्हाट्सएप पर या फिर किसी और चीज पर, वे ही जाने। उनकी उंगलियां ऑफिस का काम करने को कहने पर पेन पकडऩे में असमर्थ रहती हैं। जब भी उनसे ऑफिस का कोई काम करने का निवेदन किया जाए तो वे न की मुद्रा में नीम कड़वा मुंह बना दूसरी ओर फेर लेते हैं। जैसे ऑफिस के कामों से उनका मोहभंग हो चुका हो पर मोबाइल ऑन करते ही टच स्क्रीन पर उनकी उंगलियां इस तरह फर्राटे मारती हैं कि लगता ही नहीं, ये उंगलियां उसी बंदे की हैं जिसकी उंगलियां ऑफिस का काम करने के नाम पर कांपने लगती हैं। मोबाइल स्क्रीन पर उनकी उंगलियां यों दौड़ती है कि उनकी उंगलियों के आगे रेस के मैदान में जीतने वाला घोड़ा भी क्या दौड़ता होगा? कई बार तो उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानों उनकी नसों में रक्त नहीं, मोबाइल की वेव्स दौड़ती हों। मोबाइल चलाते हुए क्या गजब की चुस्ती, क्या अजब की फूर्ती।
सच कहें तो उन्हें उतना प्यार अपने बीवी-बच्चों से भी नहीं जितना प्यार इस उम्र में वे अपने मोबाइल से करते हैं। पता नहीं इस उम्र में उनके मन में मोबाइल के प्रति इतना प्रेम कैसे जाग्रत हो गया!  चौबीसों घंटे उनके साथ कोई हो या न हों पर मोबाइल उनके साथ सदा रहता है। जब रात को मोबाइल पर बतियाते-अघियाते थक जाते हैं तो मोबाइल को अपने सिरहाने थपकी देकर सुलाने के बाद ही खुद सोते हैं। सोए-सोए भी बीच-बीच में जाग देख लेते हैं कि कहीं मोबाइल जागा तो नहीं। उनके इस मोबाइल प्रेम के बारे में सुना तो यहां तक है कि उन्होंने चोरी से अपनी वसीयत में यह भी लिखवा दिया है कि जो वे इस लोक से विदा हों तो उनके साथ कुछ रखा जाए या न रखा जाए पर उस समय का लेटेस्ट मोबाइल उनके सिरहाने जरूर रखा जाए ताकि वहां पर भी उन्हें अकेलापन महसूस न हो!
एकाएक उस समय पता नहीं क्या हुआ कि उनके हृष्ट-पुष्ट मोबाइल ने सांस लेना बंद कर दिया। वे तो खैर जब-जब मोबाइल की गोद में होते हैं, उनकी सांसें रुकी ही होती हैं या कि वे तब तक सांस नहीं लेते जब तक मोबाइल के संसर्ग में होते हैं। अगर किसी वक्त उनकी सांसें नहीं चल रहीं लगे तो मान लीजिए, वे मोबाइल के साथ अठखेलियों में व्यस्त हैं।
मैंने देखा कि तब उन्होंने कुछ परेशान हो एक बार, दो बार, मोबाइल को हिला-डुला कर देखा। पर उसकी सांसें नहीं चलीं। फिर कुछ और परेशान हो बैठे-बैठे मोबाइल की बैटरी निकाली। फिर डाली। स्विच ऑन किया। पर  उसमें कोई हरकत नहीं। इधर मोबाइल की सांस बाहर की बाहर तो उधर उनकी अंदर की सांस अंदर, बाहर की सांस बाहर। किसी से हद से अधिक प्रेम करने का अंजाम यही होता है। उनके माथे पर पसीने की एकाएक धार बह निकली। चेहरा ऐसा ज्यों नींबू हो निचुड़ा हुआ। देखते ही देखते वे कुर्सी पर बेहोश से होने लगे तो मैंने फाइल परे फेंक उन्हें संभालने की सफल और असफल के बीच की कोशिश करते कहा, ‘ये क्या कर रहे हो सरजी! संभालो अपने आपको। आप तो कुर्सी पर बैठे-बैठे ही... कुर्सी बेहोश होने के लिए नहीं, दूसरों को बेहोश करने के लिए बनाई है व्यवस्था ने।’ पर लगा, मेरी बात ज्यों वे सुन ही नहीं पा रहे थे।
मैंने उनके हाथ से मोबाइल लेने की कोशिश की, पर वे एक थे कि इस हालत में सब कुछ छोडऩे को तैयार थे, पर हाथ से मोबाइल नहीं।
