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बांग्ला साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर आशापूर्णा देवी

10, Jul, 2011, Sunday 09:15:36 PM

 डॉ. बी. कार

आशापूर्णा देवी के उपन्यासों में नारी मनोविज्ञान की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है। पारिवारिक प्रेम संबंधों की उत्कृष्टता उनकी कथाओं में है।

8 जनवरी 1910 को आशापूर्ण देवी का जन्म कोलकाता में हुआ और 13 जुलाई 1995 को 87 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ। अपने 87 वर्ष के दीर्घकाल में 175 से भी अधिक औपन्यासिक कृतियां, जिनके माध्यम से उन्होंने समाज के विभिन्न पक्षों को उजागर किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के 'भुवन मोहिनी' स्वर्ण पदक से अलंकृत आशापूर्णाजी 1976 में पद्मश्री से विभूषित की गयी। सन् 1977 में अपने उपन्यास  'प्रथम प्रतिश्रुति' पर टैगोर तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित की गयी।
आशापूर्णा देवी का लेखन उनका निजी संसार ही नहीं है। वह हमारे आस-पास फैले संसार का विस्तारमात्र है। इनके उपन्यास मूलत: नारी केन्द्रित है। नारी की असहाय विडम्बना को अपने लेखन में लेखिका ने चित्रित किया है। सृजन की श्रेष्ठ सहभागी होते हुए भी भारतीय समाज में नारी का पुरुष के समान मूल्यांकन नहीं हुआ, और न होता है। पुरुष की बहुत बडी ग़लती पर समाज चुप रहता है, पर नारी की थोडी सी चूक उसके जीवन को नर्क बना देती है। बांग्ला साहित्य में बंकिम, रवीन्द्र, शरत् के पश्चात् आशापूर्णा देवी का अमूल्य- अमिट स्थान है। वे न केवल बांग्ला अपितु हिन्दी भाषी अंचलों में भी प्रमुख हस्ताक्षर है- जिनकी हर  कृति नयी अपेक्षा, उल्लास, रूचि के साथ पढी ज़ाती है। उनकी उपन्यासों में आज के पारिवारिक जीवन की समस्या की अवधारणा है। लेखिका की सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि, सूक्ष्म, विचार-गांभीर्य क्षमता का गुण उन्हें महान बनाता है। वैचारिक, ऐतिहासिक दृष्टिकोण गृहस्थ जीवन में नारी के अस्तित्व का स्वरूप उद्धाटित करने में समर्थ है। लेखिका आशापूर्णा देवी यथार्थवादी हैं। सच को सामने लाना उनका उद्देश्य है। नारियों पर जहां फब्तियों कसी जाती हैं। कभी अति आधुनिका कहकर उसका अपमान किया जाता है। तब लेखिका कहती हैं आज नारियां घर-बाहर दोनों क्षेत्रों को संभाल रही हैं।  ''जरूरत पडने पर सिनेमा थियेटन्र कर सकती है और जरूरत पडे तो गृहस्थी का काम भी कर सकती है।''
आशापूर्णा देवी के कहानियों की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। वक्तव्य प्रधान, समस्या प्रधान और आवेग प्रधान। जीवन के कडवे और मीठे प्रसंग इस तरह प्रस्तुत करती है, लगता ही नहीं कि ये किसी कथा का अंश है। अपितु हम आप की यहां हैं। लेखिका का लेखन-संसार उनका अपना या मात्र निजी संसार नहीं है। वह हम सबके घर-संसार का ही विस्तार है। इस संसार को वे कभी नन्ही बेटी बनकर, कभी किशोरी, कभी ममतामयी मां बनकर नयी जिज्ञासा के रूप में देखती है। उनकी कहानियां अनेक प्रश्न उपस्थित करती है जो हमारे अवचेतन को ही नहीं, मारे समाज को भी आंदोलित करती है। उनकी कथा का प्रथम और अंतिम लक्ष्य पात्रों का आत्मसंघर्ष होता है। एक स्त्री होने के नाते उन्होंने स्त्री पात्रों की सूक्ष्म मानसिकता, नारी सुलभ स्वभाव उसके दर्प, दंभ, द्वंद और उसकी दासता का बखूबी चित्रण किया है। मूल्यों का संकट और पीढियों का टकराव जैसी समस्याओं को लेखिका ने अपने तरीके से निबटाया है, जो भारतीय परिवेश, मर्यादा और स्वीकृत पारिवारिक ढांचे के अनुरूप होती है। उनका सदा यही प्रयास रहा है कि चारदीवारी में कैद , पर्दे में घुट-घुटकर जीने वाली बहू, बेटियां ,मां, पत्नी पुरुषों की बनायी हुई दीवारों को तोडे अौर दासता से हटकर खुली हवा में सांस ले। लेखिका ने उन कामकाजी महिलाओं के आत्मविश्वास को उजागर किया है जो केवल रूप सौन्दर्य से ही नहीं अपनी दक्षता से भी समाज में एक वांछित और महत्वपूर्ण भूमिका निवाह सकती है। उनका पहला कहानी संकलन 'जल और जामुन' 1940 में प्रकाशित हुआ था। उस समय यह कोई नहीं जानता था कि बांग्ला ही नहीं भारतीय कथा साहित्य के मंच पर एक ऐसे नक्षत्र का आविर्भाव हुआ है जो दीर्घ काल तक समाज की कुंठा, संकट, संघर्ष जुगुप्सा और लिप्सा- सबको समेटकर सामाजिक संबंधों के हर्ष, उल्लास और उत्कर्ष को नया आकाश प्रदान करेगा।
