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गणतंत्र दिवस- संदेश, अतिथि, परेड और पुरस्कार
(08:52:57 PM) 28, Jan, 2010, Thursday


देश का 60 वां गणतंत्र दिवस समारोह बिना किसी विघ्न-बाधा के संपन्न हो गया, इस पर अब देश की तमाम सुरक्षा एजेंसियां चैन की सांस ले सकती हैं। यूं साल-दर-साल इस दिन के महत्व और उत्साह से ज्यादा चर्चा सुरक्षा व्यवस्था की होने लगी है, लेकिन इस वर्ष आतंकी हमले का खतरा कुछ ज्यादा था।

देश की राजधानी किसी छावनी में तब्दील थी और अन्य प्रमुख शहरों का भी यही हाल रहा। खुलकर राष्ट्रीय पर्व न मना पाने का दुख होता है, लेकिन इसके लिए दहशतगर्दों के अलावा और किसे दोषी ठहराया जाए। यह संतोष की बात रही कि ठंड और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद जनसैलाब परेड देखने उमड़ा। हर वर्ष गणतंत्र दिवस पर चार बातें महत्वपूर्ण रहती हैं। राष्ट्रपति का संदेश, मुख्य अतिथि, पद्म पुरस्कार और परेड। राष्ट्रपति का संदेश आमतौर पर केंद्र सरकार की नीतियों-योजनाओं के इर्द-गिर्द केन्द्रित रहता है। लेकिन प्रतिभा ताई पाटिल ने यूपीए सरकार की योजनाओं के अतिरिक्त उस विषय को अपने संदेश में शामिल किया जो आज हर हिन्दुस्तानी की दुखती राग है। उन्होंने महंगाई पर चिंता जतलाई और मौजूदा खाद्यान्न संकट से निबटने के लिए हरित क्रांति की आवश्यकता बतलाई। कृषि मंत्री शरद पवार महंगाई रोकने की जगह फिजूल के बयानबाजी में अपनी क्षमता दिखा रहे हैं और प्रधानमंत्री समेत यूपीए का प्रमुख घटक दल कांग्रेस चुपचाप इसे देख-सुन रहा है। तब क्या देशवासी यह उम्मीद करें किराष्ट्रपति के संदेश का कुछ असर इन पर भी पड़ेगा। राष्ट्रपति के संदेश में अधोसंरचना का विकास, युवा शक्ति का दोहन, शिक्षा का प्रसार जैसी अन्य बातें भी शामिल थीं। लेकिन दाल-रोटी की चिंता में घुलता आम भारतीय इन्हें क्या सुने और क्या गुने। इस वर्ष दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्युंग बाक समारोह के मुख्य अतिथि थे।

गणतंत्र दिवस पर किसी अन्य राष्ट्र के प्रमुख को मुख्य अतिथि बनाने की यह भारतीय परंपरा विदेशों से मैत्रीपूर्ण संबंध कायम करने मेंमहत्वपूर्ण रही है। यह हमारी वसुधैव कुटुम्बकम की सोच को दर्शाती है और यह भी कि अपनी खुशी में हम सबको शामिल करना चाहते हैं। द.कोरिया व भारत के आर्थिक संबंध सुदृढ़ रहे हैं, इन्हें और मजबूती देने के लिए संभवत: राष्ट्रपति ली म्युंग बाक को मुख्य अतिथि बनाया गया। उड़ीसा में द.कोरिया के पास्को इस्पात संयंत्र को पर्यावरणीय मंजूरी मिल जाना इस बात का द्योतक है कि भारत द.कोरिया के साथ व्यापार संबंधाेंको आगे बढ़ाना चाहता है। राष्ट्रपति बाक की यात्रा के दौरान भारत-.कोरिया के बीच परमाणु संयंत्र लगाने सहित कई महत्वपूर्ण समझौते भी हुए हैं। गणतंत्र दिवस परेड में परंपरागत तरीके से प्रदेश की झांकियों के साथ सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया गया। वर्ष में एक बार तीनों सेनाओं की शौर्य से भरी झांकी देखकर हर भारतीय रोमांचित होता है, किंतु अपनी रीति-नीति के अनुरूप भारत सामरिक झांकी के साथ-साथ विश्व शांति का संदेश परेड के माध्यम से दे तो यह नवाचार विश्व का ध्यान जरूर आकृष्ट करेगा। और अंत में पद्म पुरस्कारों पर चर्चा। हर बार की तरह इस बार भी पद्म पुरस्कार विवादों से परे नहींरह पाए। यह चर्चा अब शायद बेमानी है कि पद्म पुरस्कार क्यों दिए जाते हैं और किस आधार पर दिए जाते हैं। इन सम्मानों को प्राप्त करने के लिए योग्यता की बात भी अब फिजूल लग रही है। योग्य, योग्यतर और योग्यतम के लिए पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण अगर निर्धारित थे, तो यह मापदंड भी निरर्थक दिख रहा है। इन पुरस्कारों को प्राप्त करने की योग्यता शायद लोकप्रियता और जोड़-तोड़ की प्रवृत्ति ही रह गई है। तभी कला के क्षेत्र में अनेक गुणियों को हाशिए पर कर हिन्दी फिल्मों के कलाकार हर साल पद्म पुरस्कार प्राप्त करते हैं और साहित्य में जानकीवल्लभ शास्त्री जैसे बड़े विद्वान लेखक व मंचीय वाहवाही लूटने वाले लेखकों को एक पलड़े पर तौला जाता है। योग्य-अयोग्य को एक तुला पर रखने से जनता के बीच भी इन सम्मानों के प्रति सम्मान का भाव घटता जा रहा है। इस बार संत सिंह चटवाल को पद्म भूषण देने पर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह पद्म पुरस्कारों पर नए सिरे से विमर्श की मांग करता है। क्लिंटन दंपति से नजदीकी और अमरीका में सफल व्यवसायी होना शायद श्री चटवाल की सबसे बड़ी योग्यता है, लेकिन उन पर धोखाधड़ी का मामला चलाना क्या ऐसे किसी भी पुरस्कार से उन्हें दूर रखने के लिए काफी नहींथा? या भारत की जनता यह मान ले कि जो येन-केन-प्रकारेण धन-संपत्ति हासिल करते हैं, जो केवल अपने लिए काम करते हैं, अपने लिए लिखते, खेलते, गाते-बजाते हैं और देश या देश की जनता से उनका कोई व्यापक सरोकार नहींरहता, लेकिन सरकार-प्रशासन में ऊंची पहुंच रहती है, वे पद्म पुरस्कार लेने की पात्रता रखते हैं।

