• बेड़िया समाज की 'बेड़ियां' तोड़ने वाली चम्पा बेन का निधन

    सवरेदय आंदोलन से जुड़कर संघर्ष यात्रा शुरू करने वाली चम्पा बेन बेड़िया समाज के लिए देव दूत बनकर आई थीं। ...

    भोपाल, 23 जनवरी । सवरेदय आंदोलन से जुड़कर संघर्ष यात्रा शुरू करने वाली चम्पा बेन बेड़िया समाज के लिए देव दूत बनकर आई थीं। उन्होंने शोषित व उपेक्षित बेड़िया समाज को कुप्रथाओं की 'बेड़ियों' से मुक्त कराने का संघर्ष जीवन के अंतिम दिनों तक जारी रखा।

    बुंदेलखंड में बेड़िया समाज की पहचान दूसरों का मनोरंजन करने वाले समाज के तौर पर है। यह समाज नाच गाने से आगे बढ़कर देह व्यापार के कारोबार को भी अपने जीवकोपार्जन का हिस्सा बना चुका है। हिमाचल के चम्बा में नौ अप्रैल 1935 को रियासत परिवार से नाता रखने वाली चम्पा बेन जब मध्य प्रदेश के सागर जिले के पथरिया गांव पहुंची तो वह अंदर से हिल गई। वर्ष 1980 के बाद सागर के पथरिया को ही उन्होंने अपने जीवन का अहम पड़ाव बना लिया। वह यहां अपने जीवन के अंतिम दिन 22 जनवरी 2011 तक बेड़िया समाज के लिए काम करती रहीं।

    बेड़िया समाज को जरायम पेशा (आपराधिक) जाति भी माना जाता है। इस समाज के लोगों का आपराधिक वारदातों में भी दूसरे लोग इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं मान्यता के मुताबिक हर परिवार एक बेटी को नाच गाने के कारोबार में लगाता है। इन लड़कियों का शोषण भी आम हो गया है। चम्पा बेन जब यहां पहुंची तो उन्होंने इस समाज को शोषण से मुक्त कराने की ठान ली।

    चम्पा बेन गांधीवादी प्रगतिशील विचारधारा में विश्वास करती थीं। उन्होंने पहले बेड़िया समाज के उन लोगों को अपराध की दुनिया से बाहर निकालने की मुहिम छेड़ी जिन पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें कई ऐसे लोग भी थे जो मासूम थे मगर उन पर मामले दर्ज थे। चम्पा बेन ने निर्दोश लोगों को इन मामलों से मुक्ति दिलाई।

    फिर उनका ध्यान बेड़िया जाति की नई पीढ़ी पर गया। उन्होंने इनको शिक्षित करने का अभियान छेड़ा। चम्पा बेन की पहल पर प्रदेश सरकार ने बेड़िया समाज के बच्चों के लिए जवाली योजना को अमली जामा पहनाया। उसी के तहत चम्पा बेन ने पथरिया में 1993 में सत्यशोधन आश्रम की स्थापना की थी। इस आश्रम के जरिए बच्चों को शिक्षा के साथ रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण दिया जाता है। हर वर्ष 200 बच्चे यहां तालीम हासिल करते हैं।


    चम्पा बेन के प्रयासों के चलते बेड़िया जाति की नई पीढ़ी में बदलाव नजर आने लगे हैं। पैरों में घुंघरु की जगह हाथ में किताब व कलम नजर आती है। इतना ही नहीं वे अपना बेहतर भविष्य बनाने में भी कामयाब हो रहे हैं।

    बुंदेलखंड की लोक कलाओं के जानकार हरगोविंद कुशवाहा कहते हैं कि बेड़िया जाति को दलदल से निकालने की दिशा में किए गए प्रयासों में चम्पा बेन मील का पत्थर है। जहां समाज का एक वर्ग उनका शोषण करने में लगा है, वहीं चम्पा बेन ने उनके जीवन को बदलने का काम किया है।

    उन्होंने अपना पूरा जीवन ही उस समाज के उत्थान मे लगा दिया जो दूसरों के मनोरंजन का साधन है। चम्पा बेन जैसे लोग विरले होते हैं।

    चम्पा बेन के जीवन पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि वह बचपन से ही शोषित, उपेक्षित वर्ग के लिए संघर्षरत रही हैं। पहले वह विनोवा भावे के सवरेदय आंदोलन का हिस्सा बनीं और फिर निर्मला देशपांडे के सहयोगी की भूमिका निभाई। उसके बाद उन्होंने कुप्रथाओं और समस्याओं को करीब से जानने के लिए 1981 में 526 गांवों की यात्रा कीं। इतना ही नहीं उत्तराखंड के जोनसरबाकर में बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाया था। उन्होंने पंजाब के अलगावबाद के खिलाफ जलियावाला बाग से शिवपुरी (यहां तात्याटोपे को फांसी दी गई थी) तक गोली से फांसी तक की मशाल यात्रा निकाली।

    चम्पा बेन को समाजसेवा के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण पुरस्कार, रेड एण्ड व्हाइट का ब्रेबरी अवार्ड, राज्य सरकार का इंदिरा गाधी सम्मान सहित अनेक सम्मान मिले। उन्होंने इतिहास, दर्शन, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र जैसे विषयों में स्नात्कोत्तर की उपाधि हासिल की।

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