क्षेत्रवाद, जातीय अस्मिता, मातृभाषा पर भगवा परिवार में दरार पड़ती दिख रही है। यह दरार सचमुच है या केवल लकीर खींचकर जनता को भरमाने की कोशिश है, इसका पता आने वाले समय में लगेगा। शिवसेना और उसकीमानस संतान मनसे ने अपनी राजनीति के चलते इस वक्त का सबसे अहम प्रश्न यह बना दिया है किमुंबई किसकी है? सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जितने जरूरी प्रश्न हैं, वे सब इस एक प्रश्न के नीचे दफन कर दिए गए हैं। कम से कम मुंबई में यही स्थिति है, बाकी महाराष्ट्र को लेकर शिवसेना और मनसे इतने चिंतित नहींदिखते। मुंबई पर सिर्फ मराठियों का हक है, उनके इस बयान पर संघ परिवार ने आपत्ति जतलाते हुए कहा कि वह महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों की रक्षा करेगी। उनके इस बयान पर भाजपा ने भी सहमति जतलाई और कहा कि महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों से कोई भेदभाव नहींहोना चाहिए। संघ और भाजपा के इस रवैये से शिवसेना बुरी तरह तिलमिलाई दिख रही है। जबकि राज ठाकरे ने अपना सुर थोड़ा बदलते हुए कहा किजो महाराष्ट्र में जन्मा हो वह मराठी है।
शिवसेना और भाजपा पुराने सहयोगी हैं, महाराष्ट्र में उनका गठबंधन है। इसलिए दोनों के बीच क्षेत्रवाद पर असहमति आश्चर्यचकित करती है। भाजपा क्षेत्रवाद की संकीर्णता से खुद को ऊपर बताना चाह रही है और शिवसेना का राजनीतिक आधार-अस्तित्व इस संकीर्णता पर ही टिका है। शिवसेना को केवल महाराष्ट्र और उसमें भी मुंबई व आसपास की राजनीति करनी है, जबकि भाजपा कड़ी मशक्कत के बाद राष्ट्रीय पार्टी बन पाई है, केंद्र में प्रमुख विपक्षी दल है, और केंद्र की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के मंसूबे रखती है। इसलिए गठबंधन के बावजूद दोनों अपना अलग रूख अख्तियार किए हुए हैं और भाजपा ने इसे स्वाभाविक करार दिया है। बात ठीक भी है, गठबंधन में शामिल सभी दल एकसी सोच रखें, कतई जरूरी नहींहै। शिवसेना की यह संकीर्णता आज की नहीं, पिछले 40 वर्षों की है। जब भाजपा राष्ट्रीय परिदृश्य में नहींछाई थी, तब भी शिवसेना की नीति ऐसी ही थी और जब दो सीटों से आगे बढ़ते हुए मंदिर मुद्दे को भुनाते हुए वह केंद्र की राजनीति के गलियारे में चहलकदमी करने लगी, तब भी शिवसेना की नीति वही बनी रही। राज ठाकरे ने अलग होकर मनसे बनाई, लेकिन नीति अलग नहींकर पाए।
चाचा-भतीजे में होड़ चलती रहती है कि मराठियों का मुद्दा कौन ज्यादा उठाता है। देश की जनता जानती है कि इनकी राजनीति संकीर्ण स्वार्थों की है। इसलिए उनसे कोई अपेक्षा नहींरहती कि वे विदर्भ के किसानों के बारे में सोचे, गढ़चिरौली के आदिवासियाेंकी चिंता करे या मुंबई को ही गैर-मराठियों के लिए सुरक्षित स्थान बनाएंगे। भाजपा से इसकी अपेक्षा रहती है और शायद इसलिए उसने क्षेत्र के ऊपर राष्ट्रहित को बताया है। लेकिन भाजपा की असली राजनीति क्या है, इसे समझना मुश्किल है। अपनी सहयोगी शिवसेना की संकीर्णता उसे बीते बरसों में क्यों नहींदिखी। अभी बाल ठाकरे ने ऐसी कौन सी नई बात कह दी कि इतना हंगामा बरप गया। इसकी तात्कालिक वजह यह दिखती है कि इस बरस के अंत तक बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और मुंबई में हमला अधिकतर इस क्षेत्र के लोगों पर ही हो रहा है। संभवत: भाजपा अपनी सीटाेंकी सुरक्षा के लिए यह मुद्रा अपना रही है और चुनाव निबटने के बाद शिवसेना के क्षेत्रवाद के राग में उसे शायद कोई बुराई दिखाई न दे। बढ़े नाखून खतरनाक होते हैं, लेकिन नाखूनों को छुपा कर रखना ज्यादा खतरनाक है। संघ और भाजपा से जनता जानना चाहेगी कि शिवसेना से उत्पन्न इस वैचारिक मतभेद की आयु कितनी रहेगी।
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