| Last Updated: 11:50:07 AM 11, Mar, 2010, Thursday |
|
 |
|
|
|
|
|
|
आपका देशबन्धु |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
 |
|
अन्य |
|
|
|
|
|
सहयोगी संस्थाएं |
|
|
|
|
सेवाएँ |
|
|
|
|
|
|
| लेख |
प्रिंट संस्करण
ईमेल करें
प्रतिक्रियाएं पढ़े
सर्वाधिक पढ़ी
सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं मिली |
| गोर्शकोव पर उंगलियां उठाना |
| (09:39:38 PM) 24, Aug, 2009, Monday |
| अन्य |
जब से रूस के साथ गोर्शकोव सौदे पर कैग ने आपत्ति जताई है, तब से राजनीतिक हल्कों में बेचैनी का माहौल है। इस सौदे को लेकर सरकार पर उंगलियां उठाई जा रही हैं, वैसे देखा जाए तो उंगलियां उठना लाजिमी भी है क्योंकि गोर्शकोव के लिए जितनी कीमत चुकानी पड़ रही है उससे कम लागत में एक नया पोत खड़ा हो जाता। 44,500 टन का गोर्शकोव जब भारत को मिलेगा, तब इसकी कीमत 11 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक पड़ेगी, इसके उलट नौसेना का 37,500 टन का जो स्वदेशी विमानवाहक पोत अगले पांच सालों में बनकर तैयार होगा, उसके निर्माण के लिए सरकार ने अभी सिर्फ 3265 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं, जिसे बाद में जरूरत के हिसाब से बढ़या भी जा सकता है। एक बारगी सोच भी लिया जाए कि यह राशि तीन गुना बढ़ाकर 9795 कर दी जाती है तो भी ये रूसी विमानवाहक पोत के मुकाबले काफी कम होगी। इस लिहाज से देखा जाए तो लगभग तीन दशक पुराने पोत के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना नासमझी ही है, गोर्शकोव को 1982 में रूसी नौसेना ने लांच किया था, लेकिन कुछ तकनीकी खराबियों के चलते यह 1987 में काम शुरू कर पाया। सोवियत संघ के विघटन के बाद इसका नाम बदलकर एडमिरल गोर्शकोव रखा गया, पहले इसे बाकू के नाम से जाना जाता था। 1994 में एक दुर्घटना के बाद इसे बेडे से हटाकर मरम्मत कार्य के लिए भेज दिया गया जिसमें करीब एक साल लगा, 1996 में गोर्शकोव को रूसी नौसेना ने पूरी तरह से कार्यमुक्त कर दिया। इसके बाद 20 जनवरी 2004 मे रूस ने भारत के साथ इस पोत के सौदे पर सहमति जताई। हालांकि रूस ने भारत को यह पोत मुफ्त में दिया, लेकिन इसके आधुनिकीकरण के लिए भारत को 75 करोड़ डॉलर का भुगतान करने का सौदा किया गया। जो धीरे-धीरे बढ़कर अब 2.2 अरब डॉलर (करीब 11 हजार करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है। देखने वाले इस सौदे को दलाली या सस्ते के चक्कर में उलझने के दृष्टिकोण से देख सकते हैं। मगर इसके पीछे का सच कुछ और है, दरअसल जब ये सौदा हुआ तब रूस ने इस पोत के साथ भारत को मिग-29 के लड़ाकू विमान और दो परमाणु पनडुब्बियां देने का भी सौदा किया। जो हमारी उसकी सामरिक ताकत को मजबूत करने के लिहाज से बहुत मायने रखता था, इसलिए शायद भारत इस पर सहमत भी हो गया, अब भी स्थिति काफी हद तक वैसी ही है। यदि भारत आज गोर्शकोव सौदे से पीछे हट जाता है तो रूस के साथ चल रहे अति महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग कार्यक्रमों पर बुरा असर पड़ेगा। गोर्शकोव डील के तहत इस साल के अंत तक एक रूसी परमाणु पनडुब्बी हमें मिल जाएगी, जिसकी जरूरत हमें काफी वक्त से है। हालांकि आईएनएस अरिहंत के नौसेना में शामिल हो जाने से इस जरूरत में थोड़ी कमी आई है मगर मौजूदा दौर में महज एक पनडुब्बी से कुछ नहीं होने वाला। हमारा पड़ोसी चीन इस मामले में हमसे कहीं गुना आगे है और उसकी रक्षा तैयारियों से कदम ताल मिलाने के लिए भारत को कुछ और परमाणु पनडुब्बियों की आवश्यकता है। अरिहंत भले ही स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी हो, लेकिन इसके निर्माण में रूस ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये कम ही लोगों को पता होगा कि रूस के कई विशेषज्ञों ने परमाणु अरिहंत बनाने में मदद दी, इतना ही नहीं रूस ने ही इस पनडुब्बी में लगने वाले ऐसे स्टील की सप्लाई भी की, जो भारत में नहीं बनाया जा सकता था। बात यही खत्म नहीं होती, भारत में जो विमानवाहक पोत बनाया जा रहा है, उसमें लगने वाले स्टील की सप्लाई भी रूस से की गई है। जिस अमेरिका की तरफ भारत का झुकाव बीते कुछ वक्त में ज्यादा हुआ है वो भी इस तरह का सहयोगात्मक रवैया कभी नहीं अपना सकता था। अमेरिका आदि यूरोपीय देश कभी भी भारत को पैसे लेकर परमाणु पनडुब्बी की सप्लाई करने का फैसला नहीं कर सकते, ऐसे में अगर रूस ने लागत को ध्यान में रखते हुए गोर्शकोव सौदे की कीमत बढ़ा दी तो भी यह भारत के फायदे का ही सौदा साबित होगा। कैग यानी नियंत्रक महालेख परीक्षक की अपनी दलीलें सही हैं, उसका इस सौदे को देखने का नजरिया आर्थिक है। इसलिए उसे खामियां नजर आएंगी ही मगर सामरिक तौर पर यह डील भारत के लिए बहुत मायने रखती है। वैसे भी रूस अगर थोड़ा बहुत बदल भी गया है तो यह महज एक तरफा बदलाव नहीं। भारत ने ही इसकी शुरुआत की है, ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर भारत ने रूस का साथ देने के बजाय अमेरिका को तरजीह दी। जबकि रूस भारत का साथ काफी लंबे समय से देता चला आ रहा है। रूस भारत की अमेरिका से बढ़ी नजदीकी, सामरिक रिश्तों में उसकी शुरूआत और उसकी प्रक्षेपास्त्र प्रणाली का विरोध करने के मुद्दे पर भारत का अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण खफा है। भारत का अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान के साथ सामरिक संवाद भी दोनों देशों में कड़वाहट का कारण रहा। रूस हमेशा से ही भारत, रूस, चीन और ब्राजील के संबंधों को घनिष्ट बनाने की बात करता आया है मगर भारत का झुकाव इन देशों की तरफ ज्यादा रहा। मौजूदा वक्त में भी अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भारत विरोधी नीतियों पर अमल कर रहे हैं, नई दिल्ली उसके आगे पीछे घूमने में लगी है। बावजूद इसके अगर रूस मुनाफा कमाने के लिए कुछ चालें चल भी रहा है तो भी उसमें भारत के अहित की सोच बिलकुल नहीं है। लिहाजा गोर्शकोव सौदे पर कोई भी राय कायम करने से पहले उसके पीछे की सच्चाई को समझना जरूरी है।
|
|
|
|
|
| |
|
| |
|
| |
| |
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
| |
|