Deshbandhu : VICHAR, जरूरी है सांप्रदायिकता के खिलाफ एक कड़ा कानून
 Last Updated: 09:24:08 PM 01, Aug, 2014, Friday
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जरूरी है सांप्रदायिकता के खिलाफ एक कड़ा कानून
(02:25:07 AM) 12, Dec, 2013, Thursday

सुर्ख़ियो में
व्यापार घाटे की बढ़ती चिंता
सिर्फ आंकड़े बनाने या बनने के लिए ही हैं गरीब
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के सर्वेक्षण के निहितार्थ
बिहार में आज भी जिंदा है जमींदारी प्रथा
सतयुग से कलयुग तक भार ढोते भारिया
धरती के स्वर्ग में नर्क भोगती जनता
क्या हम गरीब, हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं?
बिहार : अधर में लटकता बच्चों का भविष्य
मध्यप्रदेश : शिक्षकों की मनमानी, बच्चों की परेशानी

 हरेराम मिश्र
आज सांप्रदायिकता का खात्मा न होने की सबसे बड़ी वजह वर्तमान राजनीति ही है। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति की आड़ में नफरत का कारोबार करने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए देश को सांप्रदायिकता की आंच से बचाया जाए। यह सच है कि देश में भारत विभाजन, विवादित ढांचे का विधवंस, गुजरात दंगा जैसे तीन ऐसे मोड़ आए जब देश की साझी विरासत को नष्ट करने की कोशिश की गई लेकिन देश की जनता ने हमेशा ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दिया। आज वक्त है ऐसी ताकतों को हतोत्साहित करने का। चूंकि राजनीति आज सांप्रदायिकता के पोशण में जुटी है लिहाजा आम जनता को ही इन ताकतों के खिलाफ गोलबंद होना होगा। यह जरूरी है समाज के लिए, उसके बेहतर कल के लिए और पूरे देश के लिए। सांप्रदायिकता के संपूर्ण खात्मे में ही बेहतर हिन्दुस्तान के बीज छिपे हैं।
देश में बेतहाशा बढ़ती जा रही सांप्रदायिकता तथा लोकतंत्र पर उसके गंभीर खतरे से निपटने और, सांप्रदायिक तथा लक्षित हिंसा अधिनियम-2011 को केन्द्र की यूपीए सरकार से पारित कराने के लिए, एक जरूरी जनमत बनाने के उद्देष्य से इंसाफ सबके लिए नामक एक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन पिछले दिनों इलाहाबाद में हुआ। सांप्रदायिकता से निपटने और देश के सेक्यूलर सामाजिक तथा राजनैतिक ताने-बाने को बचाने के लिए आयोजित इस कार्यम में कई रायों के अनेक संगठनों, प्रगतिशील लेखकों और सेक्यूलर पत्रकारों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। सम्मेलन में मौजूद चिंतकों ने सांप्रदायिकता के मौजूदा स्वरूप पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए दो टूक कहा कि देश में बढ़ रहे बहुसंख्यकवाद पर प्रभावी लगाम बहुत जरूरी है। वे सब इस बात से काफी चिंतित थे कि देश भर में अलग-अलग आधार पर बढ़ रही भेदभाव की प्रवृत्ति पर कोई प्रभावी अंकुश नही लग पा रहा है। सम्मेलन में शामिल लोगों का मानना था कि  बहुसंख्यकवाद तथा सांप्रदायिक हिंसा पर प्रभावी अंकुश के लिए सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा (न्याय और पुनर्वास तक पहुंच) विधेयक 2011 को संसद द्वारा तत्काल पारित किया जाना चाहिए। सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रसिध्द सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि आज देश में  बहुसंख्यकवाद हावी है, और जिस तरह से देश के अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी लगातार हिंसा का शिकार हो रहे हैं वह इस सेक्यूलर लोकतांत्रिक ढांचे के लिए बेहद खतरनाक संकेत हैं।
