पिछले नौ सौ वर्ष से आयोजित होने वाली जगन्नाथपुरी रथ यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। रथयात्रा का शुभारंभ सोमवार को होना है। आषाढ़ शुक्ल द्वितिया को संपूर्ण भारतवर्ष में रथयात्रा-उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। सबसे अधिक प्रतिष्ठित समारोह जगन्नाथ पुरी में मनाया जाता है। इस उत्सव का देश ही नहीं विदेशों में भी धूमधाम से आयोजन होता है। बंगाल की खाड़ी के निकट बसा यह पवित्र स्थान उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। प्राचीन काल में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र एवं श्रीक्षेत्र भी कहा जाता था। पुरी में यात्रा प्रारंभ होने के एक दिन पूर्व रविवार को नवयौवन दर्शन के मौके पर लाखों भक्त भगवान के दर्शन करते थे। नव यौवन दर्शन को नेत्रोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा के पंद्रह दिन के एकांतवास समाप्त होने की याद में इसे मनाया जाता है। मान्यता है कि पन्द्रह दिन की बीमारी के बाद भगवान जगन्नाथ स्वस्थ होकर श्रध्दालुओं को दर्शन देते हैं, जिसे नेत्रोत्सव के रूप में जाना जाता है। उसके अगले दिन भगवान अपनी मौसी के घर नौ दिन के प्रवास के लिए रवाना होते हैं। रथयात्रा
आषाढ़ शुक्ल द्वितिया से दशमी तिथि तक नौ दिनों की यह रथयात्रा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसे श्री गण्डिचयात्रा और घोषयात्रा भी कहते हैं। इस रथयात्रा का विस्तृत वर्णन स्कंदपुराण में मिलता है। जहां श्री कृष्ण ने कहा है कि पुष्प नक्षत्र से युक्त आषाढ़ मास की द्वितिया तिथि को मुझे, सुभद्रा तथा बलभद्र को रथ में बिठाकर यात्रा कराने वाले मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस रथयात्रा महोत्सव में श्री कृष्ण केसाथ श्री राधिका जी न होकर सुभद्रा और बलराम होते हैं। पुरी में रथयात्रा हेतु तीनों देवताओं के लिए प्रतिवर्ष तीन अलग-अलग नए रथों का निर्माण होता है। रथ के लिए लकड़ियां इकट्ठा करने का कार्य बसंतपंचमी से शुरू होता है तथा रथ निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से आरंभ होता है। रथ का निर्माण मंदिर द्वारा चयनित विशेष परंपरागत बढ़ई ही करते हैं। रथ निर्माण में पूर्ण रूप से लकड़ी का प्रयोग होता है, कहीं भी लोहे या कील का प्रयोग वर्जित है। रथयात्रा आरंभ होने से एक दिन पूर्व ही तीनों रथ मंदिर के मुख्य द्वार के सामने बने गरुड़ स्तंभ के निकट खड़े कर दिए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे लाल और हरे रंग के 'तालध्वज' नामक रथ पर बलभद्र जी विराजमान होते हैं। रथयात्रा के मध्य में लाल और नीले रंग के 'दर्पदलना' अथवा देवदलन नामक रथ पर देवी सुभद्रा विराजमान रहती हैं। सबसे अंत के नन्दीघोष नामक रथ पर भगवान श्री जगन्नाथ रथारूढ़ होते हैं, जोकि लाल और पीले रंग का होता है। रथयात्रा में पोहण्डी बिजे, छेरा पोहरा, रथटण, बहुडाजात्रा, सुनाभेस, आड़प्रदर्शन तथा नीलाद्रिविंज आदि पारंपरिक रीतिरिवाजों को अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निभाया जाता है। रथयात्रा उत्सव में सर्वप्रथम सुदर्शन चक्र को सुभद्रा जी के रथ पर पहुंचाया जाता है। तत्पश्चात ढोल-नगााड़ों और गाजे-बाजों के साथ कीर्तन करते हुए भगवान की मूर्तियों को मंदिर से मस्ती में झूमते-झुलाते हुए रथ पर लाया जाता है, जिसे पोहण्डी बिजे कहते हैं। जब तीनो प्रतिमाएं अपने-अपने रथ में विराजमान हो जाती हैं, जब पुरी के राजा पालकी में आकर तीनों रथों को सोने की झाडू से बुहारते झाड़ते हैं, जिसे छेरा पोहरा कहते हैं। इसके उपरांत रथयात्रा आरंभ होती है। सैकड़ों-हजारों भक्तगण रथ को खींचते है, जिसे रथटण कहते हैं। तीन मील के बड़दंड की यात्रा कर तीनों रथ सायंकाल तक गुण्डिचा मंदिर पहुंचते हैं। जहां 6 दिनों तक भगवान प्रवास करते हैं। 8वें दिन श्री गुण्डिचा मंदिर के शरघाबालि मैदान में तीनों रथों को घुमाकर सीधा किया जाता है। दशमी तिथि को वापसी यात्रा आरंभ होती है, जिसे बहुड़ाजात्रा कहते हैं। वापस आने पर तीनों देवता एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही रथ पर दर्शन देते हैं तथा भक्तों द्वारा उनका स्वर्ण एवं रत्नाभूषणों द्वारा श्रृंगार किया जाता है, जो सुनाभेस कहलाता है। मंदिर से बाहर 6 दिनों के दर्शन को आड़पदर्शन कहा जाता है। द्वादशी तिथि पर रथों पर अघरापणा के पश्चात प्रतिमाओं का मंदिर में पुन: प्रवेश होता है, जिसे नीलाद्रिविंज कहते हैं। जिस विक्रमी संवत के आषाढ़ मास में मलमास अधिमास होता है, उस वर्ष रथयात्रा उत्सव के साथ एक विशेष उत्सव भी मनाया जाता है, जिसे नवकलेवर-उत्सव के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव में भगवान जगन्नाथ जी अपने पुराने कलेवर का परित्याग कर नया कलेवर धारण करते हैं अर्थात पुरानी मूर्तियों की जगह लकड़ी की नई मूर्तियां बनाई जाती हैं तथा पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर-परिसर के कोयती वैकुण्ठ नामक स्थान पर भाूमि में समाधि दे दी जाती है। श्री जगन्नाथ पुरी महोत्सव कुल दस दिनों तक चलता है। यह रथयात्रा संस्कृति और सभ्यता का अनूठा उदाहरण है। रथारूढ़ भगवान श्री जगन्नाथ, देवी सुभद्रा तथ बलभद्र जी के दर्शन मात्र से प्राणी जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता है। मंदिर से जुड़ी कथाएं इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अंजीर वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की, और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाए, और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराए। राजा ने ऐसा ही किया, और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे, और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आए। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आई तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका, और वह वृध्द कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया, और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है, और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जाएंगी। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गईं। मंदिर का आकर्षण ऐसी धारणा है कि कभी यहां भगवान बुध्द का दांत गिरा था, इसलिए इसे दंतपुर भी कहा जाता था। यहां का जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्य एवं ऐतिहासिक रथयात्रा के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध है। पश्चिमी समुद्र तट से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर उत्तर में नीलगिरी पर्वत पर 665 फुट लंबे और इतने ही चौड़े घेरे में 22 फुट ऊंची दीवारों के मध्य स्थित यह प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर कलिंग वास्तुशैली में बना 12वीं सदी का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। कृष्णवर्णी पाषाणों को तराशकर बनाए गए इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी के नरेश चोड़गंग ने करवाया था।
|