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विश्व आर्थिक मंच और अर्थव्यवस्था
(08:18:29 PM) 02, Feb, 2010, Tuesday


स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में आल्प्स पर्वत की खूबसूरत वादियों को निहारते हुए विश्व के कई बड़े सौदागरों ने अपनी आगामी रणनीति पर चर्चा की। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के बैनर तले पांच दिनों तक चले सम्मेलन में रणनीति का मुख्य बिंदु रहा मंदी के बाद विश्व अर्थव्यवस्था को किस तरह पटरी पर लाया जाए। रिथिंक, रिडिज़ाइन, रिबिल्ड यानि पुनर्विचार, पुनर्संरचना और पुनर्निर्माण इस सम्मेलन का केंद्र विषय था। इस चर्चा में विश्व की तमाम बड़ी कंपनियां, उद्योगपति, सीईओ, राजनेता और राष्ट्र प्रमुख शामिल हुए।


करीब 25 सौ प्रतिनिधियों ने पांच दिनों तकयही मंथन किया कि महामंदी के बाद के संकट से कैसे अर्थव्यवस्था को निकाला जाए और विचार मंथन में अमृत निष्कर्ष यह निकला कि मुक्त अर्थव्यवस्था, निजीकरण और उदारीकरण से ज्यादा उद्योग-व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। सरकार का वरदहस्त रहा तो मंदी से निजात पाई जा सकती है। यही बात वर्षों से एशिया के कई देश कहते आए हैं, जिनमें भारत प्रमुख रहा है। पिछले वर्ष मंदी के झंझावात में भी भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी खड़ी रही तो इसके पीछे यही कारण बताया गया कि यहां पूरी तरह से निजीकरण लागू नहींहुआ है। अब भी जरूरी क्षेत्रों में सरकार का हस्तक्षेप है। ये और बात है कि इन गिने-चुने क्षेत्रों से भी सरकार की भूमिका समाप्त करने की साजिशें रची जा रही हैं और रचने वाले सरकार-प्रशासन के ही लोग हैं, उद्योगपति तो केवल इसका लाभ उठाने की जुगत में रहते हैं। दावोस में अर्थव्यवस्था में सरकारी दखल की बात फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने पुरजोर तरीके से की। सम्मेलन के उद्धाटन भाषण में उन्होंने कहा कि जिस क्षण हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि बाजार हरदम सही है, उस क्षण ही भूमंडलीकरण नियंत्रण से बाहर हो जाता है। मुक्त व्यापार की आवश्यकता से अधिक वकालत ने लोकतंत्र को कमजोर किया है। उनके इस भाषण पर लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईंऔर ये सारे वही लोग हैं जिन्होंने बाजार को सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान बनाने की कोशिशें कीं। किंतु लोकतंत्र, सरकारी नियंत्रण आदि की लुभावनी बातें करने से इस भ्रम में कतई नहींपड़ना चाहिए कि बाजार की नीतियां और उनके नियामकों में कोई परिवर्तन आने वाला है। विश्व आर्थिक मंच अपने लाभ के लिए एकत्र होने वालों का मंच है। निजी स्वार्थ के अलावा इनका और कोई सरोकार नहींहै।

जब तक विश्व में मंदी नहींआई थी, बैंक धराशायी नहींहुए थे, कई बड़ी कंपनियां दिवालिया नहींहुई थीं, भूमंडलीकरण के वृक्ष में मुक्त अर्थव्यवस्था का जल डाला जाता रहा, पर जब जड़ें सूखने लगींतो सरकार की याद आई। संरा की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक उदारीकरण से गरीबों की संख्या बढ़ी है। भारत, चीन, ब्राजील जैसे देशों में गरीब आबादी और बढ़ी है। लेकिन अब भी खुले बाजार के दुष्परिणामों को न समझना खेदजनक है। भारत से वहां मौजूद प्रतिनिधि यह सोच कर खुश हो लें कि इस सम्मेलन में भारत की आर्थिक प्रगति पर चर्चा हुई, तारीफ हुई। किंतु इस प्रशंसा से मुग्ध होने के बजाए उदारीकरण के खतरों को समझने की आवश्यकता है। दावोस में मुक्त व्यापार पर चाहें जितनी समीक्षा हो गई हो, वहां जिनका जमावड़ा लगा था, उनका कुल जमा स्वार्थ इतना ही था कि उनके व्यापार पर सरकारों का वरदहस्त बना रहे। अपने लाभ के लिए किए गए इस सम्मेलन में कोई बुराई नहींहै, किंतु फिर इसमेंविश्व अर्थव्यवस्था की चिंता, लोकतंत्र की फिक्र, विश्व की गरीब आबादी पर विमर्श का ढोंग क्यों रचाना?

