Current Location:
Temperature: 0°C

Forecast:

Breaking News


विविध     आध्यात्म (योग, पावन प्रसंग, ध्यान...)

महाकरूणिक तथागत भगवान गौतम बुध्द

17, May, 2011, Tuesday 09:46:51 PM

विश्व को शांति, अहिंसा और मैत्री का संदेश देने वाले भगवान बुध्द और उनके उपदेश आज बहुत ही प्रासंगिक हो गए हैं,

जबकि भारत ही नहीं, विश्व के सारे देश आतंकवाद और युध्दोन्माद के वातावरण से उद्वेलित है, परेशान है, वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, अवैर से ही वैर शांत होता है यही संसार का सनातन नियम है। आज से 2574 वर्षों पूर्व वैसाख पूर्णिमा के दिन बालक सिध्दार्थ का जन्म कपिलवस्तु के राजा शुध्दोधन और माता महामाया के घर हुआ। सिध्दार्थ ने 29 वर्ष की आयु में सन्यास लेने और 35 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात बुध्द होकर लगातार 45 वर्षों तक इस भारतभूमि पर अपने ज्ञान की देशना की। बुध्द ने बौध्द धर्म की स्थापना की जिसके प्रकाश से भारत वर्ष ही, नहीं, सम्पूर्ण एशिया प्रकाशित हो गया।
सर्वसाधारण के अज्ञान और अंधविश्वास, भय और आतंक के विरुध्द बुध्द ने विद्रोह किया। सैध्दांतिक रूढ़िवादिता और कट्टरपन के कारण समाज में जो घृणा फैली थी, उसका बुध्द ने विरोध किया। बुध्द संसार का पहला ऐसा क्रांतिवीर है, जिसके कारण भारतीय समाज में दीनहीन लोगों को क्रांति का मार्ग मिला। पाखंडी एवं भेदभाव पूर्ण वर्ण व्यवस्था रूपी नर्क से मुक्ति का मार्ग मिला, भ्रम भय मानवीय कुरीतियों से निर्विघ्न होने की राह मिली।
बुध्द ने आत्मा जैसी बात बात को मनाने से ही इंकार कर दिया। उन्होंने अनात्मवाद-अनत्ता का सिध्दांत चलाया। बुध्द ने कहा- कोई आत्मा नहीं है। मृत्यु के बाद मनुष्य का शरीर पंच तत्वों में विलीन हो जाता है और चेतना शून्य में खो जाती है, जैसे कि दीपक की लौ बुझ जाने पर प्रकाश शून्य हो जाता है।
बुध्द न तो ईश्वर की बात करते हैं और न ही आत्मा की बात, क्योंकि इन दोनों की मनुष्य के कल्याण के लिए कोई उपयोगिता नहीं है। बुध्द ने कहा- तुम कुछ भी नहीं हो, तुम शून्य हो। बुध्द ने परमात्मा की बात कभी नहीं कि क्योंकि कम्बल बन जाएगा तुम्हारे लिए यह परमात्मा और उस कम्बल के नीचे तुम छुपकर बैठ जाओगे, विश्राम करने लगोगे। भाग्य का लिखा, विधि का विधान, पूर्व जन्म का फल जैसी निरर्थक बातों पर चल पडाेगे। शून्य का तुम कम्बल नहीं बना पाओगे। भारत में पहली बार स्त्री के लिए घर छोड़कर सन्यास लेने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग बुध्द ने ही प्रशस्त किया। स्त्री जाति के लिए आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग खुल गया, जब बुध्द ने अपनी मौसी महा प्रजापति गौतमी को प्रथम भिक्षुणी के रूप में दीक्षा दी।