सांप्रदायिकता से कैसे लड़ा जाय के सवाल पर मौजूद लोगों ने कहा कि आज राय सरकारें भी अपने राजनैतिक हित के लिए सांप्रदायिक ताकतों के साथ जिस तरह से खड़ी हैं वह एक नये तथा खतरनाक सांप्रदायिक परिदृश्य का निर्माण कर रहा है। इस परिदृष्य में अल्पसंख्यकों के विकास और सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। राजनैतिक सरक्षण में फल-फूल रही इस सांप्रदायिकता को बारीकी से समझना होगा। आज सांप्रदायिकता जातिवादी अस्मिता के साथ नये कलेवर में कदमताल कर रही है। जाति के साथ सांप्रदायिकता के इस नये गठजोड़ को भी तोड़ना होगा। गुजरात जनसंहार का उदाहरण देते हुए कार्यम में शामिल लोगों नें सरकार प्रायोजित सांप्रदायिक जनसंहार के केवल 117 आरोपियों को ही सजा मिलने पर असंतोष जताया तथा मुख्य आरोपी के देश का प्रधानमंत्री बनने की होड़ में शामिल होने को देश के लिए खतरनाक बताया।
गौरतलब है कि सांप्रदायिकता के विषय पर यह सम्मेलन उस वक्त आयोजित किया गया है जब पिछले दिनों उत्तर प्रदेश का मुजफरनगर तथा शामली सांप्रदायिक हिंसा के जबरजस्त शिकार बने। आगामी कुछ महीनों में लोक सभा के आम चुनाव भी होने वाले है और अगर इसी बहाने सांप्रदायिक हिंसा का सवाल राजनैतिक दलों के चुनावी एजेंडे में आ जाय तो कम से कम सांप्रदायिकता के खतरे पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस हो सकती है। इसके बहाने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सवाल मुख्य राजनैतिक धारा का एक बड़ा सवाल बन सकता है जो आगामी लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के मतदान की दिषा का भी महत्वपूर्ण निर्धारक होगा।
बहरहाल, इस सम्मेलन के बहाने राजनीति से अभी कई जरूरी सवाल बाकी हैं। सवाल यह है कि मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक ताकतें इतनी तेजी से सयि क्यों हैं? उन्हे इस सयिता के लिए खाद-पानी कहां से मिल रही है? क्या चुनाव जीतने के लिए उनके पास धार्मिक उन्माद और जातिगत ध्रुवीकरण का ही एक मात्र रास्ता बचा है? देश में सांप्रदायिक ताकतों के मजबूत होने से किसका राजनैतिक तथा आर्थिक वर्गहित पूरा होगा? सवाल यह भी है कि राजैतिक सांप्रदायिकता जो अल्पसंख्यकों को खतरनाक मानसिकता का शिकार बनाती है, पर एक प्रभावी अंकुश अब तक क्यों नही लग पा रहा है? यहां यह भी एक गौर करने लायक मसला है कि सांप्रदायिक ताकते जिस तरह से पूरे देश में सयि हैं उसे देखते हुए इससे निपटने की एक देशव्यापी रणनीति देश की सेक्यूलर ताकतें क्यों नही बनातीं। देश के सेक्यूलर सामाजिक राजनैतिक वजूद को ही मिटाने में जुटी संघ जैसी फासीवादी ताकतों के वजूद को समेटा कैसे जाय। फिर क्या एक कानून भर से ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी।
दरअसल सांप्रदायिकता एक फासीवादी राजनैतिक विचार है जो बहुसंख्यक वर्ग को जाति, धर्म और इतिहास के आधार पर अपनी जाति तथा खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए अल्पसंख्यक वर्ग को दोयम दर्जे का सामान्य प्राणी भर मानती है। सांप्रदायिक राजनीति का चरित्र राय में धार्मिक, जातीय तथा राजनैतिक स्तर पर अल्पसंख्यकों के नागरिक होने के वजूद को ही नकार देता है। इसलिए वह उनके जिन्दा रहने तथा उनके सामान्य नागरिक अधिकारों का भी गंभीर हनन करता है। इस देश में हिन्दुत्व एक राजनैतिक विचार है जिसका मकसद देश के अल्पसंख्यकों को आतंकित कर, नफरत की राजनीति के बूते सत्ता हथियाना और अमेरिका प्रायोजित आर्थिक साम्रायवाद का हित पोशण तथा उसका प्रचार-प्रसार करना है। अमेरिकी फंड से संचालित ये ताकतें समाज में जहर बोने के लिए लगातार काम कर रही हैं। सांप्रदायिकता एक दिन में पैदा नही हुई और केवल एक कानून भर से अचानक खत्म भी नही होगी। वास्तव में सांप्रदायिकता के घोड़े पर चढ़ कर राजनीति करने का सीधा मतलब यही है कि संघ जैसी ताकतों के पास आम आदमी की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं पर बहस करने, उसे हल करने की हिम्मत ही नही है। वे पूंजीवाद और साम्रायवाद के विस्तार के अमेरिकी प्यादे हैं जिनकी वफादारी अमेरिका और उसकी खूनी आर्थिक नीतियों के पक्ष में हैं। इन्हें आम आदमी की असल समस्याओं से कुछ भी लेना देना नही है। क्योंकि उन्हे हल करने की कूवत ही उनमें नही है। उनका राष्ट्रवाद अमेरिकी नीतियों का वफादार है जो मुसलमानों को बदनाम कर उनके तेल संसाधानों पर कब्जा करने की नीयत रखता है। सांप्रदायिकता संघ जैसी ताकतों का अमरीकी एजेंडा पूरा करने का एक छोटा सा हथियार भर है।
