जब चारों ओर आग की ऊंची-ऊंची लपटें उठ रही हों, तब कुंआ खोदने का दिखावा किया जा रहा है, इसलिए यह कतई नहींमानना चाहिए कि इस कुएं के पानी से आग बुझेगी। आग लगी है कीमतों में और कुआं खोदना यानि महंगाई रोकने के लिए नई समिति का बनना। जब खुद से कुछ न करते बने तो एक समिति बना लो, और उस पर जिम्मेदारी डाल दो कि वह सारी समस्या सुलझा ले। जब मुख्य पात्र से किरदार सही तरीके से नहींनिभाया जा रहा तो उसके डुप्लीकेट से इसकी उम्मीद करना व्यर्थ है। यूपीए सरकार की पहली पारी के आखिरी पड़ाव में महंगाई बेलगाम होना शुरु हो गयी थी। तब अचानक आई वैश्विक मंदी पर इसका इल्जाम डाल दिया गया। फिर आम आदमी से जुड़े होने का दावा करते अपने चंद कार्यक्रमों के कारण कांग्रेस को दोबारा सत्ता में आने का अवसर प्राप्त हुआ।
इस बार वाम दलों का बाहर से समर्थन नहींथा और भीतर कुछ दूसरे दलों को जुड़ने का मौका लगा। उस अनुरूप मंत्रिमंडल में फेरबदल भी हुआ, किंतु कृषि मंत्रालय क्रिकेट मंत्री के पास यथावत रहा। उनकी नीतियां तब भी आम जनता की हितैषी नहींथी, न अब हैं। जब तक खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृध्दि नहींहुई थी, तब तक किसी तरह आम जनता की गृहस्थी की गाड़ी खिंच रही थी, लेकिन अब ऐसा हाल हो गया है कि कैसे खाएं और कैसे पकाएं। कीमतों में वृध्दि के दस कारण हो सकते हैं, लेकिन उन पर लगाम कसने की जिम्मेदारी अंतत: केंद्र व राज्य सरकारों की ही बनती है। जब कई महीनों से मच रहा हाहाकार प्रधानमंत्री ने देख लिया तो पहले राज्यों के मुख्य सचिवों और फिर मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई कि महंगाई पर काबू पाने के उपाय ढूंढने हैं। अगर जरा सी भी राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो न इतनी महंगाई बढ़ती, न ऐसी किसी बैठक की आवश्यकता होती। इस बैठक का नतीजा सिफर ही रहना था, वही हुआ भी। केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर आरोप लगाने के अलावा इस समय का कोई और बेहतर उपयोग नहींकर सकीं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने शरद पवार से विरोध के चलते इस बैठक में शामिल होना ही मुनासिब नहींसमझा। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बैठक में ही उलझ पड़े कि गरीब की बात करना राजनीति है या नहीं। प्रधानमंत्री ने राज्यों से मुख्यत: जिन बातों पर नाराजगी जतलायी, उनमें केंद्र द्वारा दिए जा रहे सस्ती कीमतों के गेहूं-चावल को राज्यों द्वारा नहीं उठाना, राज्यों द्वारा खाद्यान्न पर 10 से 15 प्रतिशत का अतिरिक्त कर लगाना तथा जमाखोरों पर लगाम न कसना आदि हैं। ये शिकायतें गैर कांग्रेस शासित राज्यों से ज्यादा है। इन शिकायतों में अतिशयोक्ति कहींनहींहै, लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में ही स्थिति क्या बेहतर है? इसलिए महंगाई पर राजनीति करने की इस प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए।
कृषि उर्फ क्रिकेट मंत्री उर्फ माननीय शरद पवार को बाला साहेब ठाकरे से मिन्नतें करने का वक्त है कि वे आईपीएल में आस्ट्रेलिया के क्रिकेटरों को खेलने की अनुमति दें। लेकिन दाल-चीनी की कीमतों में अनावश्यक बढ़ोत्तरी क्यों हो रही है, इसका विश्लेषण करने का समय नहींहै। प्रधानमंत्री सलाह दे रहे हैं कि दाल की जगह पीली मटर खाएं और राकांपा के मुखपत्र के संपादकीय में चीनी कम खाने की हिदायत दी जा रही है क्योंकि इससे डायबिटीज का खतरा रहता है। कीमतें बढ़ने का कारण पैदावार में कमी बतलाई जा रही है। भारत में जिस तरह मौसम भरोसे कृषि होती है, उसमें पैदावार कम-ज्यादा होती रही है, पर ऐसी महंगाई कभी नहींबढ़ी। बाजार में बड़े खिलाड़ियों को टिकाए रखने के लिए अवास्तविक कीमतों के निर्धारण का खेल चल रहा है और पिस रहा है आम आदमी। न जाने शरद पवार से सीधे नाराजगी जताने की हिम्मत प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी क्यों नहींकर पा रहे हैं। आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, प.बंगाल, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, मप्र और छ.ग के मख्यमंत्रियों के साथ वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को लेकर जो नई समिति बनायी गई है, वह इस अंधकार को दूर करने कौन सा जादुई चिराग लाती है, यह देखने वाली बात रहेगी।
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