Posted by: devendra surjan bangalore On: February 03, 2010
उद्योग जगत अपने वजूद को बनाये रखने के लिए सरकारी आश्रय चाहता है लेकिन किसी भी तरह के सरकारी प्रतिबन्ध को वह मानने से वह इनकार कर देता है.खुली अर्थ व्यवस्था के पूर्व उद्योगपति अपनी अर्थ पूर्ति के लिए प्रायवेट बैंक भी चलाया करते थे.सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया,यूको बैंक, न्यू बैंक ऑफ़ इंडिया आदि-आदि ढेरों बैंक थे जिनमें जमाकर्ताओं की राशि का निवेश ये लोग अपने उद्योगों में कर लेते थे.जिन उद्योगपतियों के अपने बैंक नहीं होते थे वे इन्ही बैंकों से कर्ज उठा लेते थे.सरकारी क्षेत्र में सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ही था.बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद सभी बैंक सरकारी हो गए और अपनी मर्जी से बैंक से धन उठा लेने की सुविधा उनके हाथ से जाती रही,उस वक़्त तक इन उद्योगपतियों ने बैंकों से हजारों करोड़ रुपया ले रखा था जो कालांतर में वापिस तो नहीं किया गया लेकिन यह बहाना बना लिया कि कर्ज कि जबरन वसूली कि गई तो उद्योग बंद हो जायेंगे और लाखों मजदूर बेकार हो जायेंगे.इस परिस्थिति के लिए सरकार कैसे तैयार होती नतीजतन वह हजारों करोड़ रुपया लगभग डूबंत खाते में समझ लिया गया.एक प्रकार से उन उद्योगपतियों को यह सरकारी मदद ही मानी जाएगी.यह जरुर हुआ कि नया ऋण देने में सख्ती बरती जाने लगी जिससे छोटे उद्यमी ही विशेषतः प्रभावित हुए. बड़े उद्यमी विकल्प के तौर पर सीधे शेयर मार्केट के जरिये धन उगाहने लगे और इस तरह खुली अर्थ व्यवस्था चल पड़ी.पहले इन्होने बैंकों और उनके जमाकर्ताओं को चूना लगाया और अब शेयर धारकों को. बड़े बड़े घराने शेयर मार्केट के माध्यम से इतना पैसा जुगाड़ चुके हैं कि अपना माल बेचने हेतु अब ये खरीदार को खुद फायनांस करने लगे हैं . नाना प्रकार के म्युचुअल फंड और इंश्योरंस कम्पनियाँ बाजार में आ गए हैं.सरकारी बैंक भी अपना आधार बढाने बाजार से ही धन एकत्र कर रहे हैं,और ऑटो मोबाईल और हाऊसिंग लोन देकर इतना मोटा ब्याज वसूल रहे हैं कि उपभोक्ता की कमर टूट गई है. कर्ज चुकाना दूभर हो गया है-परिणाम स्वरुप मंदी छा गई है.माल का बिकना कम होता जा रहा है और इसीलिए उत्पादन भी कम हो गया है.उद्योगों कि लागत बढ़ गई है और अर्थ प्रबंधन ठप्प हो गया है.मजबूरन इन्हें अब सरकारी छत्रछाया जरूरी लग रही है.कारोबार चलाने सरकार से "स्टीमुलस पैकेज" यानी आर्थिक योगदान माँगा जा रहा है,जिन्हें मदद मिल गई है दुबारा मांग रहे हैं.लौटायेंगे कब कुछ पक्का नहीं.और नहीं लौटाया तो सरकार क्या कर लेगी,फिर वही मजदूरों के बेकार होने का आलाप लगाया जायेगा और सारा पैकेज बट्टे खाते चला जायेगा. इस तरह पहले बैंकों को फिर शेयरधारकों को और अब सरकार को यानी आम करदाता को छलने का रास्ता ढूंढ़ निकाला गया है,लेकिन सरकार इतनी भोली है कि बार बार छले जाने पर भी किसी पर जवाबदेही फिक्स नहीं कर पाती.यह हाल भारत का है और बाकी देश भी इसी बीमारी से ग्रस्त हैं.

Posted by: Vinay Tarun On: February 15, 2010
देवेन्द्र जी नमस्कार! कृपया ये बताएं की बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों के मालिकों को क्या मिला? मैं ये जानना चाहता हूँ की सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया, या यूको बैंक का स्वामित्व क्या पूरी तरह से सरकार का हो गया था या बैंक मालिकों को भी उसका शेयर मिला था? यदि हो सके तो कृपया बताएं कि इन बैंकों का चेयरमैंन कौन होते हैं और बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर कैसा होता है. कृपया मेरी जानकारी बढ़ाएं. धन्यवाद विनय तरुण भागलपुर, बिहार

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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