यज्ञ जैसे वैदिक कर्मकांड की बुध्द ने हमेशा निंदा की क्योंकि इसमें देवताओं को प्रसन्न करने के लिए निर्दयता पूर्वक पशुओं की हिंसा होती थी, श्रमिकों के साथ सख्ती की जाती थी और धन का अपव्यय होता था। बुध्द के अनुसार सच्चा यज्ञ वह है जो दूसरों के कल्याण के लिए, आत्म परित्याग के लिए किया जाए। बुध्द का धर्म विश्लेषण का धर्म है। बुध्द कहते हैं- अपने अनुभवों और प्रमाणिकता को आधार मानों, अपनी रोशनी आप बनो: अप्प-दीप-भव। बुध्द चाहते थे कि एक नए प्रकार का स्वतंत्र मनुष्य विकसित हो जो अपना भविष्य स्वयं बनाए। बुध्द ने कहा- सभी मनुष्यों के भीतर ज्ञान प्राप्त करने की शक्ति है। बुध्द ने मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा दी। हम लंगड़े होकर चल रहे थे, परमात्मा रूपी बैसाखी के सहारे। बुध्द ने वह बैसाखी ही छीन ली हमसे। कब तक लंगड़ाओगे? स्वयं उठो और आगे बढ़ो, तभी तुम्हारा जीवन सुखी होगा, तुम्हारा कल्याण होगा।
बुध्द कहते हैं- तुम्हारा मन सर्वोपरि है। सारे सुखों और दुखों के कारण तुम्हारे मन में ही स्थित है। क्रोध, द्वेष, लोभ, तृष्णा इत्यादि बुरे विचारों को चित्त से निकालकर यदि आदमी प्रज्ञा और शील पर स्थिर रहे तथा करुणा और मैत्री भावना सभी जीवों पर रखे तो वह स्वयं सुख पा सकते हैं और उसी प्रकार सारा समाज सुखपूर्वक रह सकता है।
बुध्द ने मनुष्य को व्यक्तित्व का विज्ञान दिया। बुध्द कहते हैं मनुष्य की महिमा अंतिम है। बुध्द ने हमें बताया कि अभी तुम जो कुछ हो, उसका कारण तुम्हीं हो, कल जो कुछ भी तुम थे, उसका कारण भी तुम्हीं थे और कल जो कुछ तुम होओगे, उसका कारण भी तुम्हीं होगे।
इसलिए बुध्द ने मनुष्य को आत्म साक्षात्कार करने पर जोर दिया। बुध्द ने जोर, आत्मा और परमात्मा से हटा दिया, तुम पर ला दिया। बुध्द ने मनुष्य को छिपने की कोई ओट नहीं छोड़ी। मनुष्य आप ही अपना स्वामी है- अत्त नो अत्तो नाथो। मनुष्य एकांत रूप से उत्तरदायी है अपने कर्मों के प्रति। पाप हो तो तुम जिम्मेदार और पुण्य हो तो तुम जिम्मेदार। किसी और पर टालने का कोई उपाय नहीं। आत्मा के पुनर्जन्म की बात और पिछले जन्मों के कर्मों के फल की बात को बुध्द ने पूरी तरह नकार दिया। बुध्द कहते हैं कोई परलोक नहीं है। जो है, अभी है, यही है। शास्त्र कहते हैं- पुण्यात्मा स्वर्ग में सुख भोगता है और पापी नरक में कष्ट पाता है। बुध्द कहते हैं स्वर्ग-नरक सभी यही है। सभी अपने कर्मों का फल भोगते हैं।
मनुष्य को अपना जीवन सुखी बनाने के लिए बुध्द ने त्रिशरण (बुध्द, धम्म और संघ की शरण), पंचशील (हिंसा, चोरी, व्याभिचार, झूठ और नशे में विरत रहना), प्रज्ञा, शील, करूणा और मैत्री भावना और मैत्री भावना के साथ मध्यम मार्ग (आर्य अष्टांगिक मार्ग- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी सम्यक कर्मात्, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि) पर चलने की देशना है। बुध्द के मध्यम मार्ग को मज्झिम निकाय- आर्य अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। बुध्द ने कहा, मेरा मार्ग मध्यम मार्ग है, अतियों से बचाने वाला। मनुष्य का मन अतियों में डोलता है, पेण्डुलम की तरह। भोगी एक अति पर है, तो त्यागी दूसरी अति पर। भोगी शरीर की अति से पीड़ित है, तो योगी आत्मा की अति से पीड़ित है। दोनों रोगी है। बुध्द कहते- मध्य में मार्ग है, तुम अतियो