मैंने जबरदस्ती उनके हाथ से मोबाइल ले उसे चेक किया तो वह ऑफ था। तब उनकी  बेहोशी का कारण का सुराग हाथ लगा। पहले तो मैं सोचा था कि उन्हें कुर्सी पर बैठे-बैठे दिल का दौरा पड़ गया होगा। आजकल का दिल हो ही गया ऐसा है। कमबख्त हर कहीं दौरा ले बैठता है।
असल में उन्हें नहीं, उनके मोबाइल को दिल का दौरा पड़ा था अचानक! आदमी के साथ रहते- रहते मोबाइल भी अब आदमी जैसे होने लगे हैं। अपने प्रिय मोबाइल के दिल के दौरे को देख उन्हें भी दिल का दौरा पड़ गया था पर कुछ हलका। इसे कहते हैं अजर-अमर प्रेम। मोबाइल से प्रेम करने वालों से आज समाज अटा पड़ा है पर अपने मोबाइल से इस कदर प्रेम करने वाला समाज में शायद ही कोई दूसरा मिले। आज तो लोग मोबाइल और रिश्तों को जरा सा भी अपने मन माफिक न चलने पर कचरे के डिब्बे में डाल आते हैं, मुस्कुराते हुए।  
आज का समाज दौरों का समाज है। हर बंदा किसी न किसी प्रकार के दौरे का शिकार है। उसको कोई न कोई दौरा पड़ता रहता है। कोई चाहे अपने को कितना ही दौरों मुक्त होने की घोषणा करते फिरे,  पर सच तो यह है कि वह हर कभी, हर कहीं अपने प्रिय दौरे का शिकार हो ही जाता है। आज कोई झूठ बोलने के दौरे से पीडि़त है तो कोई बेईमानी के असाध्य दौरे के रोग से। कोई  भ्रष्टाचार के दौरे से पीडि़त है तो कोई आत्म प्रशंसा के दौरे से। कोई आत्मप्रवंचना के दौरे से पीडि़त है तो कोई...। नेता तो दौरों की खान होते हैं। उन्हें वे ही जाने किस- किस किस्म के दौरे पड़ते हैं। उन्हें जो दौरे न पड़ें वे ही कम। उनके दौरों में सबसे खास अंदाज का दौरा है, दौरे पर दौरे करने का दौरा।  इसलिए वे सोए हुए भी जहां उनका मन करे, वहां का दौरा जनता की पीठ पर बैठे करते रहते हैं। बस एक-दो ही दौरे ऐसे हैं, जो किसी को नहीं पड़ते। और वे दौरे हैं- सच बोलने का दौरा, मन से प्रेम करने का दौरा।
मैंने पास ही उनके टेबुल पर रखे पानी के गिलास से उनके चेहरे पर पानी छिडक़ा तो उन्हें मरा सा होश आया। वे तो नहीं, पर ज्यों ही उनके हाथ चलने लायक हुए उन्होंने सबसे पहले इधर- इधर मोबाइल ढूंढना शुरू किया तो मैंने उनसे पूछा, ‘क्या ढूंढ रहे हो सरजी?’
‘मेरा मोबाइल...’  कह उनकी आंखों से आंसू बहने लगे तो मुझे मामला हद से अधिक संगीन लगा।
‘क्या हो गया आपके मोबाइल को? ठीक तो  है। पहले आप प्लीज...।’
‘हाय, मेरा मोबाइल...’  कह वे सिसकने लगे तो मैंने उन्हें सांत्वना देते कहा, ‘हद है सरजी! कमाल कर रहे हैं आप लोग भी। आप जैसे कर्मयोगी, बुद्धिजीवी भी अगर मोहमाया में बंधने लगे तो मेरे जैसों का क्या होगा?? धीरज रखिए! सब ठीक हो जाएगा।  ऐसे कैसे भगवान असमय आपके मोबाइल को उठा सकता है भला? उसे पता नहीं कि आप कौन से विभाग में हो? आप धीरज रखिए बस...।’ मैंने ढांढस देने के किताबों में जितने तरीके पढ़े थे, सब उन पर इस्तेमाल किए, पर मेरे एक भी किताबी तरीके का जब उन पर कोई असर न पड़ा तो मुझे अपने किताबी ज्ञान पर बड़ा गुस्सा आया। तब पता चला कि किताबी ज्ञान कुल मिलाकर किताबी ही होता है। वह भले ही कितनी ही डींगे क्यों न मारता फिरे।
‘मेरे होते हुए कुछ नहीं होगा आपके मोबाइल को। सरकार ने इत्ते बड़े अस्पताल किसलिए खोले हैं? आज की तारीख में वहां पर बंदे का इलाज हो या न पर वहां के डॉक्टर मोबाइल की बीमारियों के बारे में आदमियों की बीमारियों से अधिक जानते हैं।’
