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सियासत की भेंट चढ़ा महिला आरक्षण विधेयक

14, Apr, 2009, Tuesday 02:29:56 PM

हरिहर रघुवंशी
बराबरी के लिए 43 वर्षों से मैदान में हैं महिलाएं
देश की राजनीति में 43 साल पहले इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल कर देश की सबसे ताकतवर महिला के रूप में एक मिसाल कायम की थी। उन्होंने देश की महिलाओं को यह संदेश दिया की देश की महिलाएं किसी भी रूप में कमजोर नहींहैं। इस संदेश का आज बहुत व्यापक रूप से विस्तार हो चुका है। राष्ट्रपति से लेकर देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक घराने पर भी महिलाओं का ही कब्जा है, लेकिन इसके बाद भी पिछले 13 साल से महिला आरक्षण विधेयक संसद में पास होने का इंतजार कर रहा है। सभी राजनीतिक दल इसे सैद्धांतिक रूप से पास कराने के पक्ष में हैं। कई बार राजनीति से ऊपर उठ कर सभी राजनीतिक दलों की महिलाओं ने संयुक्त रूप से बिल को संसद में पास कराने के लिए आवाज उठाई है। लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहींसुना गया, नतीजन महिला आरक्षण बिल अभी तक लटका पड़ा है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व पंचायत तक बढ़ाने के लिए कोशिश जरूर हुई, लेकिन यह प्रयास भी राजनीति का शिकार हो गया। देश की राजनीति में दो दशक तक अपना वर्चस्व कायम रखने वाली इंदिरा गांधी के बाद करीब 12 वर्षों तक कांगे्रस की राजनीति में महिलाएं हाशिए पर रहीं हैं, लेकिन 1998 में सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के बाद एक बार फिर पार्टी में महिलाओं का दबदबा कायम हो गया। सोनिया आज देश का प्रधानमंत्री बनाने की स्थिति में जरूर हैं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे महिला आरक्षण बिल को पांच साल तक सरकार चलाने के बाद भी पास नहींकरवा सकीं। उनका प्रयास शायद गठबंधन की मजबूरियों के कारण सफल नहींहो सका। कांगे्रस की राजनीति में मारगेट अल्वा, मोहसिना किदवई, अंबिका सोनी, शीला दीक्षित, गिरिजा व्यास, रेणुका चौधरी और प्रभा ठाकुर जैसी महिलाए केंद्र की राजनीति में वर्चस्व रखती हैं। भाजपा की राजनीति में विजयराजे सिंधिया, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, नजमा हेप्तुल्ला और सुमित्रा महाजन संगठन और सरकार में दखल जरूर रखती है, लेकिन यहां भी आपस में वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में तेज तर्रार महिला नेता रहीं उमा भारती राजनीति का शिकार हो गईं। इसके अलावा भारतीय राजनीति में मायावती और जयललिता दो ऐसी ताकतवर महिलाएं हैं, जो राजनीतिक गठबंधन की दशा-दिशा तय करने की हैसियत रखती हैं, लेकिन प्रशासन चलाने वाली ये तमाम महिलाएं देश की आम महिलाओं के लिए ऐसा कुछ नहीं कर सकीं, जो मिसाल कायम कर सके। महिलाओं को आरक्षण देकर पंचायत स्तर पर उन्हें लाने की कोशिश की गई, लेकिन यहां भी महिला एक मुहर बन कर रह गई हैं। पंचायत स्तर पर महिला आरक्षित सीटों पर महिलाएं आ जरूर गईं हैं, लेकिन कहां पर मुहर लगनी है और कहां पर नहीं लगनी है यह उसका पति तय करता है। राजनीतिक में ताकतवर मानी जानी वाली अधिकांश महिलाओं के प्रबंधन का काम कोई न कोई पुरुष देखता है, जिसके कारण इन महिलाओं के तमाम मुख्य फैसलों में उनकी राय शामिल होती है।

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