Posted by: devendra surjan bangalore On: January 28, 2010
चटवाल को पद्म विभूषण सम्मान उनकी चाटुकारिता से जोड़कर देखा जा सकता है. चाटुकारिता चाहे क्लिंटन दंपत्ति की हो यो फिर भारत के समय-समय पर रहे अलग-अलग सत्ताधीशों की.भारत में उन पर सीबीआई द्वारा केस कर दिए जाने के बाद भी अगर वो जेल जाने से बच गए तो माना जा सकता है वह चाटुकारिता के जरिये ही बच पाए होंगे. इसे नाम स्वभाव और धनपति होने के विचित्र संयोग के रूप में भी देखा जा सकता है जिसे उन्होंने अपने बेटे की शादी में इन तीनों अवयवों के मिश्रण से प्रमाणित भी किया था . क्या ही अच्छा होता कि भारत जैसे विशाल देश में जहाँ जाति सूचक लाखों उपनाम हैं, जिनमे विचित्रता भी खूब होती है "चाटुकार" जैसा भी कोई उपनाम होता. तब किसी को उन्हें पद्म पुरूस्कार से सम्मानित किये जाने पर आपत्ति नहीं होती. कर्म के आधार पर देश में चर्मकार, स्वर्णकार जैसे अन्य उपनाम पहले से ही हैं.वैसे, अपने नाम और काम के चलते चटवाल की सफलता और संपर्कों को कम कर आंकना ठीक नहीं होगा. और उनके नुक्लियर डील (अच्छी या बुरी) में की गई मध्यस्तता के बदले एक पद्म पुरूस्कार देने का दिल तो हम भारतीय रख ही सकते हैं.जबकि अटल बिहारी जी के घुटनों का आपरेशन करने वाले डा.रानावत को पूर्व में और मनमोहन जी के दिल का आपरेशन करने वाले डाक्टर रमाकांत पांडा को अभी सम्मानित करने में हमें कोई गुरेज नहीं है.दरअसल पद्म पुरुस्कारों के पात्रों को चुनने की पद्धति बदली जानी चाहिए या इन पुरुस्कारों को ही ख़त्म कर देना चाहिए क्योंकि निष्पक्षता की गुंजाईश न के बराबर होने से इन सम्मानों का मान कम हो रहा है और महेंदर सिंग धोनी और हरभजन सिंग जैसे लोग तो इन्हें ग्रहण करने भी नहीं जाते और उस वक़्त का उपयोग वे विज्ञापन फिल्म की शूटिंग को देकर धन कमाने में करते हैं.यह भी कहा जाता है की बहुत से लोग इन पुरुस्कारों को पाने जी तोड़ प्रयास करते हैं भले ही वे योग्य न हों.पिछले वर्ष कुछ इलेक्ट्रोनिक मीडिया के उन लोगों को ये पुरूस्कार दिए गए थे जिनका सर्वोत्तम काम अभी आना बाकी है.जाहिर है फोटो दिखाने वालों का भी ख्याल इन पुरुस्कारों के निर्धारण के वक़्त रखा जाता.और उनकी अनदेखी की जाति है जो वास्तव में इन सम्मानों के हक़दार हैं.

 
 
 
 
 
 
 
 
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