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नवरात्रि: स्त्रोत की ओर एक यात्रा
(09:57:00 PM) 13, Sep, 2009, Sunday

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नवरात्रि का त्योहार शरद की शुरुआत में और चैत्र वसंत की शुरुआत में प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया जाता हैं। यह काल आत्म निरीक्षण और अपने स्त्रोत की ओर वापस जाने का समय है। परिवर्तन के इस काल के दौरान प्रकृति भी पुराने को झाड़ कर नवीन हो जाती है और बसंत के मौसम में जीवन वापस नए सिरे से खिल उठता है।  वैदिक विज्ञान के अनुसार, प्रकृति अपने मूल रूप में वापस आकार फिर  बार-बार मानव मन की  रचना करती हैं।
यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही बल्कि वह चक्रीय है, प्रकृति के द्वारा सभी कुछ का पुनर्नवीनीकरण हो रहा है। कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है। तथापि, सृष्टि के इस नियमित चक्र से मनुष्य का मन पीछे छूटा हुआ है। नवरात्रि का त्योहार अपने मन को वापस अपने स्त्रोत की ओर ले जाने के लिए है। उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्त्रोत की ओर यात्रा करता है। रात को भी रात्रि कहते हैं क्योंकि वह भी नवीनता और ताजगी लाती है। वह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है। स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को, और कारण शरीर को। उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है। मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुध्दता आती है और बातूनी मन शांत होता है। साथ ही ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर हमें आत्म साक्षात्कार मिलता है।
 यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मों को समाप्त करती है। नवरात्रि  आत्मा अथवा प्राण का उत्सव है, जिसके द्वारा ही महिषासुर अर्थात् जड़ता, शुभ्भ- निशुभ्भ के गर्व और मधु कैटभ अत्यधिक राग-द्वेष को नष्ट किया जा सकता है। वे एक दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक-दूसरे के पूरक हैं। जड़ता गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियां रक्तबीजासुर, बेमतलब का वितर्क चंड-मुंड और धुंधली दृष्टि धूमलोचन को केवल प्राण और जीवन शक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है। नवरात्रि के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्म्रांड में आनन्दिन रहने का भी एक अवसर है यद्यपि हमारा जीवन इन तीन गुणों के द्वारा ही संचालित हैं, हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में विचार करते हैं। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के बीज बहती हुए सतोगुण के आखिरी तीन दिनाें में खिल उठती है। जब भी जीवन में सत्व बढता हैं, तब हमें विजय मिलती है। इस ज्ञान का सार तत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयादशमी द्वारा मनाया जाता है।
 यह तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रहा्रांड की स्त्री शक्ति माने गये हैं। नवरात्रि के दौरान देवी मां की पूजा करके, हम त्रिगुणों में सामंजस्य करते हैं और वातावरण में सत्त्व के स्तर को बढ़ाते हैं।
 हालांकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनायी जाती है, परंतु वास्तविकता में यह लड़ाई अच्छे और बुरे के बीच मेंं नहीं है। वेदांत दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। जैसा अष्टावक्र ने कहा था, बेचारी लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता। इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है, लेकिन उनके बीच भासता अलगाव की भावना ही द्वंद का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवन्त है, जैसे बच्चों को सबमें जीवन भासता है, ठीक उसी प्रकार उसे भी सब में जीवन दिखता है। देवी मां या शुध्द चेतना ही सब नामों और रूप में व्याप्त हैं। हर नाम और हर रूप में एक देवत्य को जानना ही नवरात्रि का उत्सव है। अत: आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, इसके अलावा उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत यथार्थ को मानकर मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है।
देवी मां को सिर्फ बुध्दि के रूप में ही नहीं, वह न सिर्फ लक्ष्मी समृध्दि हैं, वह भूख क्षुधा भी और प्यास तृष्णा भी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में देवी मां के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है। यह पश्चिम की सदियों पुरानी चली आ रही धार्मिक निष्ठा का भी एक उत्तर है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्वि प्राप्त की जा सकती है अथवा इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त की
जा सकती है।
देवी मां को सिर्फ बुध्दि के रूप में ही नहीं, वह न सिर्फ लक्ष्मी समृध्दि हैं, वह भूख क्षुधा भी और प्यास तृष्णा भी है। सम्पूर्ण सृष्टि में देवी मां के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है।

 
 
 
 
 
 
 
 
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