| Last Updated: 01:46:38 AM 16, Mar, 2010, Tuesday |
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| मनरेगा की कमियां |
| (08:39:01 PM) 05, Feb, 2010, Friday |
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मनरेगा केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। चार वर्ष पूर्व जब इसकी शुरुआत हुई थी तो इसे ऐतिहासिक कदम बताया गया था। कई मायनों में यह क्रांतिकारी योजना थी। ग्रामीण भारत में जब-जब कृषि क्षेत्र में आजीविका व रोजगार की समस्या उत्पन्न हुई, तब-तब पलायन में वृध्दि हुई। रोजगार की तलाश में घर-घर से लोग शहरों की ओर जाने लगे, देश के एक कोने से दूसरे कोने में दिहाड़ी मजदूरी के लिए भटकने लगे। एक बोरी में घर का सामान बांधे पूरा परिवार रेलवे प्लेटफार्म पर पड़ा है, या जनरल बोगी में सफर कर रहा है या ट्रक-मेटाडोर में सवार दूसरे शहर जा रहा है, यह दृश्य भारत में हर कहीं दिख जाता है। रोजी-रोटी की तलाश में भटकते इन ग्रामीणों को कभी बंधुआ मजदूर बनाया जाता तो कहींदलालों व ठेकेदारों द्वारा इनका शोषण किया जाता।
सम्मान से आजीविका कमाने व जीवन जीने के अधिकार का रोजाना हनन होता। ऐसे में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले ग्रामीणों के लिए उम्मीद की किरण ले कर आयी कि अब वे अपने गांव में रहकर ही साल में कम से कम सौ दिन आजीविका कमा सकते हैं। शुरुआती दौर में नरेगा कुछ जिलों तक सीमित था, बाद में राहुल गांधी की पहल पर इसे व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया। कांग्रेस को आम चुनावों में मिली सफलता का एक कारण नरेगा था। दूसरी बार सत्ता में आने पर इस योजना को महात्मा गांधी के नाम पर मनरेगा किया गया। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के मुताबिक मनरेगा कांग्रेस की विचारधारा और नीतियों का प्रतिफलन है। सरकार की ऐसी महत्वाकांक्षी योजना में लक्ष्य से भटकाव होना दुखद है। मनरेगा के चार वर्ष पूर्ण होने पर स्वयं मनमोहन सिंह ने इसकी खामियों पर चिंता जतलायी। किंतु कमियों के लिए सूबों को जिम्मेदार ठहराया। यह सही है कि केंद्र में एक दल की सरकार होने और राज्य में दूसरे दल की सरकार होने से केंद्र सरकार की नीतियों को पूरी ईमानदारी से लागू करने में आमतौर पर अनिच्छा दर्शायी जाती है, किंतु यहां यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या जिन राज्यों में कांग्रेस अथवा यूपीए के घटक दलों की सररकारें हैं, क्या वहां मनरेगा स्वस्थ अवस्था में है? अगर नहींतो फिर इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए।
दरअसल मनरेगा लागू करने का उद्देश्य पूरा हो इसे सुनिश्चित करने की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की ही है। लेकिन ग्रामीण मंत्रालय, जिस पर मनरेगा के क्रियान्वयन की जवाबदेही है, अपने प्रयास में सफल नहींहो पा रही है, यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। यह अकारण नहींकि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार परिषद के दो सदस्य, जिन्होंने इस योजना को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, अरुणा राय और ज्यां द्रेज चार वर्ष पूरे होने के सम्मेलन में शामिल नहींहुए। इन दोनों ने इस बात पर खेद जतलाया कि अगस्त में एकपत्र लिखकर जिन कमियों की ओर इन्होंने ग्रामीण मंत्रालय का ध्यान आकृष्ट किया, उन पर कोई कार्य नहींहो रहा है। मनरेगा में भत्तों को देने संबंधी नीति के अतिरिक्त इन दोनों ने गांवों में पंचायत भवनों के निर्माण पर भी चिंता प्रकट की थी। मनरेगा में पक्के निर्माण कार्य करवाने का प्रावधान नहींहै। फिर इस योजना के अंतर्गत पंचायत भवनों का निर्माण क्यों होना चाहिए, वह भी भारत निर्माण राजीव गांधी सेवा केंद्र के नाम पर। ज्यां द्रेज और अरुणा राय दोनों ने इस बात पर चिंता जाहिर की है कि पक्के निर्माण कार्य होने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। पंचायत भवनों के निर्माण पर आपत्ति नहींहै, किंतु जो राशि पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए योजना के तहत स्वीकृत है, उसे पक्के निर्माण कार्य में बिना पारदर्शिता के लगाना संशय पैदा करता है। निर्माण कार्यों ने दलाल संस्कृति को कितना बढ़ाया है, यह किसी से छिपा नहींहै। ऐसे में एक अच्छी योजना में भ्रष्टाचार के लिए बढ़कर दरवाजे खोलना सही नहींहोगा।
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| Posted by:
devendra surjan bangalore |
On:
February 05, 2010 |
मनरेगा की कमियों की ओर दो दिन पहले ही सोनिया गाँधी ने चिंता जताई है.क्या-क्या सुधार किये जाना है उस ओर भी उन्होंने सरकार का ध्यान आकर्षित कराया है.काश कि सोनिया जी अपना वक्तव्य पहले दे देतीं, लेकिन शायद वो भी किसी कार्यक्रम के लिए अपने विचार सीने से लगाई हुईं थी,वर्ना, अरुणा रॉय और ज्यां द्रेज कोयोजना की चौथी वर्ष-पूर्ति पर अनुपस्थित नहीं रहना पड़ता.इसमें कोई दो राय नहीं की भवन-सड़क ,पुल-पुलिया, बांध-तालाब और अन्यान्य निर्माण कार्य भ्रष्टाचार के मुख्य स्त्रोत हैं.अभी मध्यप्रदेश की शिक्षा मंत्री ने दो दिन पूर्व प्रधान मंत्री से मिलकर ६० बच्चों के एक स्कूल बिल्डिंग हेतु इतनी ज्यादा राशि मांगी है कि जितने में ६० स्कूल बिल्डिंग बन जावें. लगता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्ट अधिकारीयों पर तो सख्त कार्यवाही करने का दम भरते हैं लेकिन अपने सहयोगियों के कदाचरण से मुंह फिराए हुए हैं.
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