में मत जाना। चाहे भोग हो, या चाहे त्याग हो, अतिशय से बचना। बुध्द उसे ही धर्मज्ञ कहते है जो मध्य में खड़ा है, जिसने अतियां त्याग दी। बुध्द ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाया। उन्होंने भारतीय आर्य सभ्यता के पुराने आदर्शों को एक नया अर्थ दिया- नयी महत्ता दी। उन्होंने नई परिभाषाएं दीं वेदों में उल्लेखित बातों को जो लोककल्याण के लिए, बहुजन के हित के लिए और बहुजन के सुख से संबंध रखती हों। बुध्द ने पुराने वैदिक धर्म के अध्यात्म और शीलाचार की मौलिक बातों को मानते हुए उस समय प्रचलित कई कुप्रथाओं और आचारों का विरोध किया और पुनर्जीवित किया वह सब, जो खो गया था और एक दूसरी भावधारा को जन्म दिया जो बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय और लोकानुकम्पाय थी। अनीश्वरवाद और अनात्मवाद बौध्द धर्म की दो ऐसी आधारशिलाएं हैं, जिन पर बौध्द धर्म का सम्पूर्ण भवन खड़ा है। बौध्द धर्म के इतिहास में एक भी ऐसा पृष्ठ नहीं है जो रक्त रंजित हो।
बुध्द अनूठे हैं, ध्रुवतारे हैं, अनेक तारों में एक। बुध्द ने एक नई क्रांति को जन्म दिया, मनुष्य की चेतना की क्रांति। बौध्द ने धर्म के साथ वैज्ञानिक होने की क्षमता जुटाई, धर्म वैज्ञानिक हुआ। दर्शन के जितने मार्ग बुध्द ने खोले उतने मनुष्य जाति के किसी व्यक्ति ने नहीं खोले। बुध्द अकेले समस्त दर्शनों के स्रोत बन गए। बुध्द ऐसे उत्तुंग शिखर है, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखाई नहीं पड़ता। बस थोड़ी दूर तक हमारी दृष्टि जाती है। हमारी सृष्टि की एक सीमा है, पंरतु बुध्द के ज्ञान की कोई सीमा नजर नहीं आती। उनका प्रारंभ तो दिखाई पड़ता है, परंतु अंत दिखाई नहीं पड़ता। बुध्द खोते चले जाते हैं, हिमाच्छादित शिखर, बादलों के पार। यही उनकी महिमा है।
बुध्दं शरण गच्छामि,
धम्मं शरणं गच्छामि,
संघं शरणं गच्छामि।
-अर्चना चौहान
(अध्यक्ष मैत्री महिला मण्डल, भारतीय बौध्द विकास परिषद, भिलाई)

Post Your Comment

Your Article:
Your Name:
Your Email:
Your Comment:
Type in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi)

Posted Comments

Prafull Jadhav
May 10, 2012
I proud of Buddhism.

santosh sapkal
November 04, 2012
अर्चनाजी आपके लिखाण से बहुत प्रभावित हु

sukhadhane sharad santosh
May 29, 2013
गौतम बुध्द आणि डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर यांचा जीवन इतिहासावर माहिती पाठवा.

विजय वा.कांबळे
August 29, 2013
madam U`r writing is very well & short but all information

मंगेश महाबोधि
December 07, 2013
आपने जो लिखा है वह धम्म का वास्तविक सत्य है.मै एम.फिल पाली भाषा का छात्र हुँ,और आपका यह लेख मुझे उपयुक्त सिध्द हुआँ!!!!!!

एस उबाळे
May 24, 2014
बहुत ही सुंदर लेख है

S.J.Akhtar
June 29, 2014
बौद्ध धर्म की विशिष्टताओं का सुन्दर वर्णन किया है। आज भी इनकी प्रासंगिकता बनी हुई है।

pravin pandit
August 13, 2014
सच्ची मे दुनिया में सबसे प्रथम ज्ञान देणे वाला महात्मा था वह !