मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक अधिकारियों के घर पड़े आयकर छापों से जिस बेईमानी व भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है, वह दुखी करता है, आश्चर्यचकित नहीं। न जाने कितनी बार कितनी एजेंसियों ने सर्वे कर बताया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें भारत में कितनी गहरी हैं। एक सड़ी मछली पूरे तालाब का जल दूषित करती है, यह बात भारत की प्रशासनिक व्यवस्था पर पूरी तरह लागू होती है। सरकारी महकमों में रिश्वतखोरी इस तरह प्रचलित हो गई है कि ईमानदार अफसर को उदाहरण की तरह पेश किया जाता है। सारे अधिकारी-कर्मचारी बेईमान नहींहोते, किंतु अधिकतर की बेईमानी के कारण संपूर्ण व्यवस्था ही दागदार हो गई है। इसलिए जब आयकर विभाग ने कुछ आईएएस अधिकारियों के निवास पर छापे डाले तो किसी को अचरज नहींहुआ। हैरानी केवल इन छापों में जब्त की गई अवैध संपत्ति को देखकर हुई। मध्यप्रदेश मेंछापे में इतनी नकदी पकड़ाई कि नोट गिनने के लिए मशीन लगानी पड़ी।
विदेशी मुद्रा व महंगी शराब भी अधिकारियों के घर से पकड़ाई। यह संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस कार्रवाई के तुरंत बाद भ्रष्ट आईएएस दंपति अरविंद जोशी व टीनू जोशी को निलंबित कर दिया। लेकिन इसे पर्याप्त नहींमाना जाना चाहिए। जोशी दंपति के अतिरिक्त और जितने अधिकारी आयकर छापे की जद में आए हैं, उन्होंने कई गरीब, मजबूर लोगों का हक मारकर अपना घर भरा होगा। इन लोगों के अलावा और न जाने कितने बड़े अधिकारी-कर्मचारी होंगे, जिन के घरों पर आयकर का छापा होना चाहिए। आखिर रिश्वत के नाम दी गई राशि ऊपर से लेकर निचले पायदान तक बांटी जाती है। सरकारी विभागों में आम जनता चपरासी को रिश्वत थमाए बगैर भीतर नहींजा पाती और इसके बावजूद भीतर बैठे अधिकारी से मिलना उसके लिए दुरूह कार्य होता है। सरकारी अफसरों से मिलने के लिए पत्रकार, उद्योगपति, व्यापारी या ऐसी ही कोई विशेष योग्यता आज की तारीख में अनिवार्य बना दी गई है। सुरक्षा के नाम पर सचिवालयों के दरवाजे आम आदमी के लिए बड़ी मुश्किल से खुलते हैं और अन्य सरकारी दफ्तरों का भी यही हाल है। आम जनता के प्रति जरा सी भी जवाबदेही के न होने और राजनेताओं की चापलूसी करने की प्रवृत्ति ने ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था निर्मित कर दी है जिससे पार पाना कठिन लग रहा है। भ्रष्टाचार केवल एक क्षेत्र में होता तो उसका उपाय किया जाता। लेकिन देश को संचालित करने वाले सभी महत्वपूर्ण अंग इस रोग से पीड़ित हैं। कोढ़ में खाज यह कि राजनेताओं व अफसरों की मिलीभगत स्थिति और बिगाड़ रही है।
राजनीति में शुरू हुआ भ्रष्टाचार अफसरशाही तक पहुंचा है या अफसरशाही के भ्रष्ट होने से राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ा है, कहना मुश्किल है। तीन-चार दिनों पहले ही प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों के लिए आचार संहिता लागू करने की बात कही, संपत्ति को सार्वजनिक करने के उपाय सुझाया ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम कसे। सत्ता में भ्रष्टाचार को इस तरह पनपने से रोका जा सकता है, किंतु यह पहल तब तक कारगर साबित नहींहोगी, जब तक प्रशासन में भी भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने की मुहिम न छेड़ी जाए। इस कार्य के लिए राजनैतिकइच्छाशक्ति चाहिए, जिसका घोर अभाव है। दो-चार नेताओं द्वारा व्यक्तिगत ईमानदारी दिखाने से कोई सुधार नहींहोना है। जब तकभ्रष्ट आधिकारियों या नेताआेंको कड़ी सजा का प्रावधान नहींहोगा, स्थिति नहींबदलेगी। फिलहाल इसकी कोई उम्मीद भी नहींदिखती। प्रशासनिक सुधार करने के नाम पर कुछेक नियमों में फेरबदल कर खानापूरी होती है। सरकारी नीतियों, योजनाओं का लाभ किस तरह जनता के बजाए उद्योगपतियों को मिले और फिर उनसे मिली अनुकंपा राशि से मंत्रियों, नेताओं, अफसरों के घर भरे, फिलहाल पूरा तंत्र इस पर ही चल रहा है। और परसाई का भोलाराम का जीव, शरद जोशी की जीप पर सवार इल्लियां अमरत्व की ओर बढ़ रहे हैं।
|