वैसे यह बात भी हमें साफ समझनी चाहिए कि आम हिन्दू कभी भी सांप्रदायिक नही हो सकता तथा आम मुसलमान कभी भी दंगाई नहीं हो सकता है। इनके बीच अविश्वास के लिए फासीवादी ताकतें ही जिम्मेदार हैं जो दोनों ही मजहबों में हैं। जहां तक सांप्रदायिक दंगों का सवाल है, राजैनैतिक प्रतिबध्दता हो तो उसे सिर्फ दो घंटे के भीतर प्रभावी तरीके से रोका जा सकता है। लेकिन आज कल की अधिकतर सांप्रदायिक घटनाओं की तह में जांय तो नौकरशाही राजनीतिक दलों के हितों की स्वार्थपूर्ति में ही जुटी दिखती है। आज देश के तमाम राजनीतिक दल अपने व्यक्तिगत राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए सांप्रदायिकता का जहर बोने और समाज को बांटने में जुटे हैं। आज कल सरकारें ही सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर समाज को बांटती है। मुजफरनगर की सांप्रदायिक हिंसा में सपा सरकार की संलिप्तता ने इसे एक बार फिर से उजागर कर दिया है। नौकरशाही में भी इन दिनों सांप्रदायिकता तेजी से घर कर रही है। यह खतरनाक संकेत है।
कुल मिलाकर, आज के बदले परिवेश में सांप्रदायिकता जिस तरह से क्षेत्रीय तथा जातिवादी अस्मिता का चोला ओढ़कर नये कलेवर में आ रही है उसके लिए नये कानून जरूर चाहिए। सोशल नेटवर्किग साइटों पर भी नफरत के बीज तेजी से बोये जा रहे हैं जिसके लिए वर्तमान कानून एकदम ही अपर्याप्त है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या केवल कानून बनाने भर से सांप्रदायिक हिंसा एकदम रुक जायेगी? जब तक सांप्रदायिकता के पोषक विचार जिंदा हैं, नफरत फैलाने वाले तत्व राजनैतिक संरक्षण में जिंदा है तब तक इस पर इस पर एक प्रभावी अंकुश कैसे लगेगा? जरूरत ऐसे विचारों को हतोत्साहित करने की भी है। इसी म में एक बात बेहद गौर करने लायक है कि बढ़ती सांप्रदायिकता से अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा तेजी से घर कर रही है। इस असुरक्षा बोध ने अल्पसंख्यकों के बीच एक रिएक्शन भी पैदा किया है जिसमें मुस्लिम समाज भी राह भटक रहा है। सांप्रदायिकता पर प्रभावी अंकुश के साथ आज बेहद जरूरी है कि राह से भटक रहे मुस्लिम नौजवानों को सही दिशा दी जाय। सांप्रदायिकता पर एक नया प्रभावी कानून वक्त की फौरी मांग है।
बहरहाल, हम जिस देश में रहते है, वहां हिन्दू और मुसलमानों के बीच एक लम्बी साझी विरासत रही है। कबीर, नजीर, प्रेमचंद की परंपरा उसी विरासत की संवाहक रही हैं। सूफियों के साथ हमने जीने का सलीका सीखा है। आज सांप्रदायिकता का खात्मा न होने की सबसे बड़ी वजह वर्तमान राजनीति ही है। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति की आड़ में नफरत का कारोबार करने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए देश को सांप्रदायिकता की आंच से बचाया जाए। यह सच है कि देश में भारत विभाजन, विवादित ढांचे का विध्वंस, गुजरात दंगा जैसे तीन ऐसे मोड़ आए जब देश की साझी विरासत को नष्ट करने की कोशिश की गई लेकिन देश की जनता ने हमेशा ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दिया। आज वक्त है ऐसी ताकतों को हतोत्साहित करने का। चूंकि राजनीति आज सांप्रदायिकता के पोषण में जुटी है लिहाजा आम जनता को ही इन ताकतों के खिलाफ गोलबंद होना होगा। यह जरूरी है समाज के लिए, उसके बेहतर कल के लिए और पूरे देश के लिए। सांप्रदायिकता के संपूर्ण खात्मे में ही बेहतर हिन्दुस्तान के बीज छिपे हैं।   

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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