समाजवादी पार्टी से अमर सिंह की विदाई की तहरीर लिखी जा चुकी थी, बस उसमें तारीख डलने की देर थी और 2 फरवरी 2010 को यह कार्य भी संपन्न हो गया। जब अमर सिंह ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दिया था, तब तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थींकि यह अमर सिंह की नई राजनीतिक चाल है या वाकई राम-हनुमान जैसे उनके और मुलायम सिंह के संबंधों में तल्खी आ गई है। मुलायम सिंह यादव अमर सिंह को निकाल सकते हैं, इस बात पर एकबारगी विश्वास करना कठिन है। पर युध्द और प्रेम की तरह राजनीति में भी सब जायज है।
मुलायम सिंह ने चतुर राजनेता की भूमिका निभाई। आप बाहर जाइए, अमर सिंह और जयाप्रदा को ऐसा कहने का काम महासचिव मोहन सिंह ने किया। पर इसे समझना क्या कठिन है कि यह सब सपा मुखिया और उनके परिवार के कहने पर हुआ है। पिछले डेढ़ महीनों से जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे, उसके बाद आर या पार होना ही था। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए। तो अमर-मुलायम प्रेम का धागा फिरोजाबाद सीट हारने के बाद चटक ही चुका था। कल्याण सिंह से दोस्ती की भूल और फिरोजाबाद सीट की हार का कारण अतिआत्मविश्वास बताने वाले अमर सिंह एक के बाद एक मुलायम सिंह यादव व उनके परिवार पर कटाक्ष करते जा रहे थे। उन्हें शायद यह गुमान था कि समाजवादी पार्टी उनके बिना नहींचल सकती। तभी राज्यसभा से इस्तीफा देने की मोहन सिंह की बात पर उन्होंने यह कहा कि कन्नौज या बदायूं सीट खाली करवाएं, वे वहां से चुनाव लड़ते हैं, देखते हैं कौन जीतता है। ज्ञात हो कि कन्नौज से मुलायम के बेटे और बदायूं से भतीजे लोकसभा सांसद हैं। अमर सिंह का यह गुमान अकारण नहींथा। बीते 14 बरसों से, जब से वे सपा के साथ जुड़े, पार्टी की कार्य संस्कृति ही बदल गई थी। समाजवाद के नाम पर पांचसितारा शैली की, फिल्मी हस्तियों की पार्टी चल रही थी। यूं फिल्मी सितारों का राजनीतिक सफर कई दलों में चल रहा है, किंतु वहां वे पूर्णतया राजनीति करने की मंशा से ही उतरते हैं।
समाजवादी पार्टी मेंऐसा नहींथा। बच्चन परिवार, जयाप्रदा, मनोज तिवारी, संजय दत्त, इन सबकी चमक-धमक को भुनाने के लिए अमर सिंह ने इन्हें पार्टी से जोड़ा। ये सब पहले अमर सिंह से जुड़े, फिर मुलायम सिंह यादव से। और अमर सिंह के प्रभाव के चलते ये तमाम सितारे भी खुद को प्रभावी मान रहे थे। जयाप्रदा अमर सिंह मामले में मुलायम सिंह को सुझाव देने चली थीं तो जया बच्चन अमर सिंह के निष्कासन को गलत बता रही हैं। संजय दत्त ने अमर सिंह के इस्तीफे के तत्काल बाद अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी और जयाप्रदा के निष्कासन के बाद मनोज तिवारी ने इस्तीफा दे दिया। सपा का बॉलीवुड कैडर यह भली-भांति जानता था कि अमर सिंह के न रहने पर उनकी कोई पूछ-परख नहींरह जाएगी। दरअसल जिस अप्रत्याशित ढंग से अमर सिंह समाजवादी पार्टी में उदित हुए, उसी तरीके से अस्त भी हो गए। सपा को अपा बनाने के फेर में समाजवादी पार्टी के बाकी प्रमुख सदस्य नाराज चल रहे थे। उनकी यह नाराजगी जायज भी थी। राज बब्बर, बेनीप्रसाद वर्मा व आजम खान जैसे मुलायम सिंह यादव के पुराने साथी उनसे दूर हो गए। अमर सिंह की कार्यशैली के कारण समाजवादी पार्टी अपने मूल उद्देश्य से विचलित हो गई थी। ऐसे में कट्टर समाजवादियों को पीड़ा होना स्वाभाविक था। अब यह प्रश्न उठ रहा है कि उनके न रहने से पार्टी को क्या नुकसान होगा। यह सवाल भी अतिप्रचारवाद की उपज है। राजनीतिक दलों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है। दल या संस्था से खुद को सर्वोपरि मानने वाले देर-अबेर अलग हो जाते हैं और दल बदस्तूर कार्य करता रहता है। समाजवादी पार्टी में भी ऐसा ही होगा।
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