‘नहीं, लगता है भगवान ने इसे मेरे हाथों से उसे सदा-सदा के लिए छीन लिया...।’ कह वे फिर कुर्सी पर ही पुन: निढाल हुए तो मैंने एक बार और उनको सांत्वना देने की भरपूर कोशिश की।
‘तो कोई बात नहीं! अगर भगवान ने उसे आपसे छीन लिया तो हम भी भगवान को बता देंगे कि तुम हमारे पास से सब कुछ छीन सकते हो मोबाइल नहीं। आते-जाते देखते नहीं, बाजार में आटे की दुकानें कम हैं और मोबाइल की अधिक। बाजार में आलू उपलब्ध हों या न पर सिम हर जगह उपलब्ध हैं। ऐसे में दिल छोटा न करो सरजी प्लीज! आपको इस हाल में देख खुदा कसम, मुझे भी कुछ हो रहा है। अगर आप इस तरह दुखी रहे न तो मैं आपकी कसम खाकर कहता हूं कि आपको कुछ हो या न, पर मुझे कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा। देखो सरजी, उठो सरजी! हमारे सामने मोबाइलों का बाजार खुला पड़ा है। ऐसे में गए हुए मोबाइल के लिए इतना रोना ठीक नहीं। आप तो महाज्ञानी हैं। मैं तो आपके ज्ञान के आगे जुगनू की पूंछ भर हूं। अगर आप जैसे ज्ञानी पुरुष ही इस तरह से रोने लगे तो आम आदमी का क्या होगा? आप ही तो ऑफिस में काम करवाने आने वाले हर एक से कहा करते हैं कि यहां कौन साथ लेकर आया? क्या साथ लेकर जाएगा? सब मोहमाया है। मोह से मुक्त होना ही अपने काम करवाना है।’
‘सो तो बात है बंधु पर...।’
‘अब पर क्या?’ मुझे लगा जैसे उनकी बेहोशी खत्म हो रही हो और उनके भीतर दूसरे मोबाइल को खरीदने का ज्ञान फिर से हरा होने की फिराक में हो।
 ‘असल में इस मोबाइल में मेरे इतने नंबर सेव थे कि... किस -किस के नंबर सेव नहीं किए थे मैंने मत पूछो। विभाग के डायरेक्टर से लेकर सचिव तक के, बजंतरी से लेकर मंत्री तक के। भले ही बात करने को न हों। पर ऑफिस के दूसरे लोगों पर रौब जमाने के लिए तो थे ही। मैं रोटी के बिन जी सकता हूं,  मैं हवा के बिन जी सकता हूं, मैं पानी के बिना भी जी सकता हूं, पर मोबाइल के बिना नहीं...।’ उन्होंने अपनी असली पीड़ा जाहिर की। वैसे मुझे उनकी इस बीमारी का तबसे ही पता था जबसे मैं उनके साथ वाली कुर्सी पर ट्रांसफर होकर आया था।
‘सब जानता हूं सरजी, सब जानता हूं। आपकी पीड़ा को मैं आपसे भी अधिक गहराई से समझ रहा हूं पर...’ बच्चे तो बच्चे ,पर हाय रे ये...
‘कमबख्त जाने से पहले थोड़ा सा भी इशारा भर कर देता तो...। मैं उन नंबरों को कहीं और सेव कर लेता... वे सब नंबर केवल नंबर नहीं मेरी जान  थे बंधु... मेरे प्राण मेरी देह में नहीं, उन्हीं नंबरों में वास करते थे... हाय...।’
‘चलो, उठो सरजी! अभी बाजार से ऑफिस पर ताला लगा नया मोबाइल ले आते हैं।’ मैंने अपनी जेब पकड़ते हुए कहा तो वे वैसे ही कुर्सी पर निढाल पड़े-पड़े बोले, ‘पर इतनी देर तक मैं मोबाइल के बिना जिंदा कैसे रहूंगा? लग रहा है जैसे कोई मेरा गला घोंट रहा हो। सबके बीच  होते हुए भी ज्यों मैं अकेला हूं। मेरा गला सूखा जा रहा है... मोबाइल के बिना मेरी आंखों के आगे अंधकार सा छा रहा है...। हे मेरे मोबाइल! तुम मुझे अकेला छोड़ कर कहां चले गए प्यारे? अब मैं किसके सहारे जीऊंगा... तुम कहां हो हे मेरे प्राणनाथ....।’ कह वे फिर कुर्सी पर वैसे ही निढाल! अब उनके घर उनकी बीवी को सूचित करता तो कैसे?
संपर्क:- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

संबंधित समाचार