 आशापूर्णा देवी का बचपन और कैशोर्य कोलकाता में बीता। पिता अच्छे कलाकार और मां साहित्य की प्रखर विदुषी थीं, मां के साहित्यिक व्यक्तित्व का प्रभाव उन पर बाल्यकाल से ही पडा था। परिवार कट्टरपंथी होनेसे उन्हें स्कूल-विश्वविद्यालय में पढने का अवसर नहीं मिला। घर में उन्होंने अध्ययन किया अनेक महत्वपूर्ण बांग्ला पत्रिकाएं नियमित घर में आती थी- जिसका अध्ययन और चिंतन करती लेखिका आज साहित्यकार की बहूमुल्य नक्षत्र क रूप में जानी जाती हैं।  बचपन से लेखन के प्रति रूचि और अपने आस-पास के वातावरण से अनुभूत लेखिका के सभी उपन्यास और कहानियां, विचारों, समस्याओं के निदान आदि का नया अध्याय खोलती है। गंभीर विषय को कम पात्र और घटनाओं से बांधकर उसे उपन्यास का रूप देकर चमत्कृत करना उनकी लेखनी का कमाल है। समय, साहित्य और समाज के जुडे सवालों पर रणजीत साहा ने लेखिका से साक्षात्कार लिया था, जिसमें लेखिका से उन्होंने प्रश्न किया किया कि नारी के अधिकारों के लिए किन प्रमुख बातों को ध्यान में रखते हुए नारी को अपना लेखन केन्द्र बिन्दु बनाया? इस पर लेखिका ने कहा 'लेखन कार्य में मेरी अपनी व्यक्तिगत पसंदगी-नापसंदगी का सवाल कभी नहीं उठा। जो पात्र पहले बहुत प्रभावी ढंग से सामने आते हैं वे कभी-कभी कमजोर और कातर हो उठते हैं। वे आरंभ से बड़ी असहाय, अबला और अभिशप्त जान पडती है लेकिन स्थितियों के दबाव और अपनी निर्णयात्मक मानसिकता के चलते उनमें यथोचित बदलाव आता है और उनकी पात्रता को निश्चित गति और दिशा प्राप्त होती है। इन तमाम पात्राओं में मुझे अपना 'सुवर्णलता' सर्वाधिक प्रिय है। बात यह है कि प्रत्येक अपनी रचना में अपना जीवन दर्शन पिरोना चाहता है। 'सुवर्णलता' के माध्यम से मैंने कमोवेश अपनी बात कहने की कोशिश की है। मुझे कभी-कभी उसमें अपना प्रतिरूप दीख पडता है। पिंजरे में बंद किसी पंछी की तरह छटपटाती और आकाश में उडने को फडफ़डाती जिंदगी की तरह मैंने इस स्थिति को एक प्रतीक के रूप में लिया और नारी जीवन के अनंत और अंतहीन संघर्ष को वाणी देने का प्रयास किया। और मुझे लगता है कि मैं इसमें कमोवेश सफल भी हुई। क्योंकि इसमें नारी मन की अंतहीन छटपटाहट और संघर्ष को स्थापित किया गया था।'
 दरअसल नारी की मूलभूत समस्याएं एक जैसी हैं और हमेशा से रही हैं सिवा इसके कि इसका बाहरी रूप और स्वभाव समय के साथ-साथ बदल गया है। 'प्रथम प्रतिश्रुति' की नायिका सत्यवती को एक खामोश प्रभावी ताकत के रूप में देखा जा सकता है जो रूढ़िवादी समाज के खिलाफ लडती हैं। स्वर्णलता भी विद्रोहिणी है। दोनों के समय और संदर्भ के करण अभिव्यक्तिया बदल गयी हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किए जाने के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में 'प्रथम प्रतिश्रुति' की संस्तुति में जो कुछ लिखा गया , उसका थोडा सा अंश उद्धृत करना समीचीन लगता है- 'प्रथम प्रतिश्रुति' में बंगीय नारी की उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर क्रमिक विमुक्ति के इतिवृत को उद्धाटित किया गया है। समूची कथा एक तेजस्वी उपन्यास के रूप में विकसित हो उठी है, जिसका केन्द्र बिन्दु कथा नायिका सत्यवती है। उसका जीवन और संघर्ष है, और हैं, वे उपाय साधन जिनके द्वारा उसने क्रमश: उन्मुक्तता उपलब्ध की। कृति में तत्कालीन बांग्ला नारी की मनोहारी छवियां ही नहनीं उकेरी गयी है, लेखिका ने मानव स्वभाव पर ऐसी सटीक टिप्पणियां भी प्रस्तुत की है, जिनकी प्रासंगिकता बहुत व्यापक है। इसमें रूपायित हो गयी है वह प्रक्रिया, जिसमें भारतीय नारीत्व उचित गरिमा पा सकी है।
नारियों को रूढ तथा जड परम्पराओं के शिकंजे में कसने वाली शास्त्रीय व्यवस्थाओं को नकारती हुई बंग महिला ने अपने लेखन में नये युग की सृष्टि की है। आशापूर्णा देवी की समग्र रचनाओं ने, बंकिम, रवीन्द्र और शरत की त्रयी के बाद बंगाल के पाठक वर्ग और आशापूर्णा देवी के मामले में प्रबुद्ध महिला पाठकों को सर्वाधिक प्रभावित और समृद्ध किया है।

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