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किसके पास होगी 'किंगमेकर' की कुंजी?

14, May, 2009, Thursday 04:02:11 PM

हरिहर रघुवंशी
पद्रहवीं लोकसभा के लिए संपन्न हुए चुनाव में चाहे कुछ स्पष्ट हुआ हो या नहीं, लेकिन यह तस्वीर जरूर साफ हो गई है कि किसी एक राजनैतिक दल की सरकार नहींबनेगी। साथ में यह भी साफ हो गया है कि नई सरकार के गठन में जिसके पास जितने सांसदों का समर्थन होगा उसको उतना बड़ा ओहदा मिलेगा। लेकिन, नई सरकार के गठन में देश की चार सबसे ताकतवर महिलाओं की भूमिका अहम होगी। सोनिया गांधी के पास नई सरकार बनाने के लिए देश की सबसे पुरानी पार्टी है, लेकिन मायावती, जयललिता और ममता बनर्जी के पास उसकी चाबी है। अब देखना यह है कि सरकार को कंट्रोल करने वाली कुंजी किसके पास कितने दिनों तक रहती है।
चारों महिलाओं की अपनी -अपनी राजनीतिक मजबूरियां और महत्वाकांक्षाएं हैं, जिसके कारण वे एक मंच पर नहींआ पा रही हैं। ममता ने तो कांगे्रस से हाथ मिला लिया है और पार्टी अब जयललिता से रिश्ता जोडऩे के लिए हर तरह के उपाय कर रही है, शायद बात बन भी जाए। लेकिन, मायावती खुद प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं और वे उसी दल का समर्थन करने को तैयार हैं जो उनको रेसकोर्स का सफर तय करवा सके। मायावती भले ही सरकार नहींबना सकती हैं, लेकिन खेल बिगाडऩे का माद्दा जरूर रखती हैं।  जयललिता का राजनीतिक सफर एमजीआर के कारण शुरू हुआ और उनके रहते भी जयललिता पार्टी में जो फैसले चाहती थींवह करवा लेती थीं। 1987 में एमजीआर के बाद उनकी दूसरी पत्नी वीएन जानकी को पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन एक साल बाद ही करुणानिधि ने द्रमुक का गठन कर पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया। इसके बाद अन्नाद्रमुक की कमान जयललिता ने संभाली और आज तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इस समय तीसरे मोर्चे में मायावती के साथ हैं, लेकिन वे भी प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना मन में रखे हैं।
मायावती के साथ उनका इसी बात को लेकर मतभेद भी है। लेकिन उन्होंने मायावती की तरह से अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। फिर भी जयललिता जिसके भी पाले में जाएंगी, उनको सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी मिलेगी। मायावती देश की गिनी-चुनी ताकतवर महिलाओं में से एक हैं। कांशीराम ने खुद कभी सत्ता की बागडोर नहींसंभाली, लेकिन उनके लंबे संघर्ष का पूरा लाभ मायावती को मिला। आज मायावती केंद्र की सरकार बनाने में अहम किरदार निभाने वाली नेता हैं, लेकिन जब उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा दूर हो जाएगी तो वह ऐसे गठबंधन की सरकार बनवा सकती हैं, जो उनके करीबी लोगों को वजनदार पद दे सके। यदि मायावती के पास सरकार बनाने-बिगाडऩे की शक्ति होगी तो सरकार के मुखिया का रिमोट भी मायावती के हाथ में होगा।
लंबे समय तक कांगे्रस से जुड़ी रहीं ममता बनर्जी का अलग उद्भव भी सीताराम केसरी के समय कांगे्रसी नेताओं की उपेक्षा के कारण हुआ है। तेज-तर्रार ममता वैसे तो कांगे्रस के साथ हैं, लेकिन 2004 का लोकसभा चुनाव वे भाजपा से तालमेल करके लड़ चुकी हैं और राजग ने ही उनको रेलमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद दिया था। उनकी नजदीकियां भाजपा और सपा दोनों के साथ हैं। कांगे्रस का वामदलों से प्रेम उजागर हो जाने के बाद से ममता इनदिनों कांगे्रस से नाराज चल रही हैं। उनकी इस नाराजगी का विरोधी दल कितना फायदा उठा पाते हैं, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। मौजूदा गठबंधन की राजनीति में सोनिया गांधी तो परदे के पीछे रह कर सभी बड़े फैसले करने वाली महिला हैं, लेकिन नई सरकार बनाने में इनके अतरिक्त तीनों महिला नेताओं के समर्थन की दरकार सरकार का गठन करने की इच्छा रखने वाले हर दल को है। मायावती और जयललिता में एक जैसी कई समानताएं हैं जिसमें दोनों का राजनीतिक उद्भव देश के दो बड़े कद्दावर नेताओं की विरासत से हुआ है, इसीलिए दोनों की महत्वाकांक्षा एक जैसी हैं, फिर भी राजनीतिक मजबूरियों के कारण दोनों एक ही मोर्चे में शामिल हैं। इसमें से 'किंगमेकर' कौन बनेगा यह तो आने वाले तीन-चार दिनों के राजनैतिक हालात पर निर्भर करेगा।
लेकिन नई सरकार चाहे कोई भी गठबंधन बनाए, इन तीनों महिलाओं को नजरअंदाज कर पाना आज किसी भी राजनैतिक दल के लिए मुमकिन नहींहै। तीनों महिलाएं केंद्र में बनने वाली सरकार का समर्थन अपने-अपने राज्यों के हितों को देखते हुए करेंगी। माया का मुलायम से बैर है, ममता की वामदलों से राजनैतिक दुश्मनी है तो जयललिता को करुणानिधि से पुराना हिसाब-किताब चुकाना है। जिस गठबंधन का समर्थन करने में इन महिलाओं को दूसरे फायदों के साथ अपने राज्य में भी फायदा होगा, फिलहाल उसी के साथ जाने की संभावना अधिक बनेगी।

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