| Last Updated: 10:47:36 PM 14, Mar, 2010, Sunday |
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| महेन्द्र राजपक्षे के समक्ष चुनौतियां |
| (09:28:10 PM) 29, Jan, 2010, Friday |
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जैसा कि अपेक्षित था श्रीलंका में राष्ट्रपति का चुनाव महेन्द्र राजपक्षे ने भारी मतों से जीत लिया। उनके प्रतिद्वंद्वी पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल सरत फोन्सेका सारी कोशिशों के बावजूद पराजित रहे। यह गौरतलब है कि गत वर्ष लिट्टे के विरूध्द छेड़े गए युध्द का नेतृत्व जनरल फोन्सेका ने ही किया था। दो दशकों से दहशत का पर्याय बन चुके लिट्टे विद्रोहियों का आंदोलन खत्म करना श्रीलंका सरकार के लिए आसान नहींथा। इस युध्द में लिट्टे का सफाया हुआ, प्रभाकरण की मौत हुई, हजारों तमिल नागरिक भी युध्द की भेंट चढ़ गए। लेकिन लिट्टे पर जीत क्या मायने रखती है, यह इन चुनावों में पता लग गया। जनरल फोन्सेका को लगा कि उनके नेतृत्व में युध्द जीता गया तो जनता देश की कमान भी उनके हाथों देने पर विचार कर सकती है। लेकिन महेन्द्र राजपक्षे को मिले 58 प्रतिशत से अधिक वोट यह बतलाते हैं कि जनता ने सेनाध्यक्ष से ज्यादा राष्ट्राध्यक्ष पर अपना विश्वास जतलाया है। अब श्री राजपक्षे पर यह महती जिम्मेदारी है कि वे जनता के इस विश्वास की रक्षा करें।
2005 में पहली बार वे श्रीलंका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, लिट्टे पर मिली जीत को दूसरे कार्यकाल के लिए भुनाने का यह अनुकूल समय था, इसलिए समय पूर्व चुनाव उन्होंने करवाए। जनरल फोन्सेका उन पर धांधली से जीत का आरोप लगा रहे हैं। इन आरोपों को अगर एक क्षण के लिए नजरंदाज कर भी दिया जाए तब भी ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब देना महेन्द्र राजपक्षे की नैतिक जिम्मेदारी है। लिट्टे से युध्द के दौरान सरकार पर मानवाधिकारों के हनन का जमकर आरोप लगा। यह सर्वविदित है कि इसमें जिनेवा संधि की उपेक्षा की गयी। आत्मसमर्पण करने वाले तमिल विद्रोहियों को कैद की जगह मौत की सजा दी गयी। संरा व मीडिया के लोगों को युध्द क्षेत्र में जाने नहींदिया गया। प्रेस की स्वतंत्रता पर अघोषित पाबंदी लगायी गयी। युध्द खत्म होने के बाद इस रवैये में परिवर्तन आया हो ऐसा नहींलगता। चुनावों के दौरान जनरल फोन्सेका जिस होटल में रूके थे, उसे सुरक्षा बलों ने घेर रखा था और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए किया गया, ऐसी खबरें भी आयीं। इस तरह मानवाधिकारों की बहाली, प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना, लोकतंत्र को मजबूत करना और सबसे बढ़कर तमिल अल्पसंख्यकों के लिए सम्मानपूर्वक जीवन जीने का माहौल निर्मित करना भी राजपक्षे की प्रमुख जिम्मेदारी होगी।
चुनाव जीतना और सरकार चलाना एक बात है और देश को शांतिपूर्वक विकास के पथ पर बढ़ाना दूसरी बात है। लिट्टे पर जीत के बाद महेन्द्र राजपक्षे ने तमिल अल्पसंख्यकों से वादा किया था कि वे संविधान के 13 वें संशोधन से भी ज्यादा अधिकार तमिलों को देंगे। अब उन्हें अपने इस वादे पर जल्द से जल्द अमल करना चाहिए। तमिलों को अधिकाधिक स्वायत्तता जातीय संघर्ष के समाधान का महत्वपूर्ण उपाय है। 26 वर्षों तकचले जातीय संघर्ष का परिणाम तमिल अल्पसंख्यकों के साथ-साथ सिंहलियों ने भी भुगता है। श्रीलंका आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ गया और इसका असर चौतरफा पड़ा। इसलिए सिंहली, तमिल सभी चाहते हैं कि यह संघर्ष दोबारा सिर न उठाए। भारत के लिए भी श्रीलंका में शांति बेहद महत्वपूर्ण है। लिट्टे केआतंक का दंश हमने कम नहींभुगता है। महेन्द्र राजपक्षे दूसरी बार सत्ता संभालते हुए निरंकुश न हों, तानाशाही प्रवृत्ति की ओर न बढ़ें, और नेपाल, पाकिस्तान में छायी राजनीतिक अस्थिरता से सबक लेते हुए श्रीलंका को स्थायी नेतृत्व प्रादन करें, यही सबके हित में है।
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